
- June 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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एक नरगिस का सफ़रनामा..
एक दृश्य शुरू होता है, एक युवक एक युवती के साथ चाय वाले के पास पहुंचकर चाय मांगता है लेकिन श्रीमान 420 कड़का है। पैसे नहीं हैं। चाय के पैसे युवती देती है। ढलती शाम दूर तक जाती है, लैंपपोस्ट की रौशनी में झिलमिलाती खुली सड़क, झमाझम बारिश और समंदर से आती तेज़ हवा में, एक छतरी के नीचे राज और विद्या दोनों, साथ ही अप्रतिम जनवादी गीतकार शैलेन्द्र द्वारा रचित गाना बज उठता है, “प्यार हुआ इक़रार हुआ है..” इधर दर्शक मंत्रमुग्ध हो समता, समाजवाद, इंसानियत से लबरेज़, रूमानियत की इस धार में हौले-हौले बहा चला जाता है।
उस दौर के अभिनय की मदर इंडिया और राज कपूर की जोड़ी को दर्शकों द्वारा सबसे ज़्यादा पसंद किया गया। इस क़रिश्माई जोड़ी ने 8 साल में 16 फ़िल्मों में काम किया और अभिनय की नयी ऊंचाई हासिल की। इस जोड़ी के सफल होने के पीछे दोनों की कमियां थीं। दोनों ने रुपहले परदे पर एक-दूसरे की कमियों को ढंका नहीं बल्कि उन्हें अर्थवान बना दिया।
राज कपूर का नरगिस से मिलना उनके लिए वरदान साबित हुआ। हालांकि यह केवल एक इत्तेफ़ाक था। राज कपूर जद्दन बाई से मदद मांगने उनके घर पहुंचे, दरवाज़ा खोलते ही नरगिस मिली, जो पकौड़े बना रही थी, लेकिन यह मिलना रंग लाया। आर.के. स्टूडियो की पहली (फ़िल्म) “आग” से यह जोड़ी शुरू हुई। कहते हैं आर.के. स्टूडियो को खड़ा करने में नरगिस ने दिलो-जान से मेहनत की। उन्होंने अपने गहने बेच दिये थे, अन्य फ़िल्मों में काम करके पैसे तक जुटाये।
राज कपूर ने रूसी समाजवाद, इंसानियत और सर्वहारा के जीवन को लेकर फ़िल्में बनायीं। उनकी इस सृजनशीलता, कल्पना और प्रयोगधर्मिता का आधार नरगिस थीं। राज कपूर ने दुनिया भर में जो शो-मैन की छवि हासिल की, नाम कमाया उसका सर्वाधिक श्रेय नरगिस को ही जाता है।
दाम-ए-हर मौज में है हल्क़-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक
-मिर्जा ग़ालिब
नरगिस असल में नरगिस थीं। जिस तरह नरगिस (डेफ़ोडिल) का फूल अपनी ख़ूबसूरती व सुगन्ध के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, उसी तरह हिन्दी सिनेमा में आधुनिक, आज़ादी पसंद, नज़ाकत भरे अंदाज़, तथा दरियादिली का सफल किरदार निभाने वाली अदाकारा पर भी नरगिस नाम (मूल नाम फ़ातिमा) ख़ूब सटीक बैठा। एक तरफ़, जहां नरगिस ईमान-दार, समर्पित, दरियादिल थीं, वहीं राज कपूर ख़ालिस व्यापारी, आदमी को फ़ायदे-नुक़सान की तराज़ू पर तौलने वाला (सामंती समझ वाला) अभिनेता व फ़िल्मकार। नाज़ुक मोड़ पर पहुंचकर न केवल यह जोड़ी टूटी, बल्कि दिल भी। इस दर्द को भी हल्के-फुल्के लहजे में, कभी नरगिस ने कहा था, “मैं जिस जगह से आती हूं, वहां के लोगों की शादी इस जगह के लोगों में नहीं होती है।”

नरगिस और सुनील दत्त की मुलाक़ात मदर इंडिया के सेट पर हुई और दोनों क़रीब भी आये। शुरू-शुरू में जब सुनील दत्त की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी तथा उनके पास अपनी बहन के इलाज के लिए पैसे भी नहीं थे, उस गाढ़े समय में नरगिस ने बिना कुछ बताये ही सुनील दत्त की बहन का इलाज करवाया, उनकी मदद की। सुनील दत्त को उनकी नेक दिली इतनी अच्छी लगी कि उन्हें यह विश्वास हो गया कि नरगिस से अच्छा जीवन साथी उनका और कोई दूसरा हो भी नहीं सकता।
कहते हैं सुंदरता चेहरे नहीं चरित्र में होती है… नरगिस को सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्मश्री पाने वाली पहली अभिनेत्री का गौरव तथा साल 1967 की फ़िल्म “रात और दिन” के लिए पहला राष्ट्रीय सम्मान मिला, जिसे ‘उर्वशी सम्मान’ भी कहा जाता था। यह ख़ूबसूरत अभिनेत्री के लिए दिया जाता था, जबकि अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत में उन्हें ख़ूबसूरत नहीं माना गया था। उनकी ठुड्डी नुकीली, चेहरा अंडाकार और आगे के दांतों के बीच में फ़ासला तथा नाक लंबी थी, जो उस समय के सिनेमा के मानक पर ठीक नहीं समझा गया। फिर भी, आंखों और राजकुमारी जैसी नज़ाकत के कारण उनके सौंदर्य की अलग पहचान बनी।

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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