द्वंद्व के वैभव की कथा चेखव का 'द डुएल'

द्वंद्व के वैभव की कथा चेखव का 'द डुएल'

         एक उपन्यास मैंने कभी पढ़ा था, जिसकी शुरूआती पंक्तियों में ही यह कह दिया जाता है कि हमारा किरदार      चेखव के किरदारों की तरह गुणों-अवगुणों के बीच झूलने   वालों में से नहीं है जिन्होंने मानो ज़िंदगी में कभी ख़ुशी ही न   देखी हो। चेखव की कहानियाँ हम सभी ने पढ़ी हैं- और ड्रामा भी। अपने मनोरंजक तत्व के कारण अक्सर वह इस तरह   रूखी नहीं लगती हैं जैसे अन्य रूसी उपन्यासकारों की कहानियाँ। चेखव की अपेक्षाकृत छोटी कहानियों के बरअक्स उसकी दो कहानियाँ बहुत प्रभावी रही हैं जिनमें से एक है ‘द डुएल’। इसमें रूसी कहानियों का प्रचलित नैतिक-दार्शनिक संघर्षों और तनावों वाला नमक भी है और कभी-कभी उबा देने वाली संजीदा गति भी।  

          ‘द डुएल’, नैतिक-संघर्ष, निर्णय लेने के साहस और चुनाव करने के विवेक के बीच उलझे-सुलझे किरदारों पर लगभग सौ पेजों में लिखी गयी लम्बी कथा (नॉवेला) है। इसके केंद्र में इवान आंद्रेइच लैव्स्की है, जो ख़ुद को नाकामयाब, ग़ैर-ज़रूरी, ऊबा और अघाया हुआ एक बुद्धिजीवी मानता है जो जीवन की किसी सम्भावना को पूरा नहीं कर सका है। वो नादेज्दा फ़्योदरोव्ना नाम की एक शादीशुदा औरत के साथ सम्बन्ध में है लेकिन अनिर्णय के चलते, अपने सम्बन्ध और इस पूरे संसार से दूर पीटरस्बर्ग भाग जाना चाहता है जहाँ उसके जैसे ‘पढ़े-लिखे’ लोग और दुनिया मौजूद है।वह नादेज्दा के पति की मौत की ख़बर भी उससे छुपा लेता है ताकि शादी का दबाव न आये। चेखव, इस कथा में दूसरी तरफ समोयलेंको, जो एक डॉक्टर है, और वॉन कोरेन, जो एक सख़्त मिज़ाज का जीव-विज्ञानी है, के ज़रिये लैव्स्की की नैतिक गिरावट और अविवेक को सामने लाते हैं।

         चेखव इस कथा में वही कर रहे थे जो तत्कालीन रूसी साहित्य में हो रहा था- कि वैचारिक और नैतिक संघर्षों की कसौटी और भूमि क्या हो? जो ‘ब्रदर्स करमाज़ोव’ की और ‘रिज़रेकशन’ की बहसों में हो रहा था- कि सबसे दिलफ़रेब और सबसे उपयुक्त विचारों का भी जीवन की कठोरता में प्रासंगिक बने रहना संभव है? लैव्स्की अपने अवसाद से पूरी तरह मुतमईन है। वह नैतिक अक्षमता और अपनी कायरता के लिए सामाजिक पतन को दोष देता है। कोरेन, लेव्स्की को समाज का एक सड़ा हुआ हिस्सा मानता है जो अब अप्रासंगिक है तथा जिसमें बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। चेखव के संसार में किरदारों के बीच इसे ही हमारे समाज की “आइडिओलॉजिकल पॉज़िशन” कहा जाएगा। ‘डुएल’ में किरदार एक दूसरे पर बन्दूक भले ही तान दें, चेखव के पास इस तनाव से भटकाने के लिए कथा में ही तोड़ हैं जो वापिस लेव्स्की-कोरेन को उस जगह ले आते हैं जहाँ उनका ह्रदय परिवर्तन हो जाये। जहाँ न लेव्स्की विजयी है न ही कोरेन। निर्णय लेने का नैतिक साहस और इससे जुड़ा द्वंद्व ही कथा का रूपक ‘डुएल’ है। यह नॉवेला, द्वंद्व के वैभव की कथा है।

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निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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