तोत्तो चान, totto chan

युद्धग्रस्त हम और बच्चों की कहानियां

              आधी दुनिया में आग लगी है और बच्चे इस तरह मारे जा रहे हैं कि हमारी ख़बरों और कानों के लिए यह हस्बे-मामूल हो चुका है। वह युद्धोत्तर साहित्य और सिनेमा, जो हमें ज़ार-ज़ार करता था, आज हम उससे अटे पड़े हैं और बच्चे आज भी मारे ही जा रहे हैं।

युद्धोत्तर तथा युद्धग्रस्त समाजों में बच्चों की कहानियाँ अपना शिल्प जीवन से ही अख़्तियार करती हैं। बारूद बिछी ज़मीन पर तितली पकड़ने के लिए दौड़ते बच्चों जैसा चित्रण सिर्फ़ एक इमेजरी नहीं है- कई ईरानी, कुर्दी, तुर्की, जापानी आदि कहानियाँ और फ़िल्में इसकी गवाह हैं कि ये विडंबनाएँ युद्धजनित हैं।

‘तोत्तो-चान’ एक नन्ही लड़की की कहानी है, जो बहुत जिज्ञासु और ऊर्जावान है, लेकिन अपनी पहली स्कूल से इसलिए निकाल दी जाती है क्योंकि वह “अलग” है। उसकी माँ उसे एक “टोमियो गाकुएन” नाम के स्कूल में भेजती है, जहाँ के प्रधानाध्यापक, कोबायाशी, बच्चों की स्वतंत्रता और सबकी अपनी-अपनी ख़ासियतों को लेकर अति-संवेदनशील हैं।

एक नज़र में यह कहानी बच्चों और एक शिक्षक के बीच संबंध तथा पढ़ने-पढ़ाने के आदर्शवाद की कथा लगती है। ट्रेन की बेकार पड़ी छः बोगियों में चलने वाली बच्चों की इस कक्षा में सारी सौम्यता के बीच समग्रता का भी आग्रह है। मसलन, बच्चों के खाने को लेकर यह शर्त कि उसमें “कुछ पहाड़ और कुछ समंदर” का होना चाहिए, खान-पान की मौजूदा तमाम बहसों से बिल्कुल अलग आग्रह है।

बच्चों की कथाएँ, उनके शिक्षक और उनके स्कूलों पर यह एक अघोषित ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को युद्ध और अमानवीय हलचलों से दूर ले जाएँ।

कहानी में युद्ध कभी मुख्य विषय नहीं बनता, लेकिन हर समय उसकी मौजूदगी महसूस होती है। मिठाइयों का धीरे-धीरे ग़ायब होना, भोजन की कमी और दोस्तों का दूर जाना संकेत देते हैं कि बाहर की दुनिया में युद्ध की हलचल बढ़ रही है।

तोत्तो चान, totto chan

तोत्तो-चान एक स्मृतिकथा है जिसमें लेखिका तेत्सुको ने ख़ुद के बचपन की कथा कही है। तेत्सुको एक अभिनेत्री हैं और यह पुस्तक जितनी प्रसिद्ध हुई, एक अ-लेखक के द्वारा लिखे होने के कारण स्कूलों में इसका स्वीकार्य शुरू में आसान नहीं था। अब इसके सैकड़ों अनुवाद हो चुके हैं, कई फ़िल्में तथा नाटक इस पर निर्देशित और प्रस्तुत किये जा चुके हैं। यह पुस्तक उसी चाव से पढ़ी जाती रही है जैसा कि बच्चों के संसार पर केंद्रित पुस्तकें पढ़ी जाती हैं- जिनके केंद्र में एक ही इसरार होता है कि बच्चों की कथाएँ बच्चों के लिए लिए नहीं, बड़ों के लिए होती हैं कि वह भी कभी तुतला सकें, तितली देख सकें और बमबारी बंद करें।

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निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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