कॉर्पोरेट, पत्रकारिता, हिंदी

भवेश दिलशाद की कलम से.... कॉर्पोरेट, पत्रकारिता, हिंदी              आपने कभी सुना दो धुर विरोधी...

गूंज | हरियश राय लिखित कहानी

सदियों से जन-मानस में शौर्य गाथा सुनाकर रग-रग में बिजली भर देने वाले आल्हा गायन ने कैसे दम तोड़ दिया?...

वैश्विक शिक्षण संस्थानों में हिंदी का भविष्य

डॉ. हंसा दीप की कलम से.... वैश्विक शिक्षण संस्थानों में हिंदी का भविष्य             भारत...

विघ्नहर्ता | शशि खरे लिखित लघुकथा

विघ्नहर्ता | शशि खरे लिखित लघुकथा             अब वे उकड़ू बैठे थक गये थे, सो...

अंक – 55

आब-ओ-हवा – अंक - 55 भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की एक और ख़ास कड़ी- हिंदी की चिंताओं और बातों पर केंद्रित। हिंदी रचनाओं के साथ ही कई...

दूर देस में हिन्दी के अपनों का मन-1

हिंदी की ज़मीनें... लंदन में बरसों से बसी हुई सुप्रसिद्ध साहित्यकार दिव्या माथुर जी के साथ हैरो-ऑन-हिल्स के एक कैफ़े में विवेक रंजन ने आब-ओ-हवा के लिए की साहित्यिक गुफ़्तगू... दूर देस में हिन्दी के...

तुलसिदास, tulsidas

स्याम गौर किमि कहउँ बखानी।
गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।
– तुलसीदास

तेरे जमाल की तस्वीर खींच दूँ लेकिन
ज़बाँ में आँख नहीं आँख में ज़बान नहीं
– जिगर मुरादाबादी

जिगर मुरादाबादी, jigar, jigar muradabadi

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हिंदी की ज़मीनें: परत-दर-परत

नियमित ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से.... हिंदी की ज़मीनें: परत-दर-परत             हिंदी पर बात शुरू करने से पहले साफ़ समझिएगा मैं जिसे हिंदी कहता, समझता हूं वह समावेशी भाषा...

‘क्वीन’ के बाद: हिंदी सिनेमा में स्त्री का पुनर्लेखन

'हिंदी की ज़मीनें' अंक में प्रसंगवश... इस स्तंभ में 21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन... नियमित ब्लॉग (भाग-13)...

संस्कृतियों का संगम: ऐतिहासिकता और आधुनिक संदर्भ

नियमित ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से.... संस्कृतियों का संगम: ऐतिहासिकता और आधुनिक संदर्भ              डाॅ. भोलाशंकर व्यास की कृति 'समुद्र संगम' को, जो भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई थी,...

मुशायरे: रिवायत, अहमियत और फ़ायदे

नियमित ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से.... मुशायरे: रिवायत, अहमियत और फ़ायदे मुशायरा उर्दू ज़बान व अदब की एक ज़िंदा और दीप्तिमान रिवायत है, जो शायरी की उन्नति, सांस्कृतिक मूल्यों (तहज़ीबी अक़दार) की शाश्वतता और...

सूचना के अधिकार या सवालों से परे है HPV वैक्सीन?

हिंदी की ज़मीनें... आमजन को जो टीके लगाये जा रहे हैं, उनकी प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों पर एक जनहित याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो रुख़ अपनाया, वह चिंता के दायरे में क्यों दिखता...

हिन्दी को बनाने दीजिए मुहब्बत का पुल

नियमित ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से.... हिन्दी को बनाने दीजिए मुहब्बत का पुल            ज़ुबानें दिलों के बीच एक राब्ता कायम करती हैं। इंसानों को इंसानों-सा बोलने का सलीक़ा सिखाती...

आख़िर हमें ‘एआई मैनेजर’ क्यों चाहिए?

हिंदी की ज़मीनें... वर्तमान समय में दुनिया में कृत्रिम बौद्धिकता शोध ही नहीं, उद्योग ही नहीं बल्कि आम जनजीवन में सर्वाधिक चर्चित विषयों में शुमार है। लेकिन क्या आप इस तकनीक के जीवन प्रभावित करने...

एरोल फ़्लिन: पर्दे के रॉबिनहुड की ड्रामाई ज़िंदगी

इस शृंखला में इस बार एक ऐतिहासिक स्टार की याद। उसका पूरा जीवन ही जैसे कई स्तरों पर एक सफ़रनामा रहा। अनुभवों का ख़ज़ाना और शोहरत का ज़माना और बदनामी- जैसे सब उसके नाम था।...

जब पुस्तकें ताबूत बन जाती हैं

नियमित ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से.... जब पुस्तकें ताबूत बन जाती हैं               किसी-किसी रात अचानक यह ख़याल आता है - हमने इतना कुछ लिख डाला, इतना...

सत्य एक अद्भुत भ्रम

नियमित ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से.... सत्य एक अद्भुत भ्रम              "हम सत्य नहीं पा सकते हैं।" -नोवालिसगैलीलियो ने एक सत्य को दिखाया। इसके कारण उन्हें अपने घर में...

भारतीय दर्शन और पर्यावरण चेतना

नियमित ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से.... भारतीय दर्शन और पर्यावरण चेतना             भारतीय संस्कृति में प्रकृति जड़ वस्तु, उपभोग की सामग्री या भूगोल की सीमा नहीं रही। उसे...

वशिष्ठ अनूप व आत्ममुग्धता की शिकार हिंदी ग़ज़ल

नियमित ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से.... वशिष्ठ अनूप व आत्ममुग्धता की शिकार हिंदी ग़ज़ल            हां! कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो हिंदी ग़ज़ल की दुनिया के प्रायः सभी...

कविता के देश मेडिलिन में

नियमित ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से.... कविता के देश मेडिलिन में              हालांकि मुझे आज तक नहीं मालूम कि मेडिलिन जैसे मशहूर फ़ेस्टिवल के लिए मेरा नाम उन तक...

हिंदी रंगमंच: संकट का ग्रहण बनाम रोशनी की उम्मीद

हिंदी की ज़मीनें.... एक रंगकर्मी की नज़र से समाज (विशेष रूप से हिंदी पट्टी का जनमानस), सत्ता और रंग-संस्कृति की बेबाक पड़ताल। पंकज निनाद की कलम से.... हिंदी रंगमंच: संकट का ग्रहण बनाम रोशनी की...

रंग बिरंगी: राजनैतिज्ञों-साहित्यकारों की चुटकियां-10

नियमित ब्लॉग विवेक मेहता की प्रस्तुति... रंग बिरंगी: राजनैतिज्ञों-साहित्यकारों की चुटकियां-10              हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को प्रस्तुत करने की इस शृंखला में...

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