
- May 15, 2025
- भवेश दिलशाद
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सूचना-मुक्त होते हुए हम
भारत-पाकिस्तान की सरहदों पर संघर्ष हुआ, फिर जंगबंदी हो गयी। जंग के हिमायती एक बहुत बड़े जनसमूह ने मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं भी पार कर दीं। संघर्ष-विराम का श्रेय लूटने में अमरीका ने ज़बानदराज़ी की। इधर, जंग से ऐन पहले, दौरान और जंग के बाद भी मीडिया (मुख्यत: टीवी/इंटरनेट) की लफ़्फ़ाजियों पर कोई बंदी, कोई विराम नहीं लगा।
दोनों मुल्कों में जीत का ऐलान हुआ, जश्न भी, इसकी बड़ी वजह है मीडिया का ग़ुलाम होना। आप पत्रकारिता शून्यता के अर्थ यहां से खुलते देख सकते हैं। क्या न्यूज़रूम में निज़ाम की दख़लंदाज़ी/हुक्मरानी स्वीकारना पत्रकारिता है? क्या पत्रकारिता यह है कि यह देखकर अभिव्यक्ति की आज़ादी तय की जाये कि ज़बान है किसकी? पत्रकारिता शून्यता के बाद अब हम सूचना शून्यता की तरफ़ तेज़ी से दौड़ रहे हैं। जॉर्ज ऑरवेल के शब्द याद कीजिए:
“प्रेस की आज़ादी के कुछ मायने अगर हैं तो यही कि विरोध और आलोचना की आज़ादी।”
विरोध और आलोचना के मतलब बहुत सस्ते नहीं होते। सत्ता तो मीडिया के ज़रिये अपना प्रॉपैगैंडा चला ही रही है, तंत्र से प्रश्न पूछने, व्यवस्था की आलोचना करने के नाम पर भी एक ख़ेमे का एजेंडा पोसा जा रहा है। दूसरे, क्या प्रतिक्रियावादी भर रह जाना पत्रकारिता है? पक्षपोषण के इस दौर में हमें कई तरह के कठिन सवालों से जूझना ही होगा।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) की साल 2025 की प्रेस फ़्रीडम की रिपोर्ट और रैंकिंग की चिंता है कि दुनिया में पत्रकारिता अपना सबसे ख़राब दौर देख रही है। इस रिपोर्ट के इन अंशों को समझना होगा:
- प्रेस की आज़ादी का दमन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में फैलरहा है, यह सूचना को नियंत्रित करने के चीनी तरीक़े से प्रेरित है।
- भारत (180 देशों में 151वीं रैंक) में राजनीति से जुड़े मुट्ठी भर समूह अधिकांश मीडिया पर कब्ज़ा रखते हैं।
- उत्तर कोरिया (179) चीन (178) और वियतनाम (173) में आउटलेट या तो राज्य के भोंपू हैं या उन समूहों के कब्ज़े में, जो सत्ता के चहेते हैं।
रिपोर्ट खुलकर कहती है प्रभावशाली उद्योगपति मीडिया के हाकिम हैं, उनके हाकिम सत्ताधारी हैं और मीडिया का उपयोग राजनीतिक-आर्थिक फ़ायदों के लिए रह गया है। पत्रकारिता को राष्ट्र की चैतन्यता मानने वाले, पश्चिम जर्मन पत्रकारिता के पितामह कहे गये पॉल सीथ ने एक बार जो तंज़ किया था, गूंजता है: “प्रेस की आज़ादी यानी 200 अमीरों को अपनी नीयत फैलाने की छूट।”
आरएसएफ़ के चार्ट में पाकिस्तान 158वें नंबर पर है। भारत 2024 में 159वें नंबर पर रह चुका है। दोनों मुल्कों में पत्रकारिता की क्या गत हो चुकी है, साफ़ है। नैशनल मीडिया के लिहाज़ से मूल्यों, किर्दार और औचित्य के मुद्दे तो अब अप्रासंगिक ही हैं, अब तो बड़ा सवाल यह है कि सूचना बची कितनी है! सत्ता तो सूचना के अधिकार की तरफ़दार है नहीं, समाज को भी कोई फ़िक्र नहीं। यह अधिकार ही क्या, पूरा लोकतंत्र ही एक छद्म में तब्दील दिखता है।
(यह व्यंग्य कार्टून सैनिटरीपैनल्स नाम के इंस्टा हैंडल से साभार। पिछले दिनों कुणाल कामरा के ख़िलाफ़ हुए घटनाक्रम पर केंद्रित यह कार्टून अभिव्यक्ति पर हमले के संदर्भ में प्रासंगिक है।)
और एक सिरा छेड़कर बात ख़त्म करता हूं। सरहदों पर संघर्ष के दौर में पाकिस्तानी मीडिया समूहों को देश में प्रतिबंधित किया गया। 13-14 मई को तुर्की और चीन के मीडिया आउटलेटों पर पाबंदी लगायी गयी। केंद्र ने कारण जिन शब्दों में बताया, ग़ौर कीजिए: ‘इरादतन भ्रामक सूचनाएं फैलाना ग़लत है, तथ्यों को क्रॉस एग्ज़ामिन और पुष्ट किया जाना चाहिए’। अब सोचिए देश (ख़ास तौर से हिंदी पट्टी) में, बड़े मीडिया समूह जो दिन-रात चीख रहे हैं, क्या इसी तर्क से उन पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए?
यक़ीन मानिए आप सूचनाओं से कोसों दूर कर किये जा चुके हैं। जो थोड़ी-बहुत गुंजाइश वैकल्पिक तौर पर बची भी है, कितनी देर की मेहमान है? कहना मुश्किल है। हम जैसे कुछ जो शायरी और डायरी दर्ज कर रहे हैं, बस.. आइए, इस नये दौर में, सूचना क्रांति के चरम पर सूचना-मुक्त समय में आपका स्वागत।
आपका
भवेश दिलशाद

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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(यह व्यंग्य कार्टून सैनिटरीपैनल्स नाम के इंस्टा हैंडल से साभार। पिछले दिनों कुणाल कामरा के ख़िलाफ़ हुए घटनाक्रम पर केंद्रित यह कार्टून अभिव्यक्ति पर हमले के संदर्भ में प्रासंगिक है।)
सूचनाओं को लेकर सबसे अधिक भ्रमित इस ऑपरेशन सिंदूर में रहे. इसके बाद यहां भी जश्न और वहां भी! समझ में ये नहीं आ रहा कि जीता कौन है! अपनी अपनी ढफ़ली और अपना अपना राग..हम कहें कि हम सूरमा और वो कहे कि हम! अब राष्ट्र भक्ति का नशा चढ़ा है – तुर्किये और अज़रबैजान का बहिष्कार करो ..क्या इतनी हिम्मत से डॉलर और अमेरिका का बहिष्कार कर सकते हैं?