- April 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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विचार के लिए कठिन समय में आब-ओ-हवा के मायने
“आब-ओ-हवा” ने इस बीच एक वर्ष का समय पार कर लिया, इतने थोड़े से समय में इस ई-पत्र ने बहुत अधिक लोगों का ध्यान अपनी पठनीय, विचारणीय सामग्री को लेकर अनेक तरह से अपनी ओर खींचा है। इसका हर कोना साहित्यिक ख़ुशबू लिये है। कविता गीत, ग़ज़ल, कविता, अनुवाद, साक्षात्कार, पुस्तक/फ़िल्म चर्चा, चित्रकला, रंगमंच पर चर्चा.. कितना कुछ इस एक अख़बार में समाया है। संपादक श्री भवेश दिलशाद जी ने इसे बड़ा कामयाब स्वरूप दिया है। यह उनकी मेहनत से ज़्यादा संजीदगी तथा अपने फ़न के प्रति लगाव से संभव हो सका है।
लेखन के शायद सबसे ज़्यादा सस्ते दौर से हम गुज़र रहे हैं। अनेक वाद, अनेक विचार, मत-मतांतर एक-दूसरे के समानांतर चल रहे हैं। किसी बड़ी विचारशक्ति की दूर-दूर तक कोई आहट, रौशनी दिखाई नहीं दे रही, अभी, साहित्य क्या है? विचार क्यों ज़रूरी है, जनमत किस तरफ़ है। ऐसे अनेक सवाल हैं जिनके उत्तर नहीं मिलते, जिस तरह पूंजी के दबाव में संयुक्त परिवार लगभग समाप्त है, उस तरह बड़े विचार समूह के संस्था संगठन भी अपनी पहचान को चुके हैं। अतः ऐसे पत्र-पत्रिकाएं, जो एक बड़े सजग पाठक वर्ग को अपने साथ लेकर चले या उस का आधार इस बात पर क़ायम हो, लगातार कम होते जा रहे हैं। इस लिहाज़ से आब-ओ-हवा ने संजीदा पाठक वर्ग की इस एक साल में न केवल तलाश की,बल्कि उनमें एक ललक,एक रुचि,उम्मीद को बरक़रार रखा है।
इस ब्लॉगनुमा अख़बार में मैंने, मीनाक्षी शेषाद्रि जी से बातचीत पढ़ी, असग़र वजाहत, अमिता दत्ता, राजेश रेड्डी और अनेक हस्ताक्षरों का साक्षात्कार… अनेक गज़लकार, गीतकार, कवि, अनुवादकों की रचनाएं केवल पढ़ी ही नहीं समृद्ध भी, हुआ। पहले-पहल तो इस अनोखे ढंग के पत्र को देखकर ही अचंभित रहा, ये कैसे पूरी तरह साहित्यिक अख़बार! इस उत्सुकता के कारण जब मैं इसके भीतर से गुज़रा तो पता चला यह तो नायाब पहचान रखता है। सबसे रोचक लगा भवेशजी का संपादकीय, ‘हम बोलेंगे’ शीर्षक ही भारतीय संविधान की आत्मा “हम भारत के लोग” की तरह-सा लगता है। फिर इसकी बानगी के अपने मायने हैं। इस तरह मैं इसका नियमित पाठक हूं। PDF सहेजकर रखता हूं। कुछ दिनों बाद फिर पढ़ता हूं। एक वर्ष होने पर संपादक श्री भवेश जी तथा आब-ओ-हवा परिवार से जुड़े सभी साथियों का आभार, शुभकामनाएं…

मिथलेश रॉय
पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।
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