
- August 28, 2025
- आब-ओ-हवा
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आब-ओ-हवा – अंक - 34
भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की इस कड़ी में कमलकांत सक्सेना का स्मरण विशेष। चूंकि इस महीने आज़ादी की सालगिरह मनायी गयी, इसी संदर्भ से आज़ादी के बाद सिनेमा के बदलते स्वरों पर एक विशेष वैचारिकी। साहित्य, कला, शिक्षा आदि से संबद्ध नियमित ब्लॉग्स अपने रंग, तेवर और कतिपय समसामयिकता के समावेश के साथ हैं। एकाधिक पुरखे रचनाकारों को याद करने का प्रयास। ग़ज़ल की क्लास भी और किताबों की चर्चाएं भी और ‘तब’ के कुछ गीतों की फुहार भी…
प्रसंगवश
जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं? : राकेश कायस्थ
मुआयना
ब्लॉग : हम बोलेंगे (संपादकीय)
कमलकांत जी, अनघ जी.. प्यास और अंधेरे से भिड़ंत : भवेश दिलशाद
ब्लॉग : तख़्ती
कक्षा के आयाम – स्मृतियों से सीख : आलोक कुमार मिश्रा
गुनगुनाहट
ब्लॉग : पोइट्री थेरेपी
संगीत थेरेपी और कविता थेरेपी : रति सक्सेना
ब्लॉग : समकाल का गीत विमर्श
साहित्य की सकारात्मक दृष्टि : राजा अवस्थी
ब्लॉग : गूंजती आवाज़ें
लफ़्ज़, सियासत और अली सरदार जाफ़री : सलीम सरमद
ब्लॉग : तरक़्क़ीपसंद तहरीक की कहकशां
न वो दिल है न वो शबाब… आबरू-ए-ग़ज़ल ख़ुमार बाराबंकवी : जाहिद ख़ान
ग़ज़ल रंग
ब्लॉग : शेरगोई
हम तुम और वो : विजय स्वर्णकार
ब्लॉग : ग़ज़ल: लौ और धुआं
नयी शायरी : तकनीक के ज़ाविये में ढलने का हुनर: आशीष दशोत्तर
किताब कौतुक
ब्लॉग : क़िस्सागोई
‘हंगल साहब…’ अपने ही अंदाज़ की कहानियां : नमिता सिंह
ब्लॉग : उर्दू के शाहकार
राजिंदर सिंह बेदी का पहला और आख़िरी नॉविल : डॉ. आज़म
सदरंग
ब्लॉग : उड़ जाएगा हंस अकेला
राग विहाग में सुलक्षणा-भूपी की सुरीली बोलियां : विवेक सावरीकर ‘मृदुल’
ब्लॉग : पक्का चिट्ठा
21वीं सदी में व्यंग्य: अभिव्यक्ति के नये उपकरण तलाशना ज़रूरी : अरुण अर्णव खरे
ब्लॉग : कला चर्चा
सुषमा जैन – परम्परा का नया रूप : प्रीति निगोसकर
ब्लॉग : कुछ फ़िल्म कुछ इल्म
मम्मी की फ़िल्मी यादें और कल्पना की दास्तान : मिथलेश रॉय
