
- May 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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तुम अपना रंजो-ग़म.. मुझे दे दो
फ़िल्म के पर्दे पर तो नायक की भूमिका कई निभाते हैं पर असल जीवन में नायक बहुत कम लोग हो पाते हैं। प्रेम की हज़ारों कहानियां सिनेमाहॉल में देखी जाती हैं और भुला दी जाती हैं। बड़े-बूढ़े कहते हैं यह सब छद्म है, वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता। लाखों-करोड़ों में कोई होता है, जो प्रेम करता है, निभाता है, उसे इस तरह जीता है कि दुनिया से फ़ना होकर भी अपने पीछे एक सच्ची प्रेमकथा छोड़ जाता है।
एक ऐसा फ़िल्म अभिनेता जिसका फ़िल्मी करियर भले कुछ ख़ास नहीं रहा, पर वह अपने सम्पूर्ण जीवन में बड़ा किरदार निभा गया। उस लाजवाब अभिनेता का वास्तविक नाम था शशि रेखी और फ़िल्मी नाम कमलजीत सिंह, 1931 में जन्मे कमलजीत अच्छे-ख़ासे लंबे, मज़बूत क़द-काठी के आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। रईस होते हुए भी पैसों के लिए छोटी-मोटी नौकरी की, पर उनकी दिली तमन्ना अभिनेता बनने की थी।
उस दौर में हिन्दी सिनेमा में एक से एक अभिनेताओं की धूम थी। अपनी इस यात्रा में कमलजीत को पहला मौक़ा दिया उस ज़माने के मशहूर फ़िल्मकार किशोर साहू ने। वही किशोर साहू जिन्होंने गाइड फ़िल्म में वहीदा रहमान के पति की भूमिका निभाई थी। हालांकि साहू ने फ़िल्म में लेने के पहले कमलजीत को अभिनय की बारीक़ियां सीखने के लिए प्रशिक्षण लेने को कहा।
कमलजीत ने बतौर सह-अभिनेता शगुन, तमाचा, हीर रांझा, मि. इंडिया, सन ऑफ़ इंडिया सहित कुल 13 तेरह फ़िल्मों में काम किया। इनमें से केवल दो फ़िल्मों के अलावा बाक़ी सभी औसत दर्जे की रहीं। हालांकि कमलजीत का फ़िल्मी सफर 1956 की “क़िस्मत का खेल” और “मि.लंबू” से शुरू हुआ पर नयी ऊंचाई मिली 1964 में आई फ़िल्म “शगुन” से। इस फ़िल्म ने उन्हें केवल नाम ही नहीं दिया बल्कि जीवन को नया रंग भी दिया। इसी फ़िल्म के दौरान उनकी पहली मुलाक़ात वहीदा रहमान से हुई और प्रेम परवान चढ़ा। आगे चलकर 1974 में दोनों सदा के लिए एक-दूजे के हो गये। शगुन फ़िल्म से एक और क़िस्सा “तुम अपना रंजो ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो” गीत के संदर्भ से है। हुआ यूं कि मशहूर संगीतकार ख़य्याम की हालात ठीक नहीं थी कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें काम मिलने में दिक़्क़त हो रही थी। उन्हीं दिनों इस फ़िल्म के लिए उनकी पत्नी जगजीत कौर ने ख़य्याम द्वारा संगीतबद्ध और साहिर के लिखे इस नग़मे को अपनी अमर आवाज़ दी। इस गीत ने ख़य्याम को अव्वल दर्जे के संगीतकार के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी।

वैसे कमलजीत मशहूर अभिनेत्री प्रिया राजहंस के भाई थे। चाहते तो फ़िल्मों में कुछ दिन और रह सकते थे पर शेक्सपियर ने कभी कहा था, जोड़े ऊपर से बनकर आते हैं। इस लिहाज़ से कहा जा सकता है कि कमलजीत और वहीदा एक-दूसरे के लिए आसमान से ही बनकर आये थे। शादी के बाद अभिनेत्रियों का फ़िल्में छोड़ देना तो आम रहा है लेकिन वहीदा से शादी के बाद कमलजीत ने फ़िल्मों को अलविदा कहा और अपने निजी व्यवसाय में लग गये। वहीदा को उन्होंने फ़िल्मों में काम करने से कभी नहीं रोका। कमलजीत ने वहीदा जी से सच्चा प्रेम किया और बख़ूबी उसे निभाया। उनकी सच्ची मोहब्बत का प्रमाण यही था कि वह वहीदा और गुरुदत्त के बीच रहे प्रेम संबंध को भली भांति जानते हुए भी हिचकिचाये नहीं, शादी की, किंतु इस बात को लेकर कभी भी उनका वहीदा से कोई मनमुटाव व झगड़ा नहीं रहा।
साल 2000 में इस सच्चे किरदार ने इस फ़ानी दुनिया से विदा ली पर अपने पीछे इंसानी रिश्ते की एक मिसाल छोड़ गया।

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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