
- June 24, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
छवि काव्य : चित्र पर कविताएं
किसी वस्तु से निकलने वाले विकिरण को किसी संवेदनशील माध्यम पर रेकार्ड करके जब कोई स्थिर छवि बनायी जाती है तो छायाचित्र बन जाता है। एक छायाचित्र भी संवेदना जागृत करने का सबब होता है। एक मौज़ूं तस्वीर न जाने कितने कितने विचारों को जन्म देती है। जो अभिव्यक्ति का एक सुन्दर और विरेचक प्रतिदर्श होता है। एक फ़ोटो/छवि में हमेशा कोई कहानी या कविता छिपी होती है… यहां प्रस्तुत है एक तस्वीर जिसे डॉ. नीरज शक्ति निगम ने खींचा, उस पर आयीं इन कविताओं को पढ़कर हम और अधिक संवेदना समृद्ध होंगे।
– ब्रज श्रीवास्तव (संपादक-काव्य प्रस्तुति)

1. पार्क की बेंच पर
इस रंग बिरंगी
दुनिया के तौर-तरीकों से
विस्मित सा
पार्क की बेंच पर
बैठा था एक बूढ़ा
आश्वस्त करना चाहता हूं
उसे कुछ शब्दों से
पर बचा लेता हूं वे शब्द भी
जब जीवन्त लगता है
इस बेढंगी दुनिया में
एक चकित सा बूढ़ा।
—विजय पंजवानी
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2. स्मृतियों पर चिंतन
जब भी कहीं मिलते हैं युवजन,
प्यार भरी बातें करते हैं
जीवन सफर की राह में,
चलते चलते
आगत के अनगिन
सपने सजाते रहते हैं
जब आता हैं
उम्र की ढलती सांझ का मंजर
तब वे बैठ अकेले
बगीचे में कहीं
विगत की संजोई अपनी
स्मृतियों में खो जाते हैं,
ये स्मृतियां ही हैं
जो उन्हें
युवा बनाए रखती है,
जीने का साहस देती है,
कभी कभी वे सोचते हैं
ये प्रकृति कभी
बूढ़ी होती नहीं,,,
बस ! मौसम के अनुरूप अपना
चेहरा बदल बदल कर हमको जीवन जीने की राह बताया करती है,
स्मृतियों के झूले पर
खूब झुलाया करती है.
—अरुण सातले
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3.
पता नही कहां से चला था?
यहां तक चला आया
जरा रुककर देखा तो
मेरे हाथों से होकर समय
न जाने कहां चला गया?
मृग मरीचिका में जकड़ा रहा
दुनियादारी में उलझा रहा
जाने अनजाने मेरे अपने
होते गए बेगाने
गाता रहा मैं औरों के तराने।।
मेरी दुनिया सिमट रही है
परायों के बीच सिसक रही है
अपनों से हुआ जरा सा दूर
लगता है कहीं खो गया मेरा नूर।।
—विश्वनाथ कदम
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4.
फिर विस्मृतियों में से
खोज रहा हूँ
उन स्मृतियों को
जो अभी सरक गई है
हाथों से
रेत की तरह
समा गई है रेत में
कि बूंद पानी की
बिला जाती है पानी में
कठिन है
पर इतना भी कठिन नहीं
अपनी यादें
भले ही गड्ड-मड्ड हो
पर एक बेचैनी के बाद
हल्का सा सुकून दे ही जाती है
—सुधीर देशपांडे
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5. याद है सब
भूल जाना वैसे भी
सबसे कठिन काम है—
याद है सब—
तुम्हारी सभी खामोश बातें
शब्दशः
कुछ बूँदे गिरी हैं आसमान से अभी
गोया
तुम्हारे बालों के छाँव ने
दुलराया है अभी
वही बेंच,वही पार्क,सामने वही जवान से बूढ़ा हुआ पेड़
यही पे सालों पहले
तुम्हारे पैर के अंगूठे से कुरेद कर
ज़मीन पे बनाये गड्ढे में जमा पानी
जैसे अंतिम दिनों में बिस्तर पे असहाय पड़ी तुम
और आँखो से निकला आँसू
सब यही मौजूद हों
और तुम मेरा हाथ पकड़कर
कह रही हो
ख़ुश रहना
सामने पेड़ पर बना घोसला भी
वीरान है
नीचे गिरा पीला पत्ता और मैं
दोनों कुछ बचे साँसो पर
बस ज़िंदा है
शायद…
—अजय श्रीवास्तव अजेय
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6. सफर में अक्सर
सफर के बाद
बुजुर्ग अक्सर सोचते हैं
तय किए रास्ते के बारे में
करते हैं याद
रुकावटों और कठिनाइयों को
मुश्किल होता है
अकेले रास्ता तय करना
सफर का …
और जीवन का भी
उधर
आज का युवा
रास्ता तय करने के बाद
हर्ष और उल्लास से मनाता है उत्सव
भूल जाता है सफर की ठोकरों को
चाय की चुस्कियों में
क्योंकि
एक अदद हाथ है साथ में
और
हमदम है पास में
—पद्मा शर्मा, ग्वालियर
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7. बेंच
बेंच—
पार्क की हो या प्लेटफार्म की
कोने वाली ही चुनता है वह
जो खाली मिल ही जाती हैं अक्सर
धुंधली शाम के वक्त
बहुत सुकून देती है बैंच की पीठ
बंद आँखों को
थके-थमे शरीर को
थमता नहीं लेकिन अप-डाउन
दिमाग की पटरी पर
विचारों की रेलगाड़ियों का
दौड़ती रहती हैं —
यहाँ से वहाँ — वहाँ से यहाँ
कुछ मिनट बैंच से मौन संवादकर
चल देता है वह
कभी तेज कभी थके कदमों से
उस ओर
जहाँ जाना चाहिए उसे, इस वक्त
इन फुर्सत के पलों में
घूम आता है उसका दिल
बचपन, व्यापार, परिवार के
बनते-बिगड़ते संसार में
बेंच कहीं नहीं जाती.
—राजेंद्र श्रीवास्तव
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8. अकेला चुपचाप बैठा बूढ़ा आदमी
एक बूढ़ा अकेला आदमी
जब बैठा हो अकेला चुपचाप
हो सकता है वह
चुपचाप ना हो बैठा
वह बतिया रहा होता है
अपने दुःख से, चिंता से
हारी बीमारी से
अपने आप से,
अपने बचपन,गांव, घर ,
मां पिताजी से चुपचाप
भीतर ही भीतर
वह याद कर रहा हो
साथ में पढ़ी उस लड़की को
जिसका हंसना उसे सबसे
अधिक पसंद था जिसकी
शादी दूर देश के किसी
धनी आदमी से हो गई थी
और इस शहर में आ गया था
नौकरी की तलाश में
हो सकता है वह सोच रहा हो
अपने सबसे अच्छे मित्र को।
जिसने हर कदम पर दिया हो साथ
या उन लोगों को भी जिन्होंने
उससे कभी की थी कोई
बदसलूकी
वह गुनगुना रहा हो कोई
आवारा, श्रीमान 420, तीसरी
कसम फिल्म का गाना, याद
कर रहा महुआ घटवारन की कथा
या कबीर तुलसी रहीम का कोई
दोहा,
वह हंस रहा हो खुद की
नादानियों पर,
हो रहा हो
दुःखी, उन तमाम सपने पर
जो,अब तक पूरे नहीं हुए,
लगा हो,घर परिवार की
कोई परेशानी को सुलझाने
मन ही मन
वह तैर रहा इस समय
किसी नदी तालाब में भाग
रहा ही बारिश की बूंदों में
निकला हो सपत्नीक
तीर्थाटन पर,
कर रहा हो ऑफिस में अधिकारी
से किसी बात को लेकर बहस
या बाज़ार में चिक चिक
सौदा लेते हुए
मैने देखा है,
अकेला चुपचाप बैठा
बूढ़ा आदमी, अक्सर
निर्विकार नहीं होता
अकेला चुपचाप बैठा
बूढ़ा आदमी
बुद्ध नहीं होता
—मिथिलेश राय
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9. वक्त
दौर जीवन के गुजरते जाते हैं
खट्टे मीठे लम्हे याद बन कर
साथ रह जाते हैं
यादों के गलियारे ने फिर
दरवाज़ा खोला है
बीता वक्त रह रह कर याद आता है
जवानी बीती बुढ़ापा आ गया
कब वक्त रेत की तरह हाथ से
फिसल गया
वक्त ने ये समझने का भी वक्त न दिया
अब यादें शेष हैं गुज़रे लम्हों की
जिन में शामिल मित्र मण्डली, परिवार
बच्चे और बचपन के यार
चुराते आम बगिया से कब बड़े हो गए
जिम्मेदारियां निभाते निभाते
जी भर भी जी न सके
जीवन की सांझ में
तन्हा रह गए
—जया श्रीवास्तव
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10.
बहुत धीरे से खींचता है कोई मेरी खाल
कि मैं चीख नहीं पाता
बहुत प्यार से उतरता है मेरी छाल
की मैं रो नहीं पाता
भीतर चला रहा है कोई आरी
बड़ी प्यारी मनोहारी
ऐसी कि बोल नहीं पाता
भीतर देख रहा हूं
सब कुछ
पर है अव्यक्त की अभिव्यक्ति।
—हीरालाल नागर
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11.
अतीत को देखकर सामने
कहीं खो से गए
सपने और यथार्थ
गडमड… गडमड हो गए
मन की जमीन पर उगा
विगत करता याद
वे सुहाने दिन
सुनहरी रातें
बेफिक्री का आलम
साथी जब था साथ।
खुले आसमान तले
छोटे सी दुकान को
ढंकता हँसी का चंदोवा
नीचे कुर्सियों पर जमे हम
चाय की चुस्कियों के वे दौर
आज के खाली समय को
जैसे भरता हुआ
आ गया याद
तड़पा गया।
—अनिता रश्मि

ब्रज श्रीवास्तव
कोई संपादक समकालीन काव्य परिदृश्य में एक युवा स्वर कहता है तो कोई स्थापित कवि। ब्रज कवि होने के साथ ख़ुद एक संपादक भी हैं, 'साहित्य की बात' नामक समूह के संचालक भी और राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार भी। उनके आधा दर्जन कविता संग्रह आ चुके हैं और इतने ही संकलनों का संपादन भी वह कर चुके हैं। गायन, चित्र, पोस्टर आदि सृजन भी उनके कला व्यक्तित्व के आयाम हैं।
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यथार्थ बयां करती हुई कविताएं,उम्र का इस मोड़ पर सबको आना है ।
चित्रानुकूल कविताओं को संजोने के लिए बधाई व धन्यवाद ब्रज जी