हिंदुस्तान में उर्दू अदब का हाल मायूस करता है: ज़किया मशहदी

उर्दू अफ़सानानिगारों में महिलाओं के नाम भले ही उंगलियों पर गिने जाने लायक़ हों लेकिन उनका क़द अदब में काफ़ी...

क्यों बड़ी क्षति है के.एन. पनिक्कर का जाना?

शख़्सियत को जानें मनोज कुलकर्णी की कलम से.... क्यों बड़ी क्षति है के.एन. पनिक्कर का जाना?        ...

युद्ध की आग और शांति की राह

विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से.... युद्ध की आग और शांति की राह             इतिहास...

एनसीईआरटी बनाम न्यायपालिका

​आदित्य की कलम से.... एनसीईआरटी बनाम न्यायपालिका              सर्वोच्च न्यायालय ने जमकर लताड़ लगायी। एनसीईआरटी...

अंक – 47

आब-ओ-हवा – अंक - 47 भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की इस कड़ी में युद्धों के इस समय में एक हस्तक्षेप। शांति के पक्ष में लगातार हमारी आवाज़।...

अगर तीसरा युद्ध हुआ तो? …नीरज की यादगार कविता

गूंज बाक़ी... दुनिया के हालात के मद्देनज़र कैसे कोई कविता प्रासंगिक हो जाती है! गोपालदास नीरज की एक कविता जैसे फिर ज़िंदा हो गयी है। दशकों पहले कविता पढ़ते हुए नीरज की इन पंक्तियों में...

क़ाबिल अजमेरी, qabil ajmeri

रास्ता है कि कटता जाता है
फ़ासला है कि कम नहीं होता
– क़ाबिल अजमेरी

उम्र गुज़री हमें सफ़र करते
फ़ासला कम ज़रा नहीं होता
– जगजीवन लाल सहर

जगजीवन लाल सहर, jagjivan lal sehar

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तो क्या शांति बिल्कुल असंभव है?

पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से.... तो क्या शांति बिल्कुल असंभव है?            राष्ट्रगीत में भला कौन वह           भारत-भाग्य विधाता है           फटा...

आविष्कारक और सिनेमा का पहला जादूगर

मूक सिनेमा से एल्गोरिदम युग तक आ पहुंचे, सवा सदी से भी पुराने हो चुके सिनेमा को कितना जानते हैं आप? परदे पर न जाने कितनी ही कहानियां आपने देखी हैं, उनके बारे में पढ़ा...

आधुनिक युद्ध और कराहता पर्यावरण

पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से.... आधुनिक युद्ध और कराहता पर्यावरण प्राचीन काल के युद्धों की स्मृति मात्र ही हमें एक ऐसे युग में ले जाती है, जहाँ शस्त्रों का स्वरूप प्राकृतिक और...

क्या संकट में है हमारी एआई सम्प्रभुता?

पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से.... क्या संकट में है हमारी एआई सम्प्रभुता?            पहले यूक्रेन, फिर वेनेज़ुएला और अब ईरान। साम्राज्यवादी महाशक्तियों को जो देश पसंद नहीं है, उनकी...

क्यों ख़ास है ‘हासिल’? और यह न होती तो?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो एक टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से ​चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण... पाक्षिक ब्लॉग (भाग-5) मानस की कलम...

ज्ञानप्रकाश विवेक: हिंदी ग़ज़ल का ऊटपटांगपन

पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से.... ज्ञानप्रकाश विवेक: हिंदी ग़ज़ल का ऊटपटांगपन            ज्ञानप्रकाश विवेक हिन्दी साहित्य में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। इन्होंने हिन्दी साहित्य की कई विधाओं...

बदलती परिभाषा! प्रश्न करना विज्ञान-विरोध नहीं

पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से.... बदलती परिभाषा! प्रश्न करना विज्ञान-विरोध नहीं            जो शुरूआत बेहतर पहचान (detection) से हुई थी, वह धीरे-धीरे स्वयं “रोग” की परिभाषा को बदलने...

आंखें छीनकर तो रोशनी न दिखायी जाये

पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से.... आंखें छीनकर तो रोशनी न दिखायी जाये            हिंदुस्तानी परिप्रेक्ष्य में मज़हबी जलसे इस तरह होते हैं जैसे हम हर दिन उठते हैं और...

लय: अर्थ से पहले का क्रम

पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव की कलम से.... लय: अर्थ से पहले का क्रम ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा की यह तीसरी कड़ी। जीवन लय है। लेखन उसी लय का अनुवाद। हम अर्थ...

लोककला में क्या कुछ नया होता ही नहीं?

पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से.... लोककला में क्या कुछ नया होता ही नहीं?        पिछली कड़ी में हमने कलावंत कुम्हार कालीपद जी के उस प्रसंग पर दृष्टि डाली कि उन्होंने संथाली...

समाज में बदलाव की कथा और एक सवाल

पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से.... समाज में बदलाव की कथा और एक सवाल          लेखिका रीता दास राम की पहचान मूलत: एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में है। उनके दो...

ग़ालिब को महान बनाने वाली पहली किताब

पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से.... ग़ालिब को महान बनाने वाली पहली किताब मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली की "यादगार-ए-ग़ालिब" एक बायोग्राफ़िकल और क्रिटिकल किताब है, जो मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब के व्यक्तित्व, जीवन शैली...

बाज़ारों से पहाड़ों तक ‘बर्गन’ के रंग

पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से.... बाज़ारों से पहाड़ों तक 'बर्गन' के रंग            बर्गन, नॉर्वे के दक्षिण में बसा छोटा-सा प्रान्त है। ओदवे क्लीवे ने पूरा इंतज़ाम किया था...

एक अध्ययन: कैरिकेचर और कार्टूनिंग से मीम्स तक

पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से.... एक अध्ययन: कैरिकेचर और कार्टूनिंग से मीम्स तक               परंपरागत रूप से व्यंग्य को शब्द-केंद्रित विधा माना जाता रहा है लेकिन...

नामचीन साहित्यकारों के चुटीले प्रसंग-2

पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से.... नामचीन साहित्यकारों के चुटीले प्रसंग-2            हिंदी साहित्य जगत में एक ऐसा दौर था, जब बड़े हस्ताक्षर प्रतिष्ठित हो रहे थे, स्थापित हो रहे...