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शेरगोई

"थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है"

विजय कुमार स्वर्णकार

 जिस तरह शे’र में भर्ती के शब्द जाने-अनजाने अपनी जगह बना लेते हैं, उसी तरह कभी-कभी कुछ ज़रूरी शब्द अपनी जगह नहीं बना पाते हैं। तात्पर्य यह है कि कुछ ज़रूरी शब्द शे’र के टेक्स्ट में होते ही नहीं हैं इसके बावजूद शे’र प्रथम दृष्टया पूरा प्रतीत होता है। एक शे’र देखिए 

उतार तो लिया गया है स्वर्ग से ज़मीन पर
बिका हुआ है एक-एक पुष्प पारिजात का 

       पहली पंक्ति में तैनात “तो” शे’र  में अपने मित्र “मगर” को न पाकर दुखी लग रहा है। “तो” की आबरू के लिए शे’र यूं कहा जा सकता है।

उतार लाये स्वर्ग से ज़मीन पर इन्हें, मगर
बिका हुआ है एक-एक पुष्प पारिजात का 

       क्या ये कुछ बेहतर हुआ? मेरा मूल ध्येय शे’र में सुधार करना नहीं है। कई बार यह कहा जाता है कि किसी शब्द विशेष के लिए शे’र में जगह नहीं बन पा रही है अर्थात् शब्द फिट नहीं हो रहा है, उनके लिए यह उदाहरण प्रस्तुत है। अगर आप प्रयत्न करते हैं तो भाव चाहे जितना जटिल हो उसे सरलतम अवस्था में प्रस्तुत किया जा सकता है। पुनः ध्येय पर लौटते हैं कि शे’र में कभी-कभी बहुत ज़रूरी शब्द को जगह नहीं मिलती है, जिससे शे’र कमज़ोर होता है।

      एक और झकझोर देने वाला शे’र देखिए। यह शे’र मानवीय संवेदनाओं को समेटे हुए है और मनुष्यता को परिष्कृत कर सकने की शक्ति धारण किये हुए है:

“तड़पता देखकर बोला शिकारी
निशाना चूक जाना चाहिए था”

      शिकार को तड़पते देखकर शिकारी की प्रतिक्रिया है इसमें। परपीड़ा की अनुभूति भी अचूक निशानेबाज़ होती है और वह भी शिकारी का दूसरी तरह शिकार करने में सक्षम होती है। इस शे’र में सब ठीक लगता है लेकिन किसका तड़पना? ज़ाहिर है शिकार का तड़पना। बिल्कुल ठीक बात है। फिर भी, शिकार के ज़िक्र के बग़ैर शे’र में कुछ कमी-सी लग रही है? क्या यूं कहने से कुछ बात बनती है :

“तड़पते मृग से यह बोला शिकारी
निशाना चूक जाना चाहिए था” 

       ऐसा कहने से क्या मूल शे’र के कथ्य में परिवर्तन हो जाता है? संकेत के लिए एक परिवर्तन मैं चिन्हित कर देता हूँ। शिकारी किससे बोला, यह अस्पष्ट था। यह शे’र में संभावनाएं पैदा कर रहा है। एक- वह स्वयं से कह सकता है; दूसरा वह जो कहीं पास ही खड़ा कोई दर्शक या साथी हो, उससे कह सकता है; तीसरा स्वयं शिकार से। परिवर्तन के बाद यह सीमित हो गया, अब वह शिकार से कह रहा है। शाइर शब्दों के संयोजन से अनुभूतियों और अनुभवों के द्वार खोलता है। आम पाठक इस संयोजन की सीमाओं को अपने अनुसार तय करता है और कभी-कभी उनसे परे जाकर भी अपने अर्थ ग्रहण करता है। मूल शे’र में अनेक मामूली परिवर्तन किये जा सकते हैं। प्रत्येक टेक्स्ट से कुछ नये पहलू उजागर होने लगेंगे। यहां मेरा मंतव्य केवल इतना है कि शे’र के टेक्स्ट के प्रति सजग रहा जाये। एक और शे’र देखिए, एक कठिन रदीफ़ का निबाह है इसमें…

“हालात-ए-जिस्म, सूरत-ए-जां और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहां और भी ख़राब”

      “और भी ख़राब” का पंक्ति के अंत में आना यह आग्रह करता है कि आगे किसी अन्य ख़राबी का विवरण या संकेत हो। दूसरी पंक्ति जितनी स्पष्ट है उतनी पहली नहीं है। शायर  का मंतव्य क्या रहा होगा? जिस्म के हालात ख़राब हैं, जान की सूरत और भी ख़राब है। अगर यही है तो पहली पंक्ति का पाठ अधूरा प्रतीत होता है। “ख़राब” “हालाते जिस्म” से जुड़ नहीं रहा है। यह शे’र इतनी तीव्र संवेदनाओं से लैस है कि प्रायः इस ओर ध्यान नहीं जाता है। पाठक आगे बढ़कर इसकी इच्छित संवेदनाओं को ग्रहण कर लेता है। यहां चर्चा का ध्येय अलग है। टेक्स्ट क्या कहता है और उसे मंतव्य के अनुसार क्या/ कितना/ कैसे  कहना चाहिए।

      अब यह चुनौती है कि इस ज़रूरी “ख़राब” के लिए जगह कैसे बनायी जाए। ज़ाहिर है किसी शब्द को हटाना होगा। वह शब्द है “हालाते जिस्म”। शे’र के मंतव्य के लिए यह शब्द ज़रूरी प्रतीत होता है। “जिस्म के हालात ख़राब, जान की सूरत और भी ख़राब” यह तर्कसंगत है। लेकिन कुछ विकल्प देखिए :

सूरत ख़राब, सूरत-ए-जां और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहां और भी ख़राब 

“सूरत” के अनेक अर्थ हैं। यहां मदद करेंगे। अगला विकल्प:

“मौसम ख़राब, मौसम-ए-जां और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहां और भी ख़राब”

      यह दूसरी पंक्ति से बेहतर ढंग से जुड़ रहा है। मूल शे’र से छेड़छाड़ का मेरा कोई इरादा नहीं है। यह अभ्यास के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। शे’र में शब्द और भाव का संतुलन बनाये रखना शायर का ध्येय होना चाहिए, असंतुलन को चिन्हित करना भी… ऐसे अनेक शे’र हैं जिन्हें देखकर लगता है- थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है। ज़िंदगी और शे’र में एक समानता यह भी देखी जा सकती है।

विजय कुमार स्वर्णकार, vijay kumar swarnkar

विजय कुमार स्वर्णकार

विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में ​सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

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