
जी ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुरसत कि रात-दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानां किये हुए
– मिर्ज़ा ग़ालिब

अब मयस्सर नहीं फ़ुरसत के वो दिन रात हमें
ले उड़ी जाने कहां सरसर-ए-हालात हमें
– शकेब जलाली


जी ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुरसत कि रात-दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानां किये हुए
– मिर्ज़ा ग़ालिब

अब मयस्सर नहीं फ़ुरसत के वो दिन रात हमें
ले उड़ी जाने कहां सरसर-ए-हालात हमें
– शकेब जलाली


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