पश्चिम बंगाल: क्या हुआ, क्यों और अब क्या?

ख़ुर्शीद मलिक की कलम से.... पश्चिम बंगाल: क्या हुआ, क्यों और अब क्या?            अब जबकि...

जो है मेरा है, अपने समय का सच है

मेरे हिस्से का क़िस्सा... आब-ओ-हवा पर एक विशेष शृंखला। उम्र और सृजन का बेहतरीन सफ़र कर चुके हस्ताक्षरों की कहानी,...

ईरानी सिनेमा में प्रतिरोध और मानवतावाद

प्रासंगिकता के चलते आब-ओ-हवा पर प्रस्तुति के लिए 'हम देखेंगे' पत्र से विशेष रूप से प्राप्त, ईरानी सिनेमा पर यह...

अख़बारनवीसी: वे एक सौ अड़सठ साल

'हिंदी पत्रकारिता के 200 साल' के संदर्भ में विशेष प्रस्तुति... यह आलेख 'समग्र भारतीय पत्रकारिता' ग्रन्थ की समीक्षा नहीं, बल्कि...

अंक – 51

आब-ओ-हवा – अंक - 51 भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की इस कड़ी में चुनाव के बाद के परिदृश्य का जाएज़ा विषय विशेषज्ञ के नज़रिये से। हिंदी पत्रकारिता...

अध्ययन को व्यसन बना देने वाली किताब

(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे... मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का...

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर, ghulam mohammad qasir

है शौक़-ए-सफ़र ऐसा इक उम्र से यारों ने
मंज़िल भी नहीं पायी रस्ता भी नहीं बदला
– ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

कोई मंज़िल भी नहीं है कोई रस्ता भी नहीं
और सब मह्व-ए-सफ़र हैं कोई रुकता भी नहीं
– बलबीर राठी

बलबीर राठी, balbir rathi

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FIR पे FIR, शायरी से इतनी दिक्कत क्यों?

पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से.... FIR पे FIR, शायरी से इतनी दिक्कत क्यों?             जहां साहित्यिक चेतना दम तोड़ देती है, वह समाज मुर्दाघर से अधिक कुछ नहीं...

चार्ली चैपलिन: परदे के पीछे की पूरी कहानी

पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से.... चार्ली चैपलिन: परदे के पीछे की पूरी कहानी नमस्कार साथियो, कैसे हैं आप सब? दोस्तो, सिनेमा - विश्वकथा की शृंखला में हम आज जिस महारथी से आपको रूबरू...

अपने साइलेंस ज़ोन के विकास का समय

पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से.... अपने साइलेंस ज़ोन के विकास का समय          पर्यावरण पर विमर्श करते समय हमारी दृष्टि अक्सर उन संकटों पर ठहरती है, जो प्रत्यक्ष दिखायी...

क्या धर्म को लेकर पक्षपाती है एआई?

पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से.... क्या धर्म को लेकर पक्षपाती है एआई?               कथावाचक, गुरु, मौलवी, पादरी अथवा धार्मिक विद्वान धर्मग्रंथों की व्याख्या करते आये हैं। इन्हीं...

दुर्लभ भारतीय फिल्म क्यों है ‘आँखों देखी’?

21वीं सदी के 25 वर्षों में से वो 25 भारतीय फ़िल्में, जो टर्निंग पॉइंट साबित हुईं। एक युवा फ़िल्मकार की दृष्टि से चयन और इन फ़िल्मों का दस्तावेज़ीकरण... पाक्षिक ब्लॉग (भाग-9) मानस की कलम से...

हिन्दी ग़ज़ल में डॉ. उर्मिलेश

पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से.... हिन्दी ग़ज़ल में डॉ. उर्मिलेश           डॉ. उर्मिलेश, दुष्यंत कुमार के बाद की पीढ़ी के महत्वपूर्ण ग़ज़लकार रहे। इन्होंने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से...

‘ज़हरीले खाने’ का डर, क्या है पूरा सच?

यह लेख दिखाता है कैसे चयनात्मक घटनाएँ, भावनात्मक भाषा, दोहराये गये नैरेटिव और समन्वित ऑनलाइन प्रवर्धन" (coordinated online amplification) मिलकर जनता का भरोसा पारंपरिक खाद्य व्यवस्था से कमज़ोर कर सकते हैं। और ठीक उसी समय,...

बोलती, ठहरती, दिखती, छुपती आवाज़

पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से.... बोलती, ठहरती, दिखती, छुपती आवाज़ ग़ौर से सुनिए। कोई आवाज़ दे रहा है। यह आवाज़ तो जानी-पहचानी-सी लग रही है। कब सुनी होगी! कहीं सुनी हुई-सी लग रही...

ध्वनि, शब्द, चेतना… लेखन के आयाम

पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से.... ध्वनि, शब्द, चेतना... लेखन के आयाम            ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा की सातवां अध्याय... लेखन— यह शब्द जितना सरल...

संगीत का चित्रकला में रूपांतरण-1

नियमित ब्लॉग ब्रजेन्द्र शरण श्रीवास्तव की कलम से.... संगीत का चित्रकला में रूपांतरण-1             संगीत का चित्रकला में रूपांतरण: कैसे और कितना सम्भव? बैजू बावरा फ़िल्म में एक दृश्य है:...

‘लड़ते हुए लोग’ श्रमिक संघर्ष की कहानियाँ

पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से.... 'लड़ते हुए लोग' श्रमिक संघर्ष की कहानियाँ।         संघर्षरत औद्योगिक श्रमिकों पर केंद्रित कहानी-संग्रह 'लड़ते हुए लोग' की कहानियों से गुज़रना पाठकों को एक नये...

मंटो की वह किताब, जिससे जन्मी नयी विधा

पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से.... मंटो की वह किताब, जिससे जन्मी नयी विधा सआदत हसन मंटो उर्दू कथा साहित्य (अफ़सानवी अदब) के नायक हैं। प्रेमचंद के बाद जिन उर्दू कहानीकारों (अफ़साना निगारों) ने...

रोम एक दिन में नहीं बना…

पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से..... रोम एक दिन में नहीं बना...               दूसरा दिन इतना आसान नहीं था, क्योंकि वीज़ा की प्रक्रिया बाक़ी थी। मैंने अपना सामान...

सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन-2

पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से.... सिनेमा में व्यंग्य: भारतीय संदर्भ में अध्ययन-2         इस लेख की पिछली कड़ी में सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक श्रेणियों में सिनेमाई व्यंग्य का जायज़ा...

नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-6

पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से.... नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-6              पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया...

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