भाषाओं के साथ ही साहित्य, कला और परिवेश के बीच पुल बनाने की इस कड़ी में कमलकांत सक्सेना का स्मरण विशेष। चूंकि इस महीने आज़ादी की सालगिरह मनायी गयी, इसी संदर्भ से आज़ादी के बाद सिनेमा के बदलते स्वरों पर एक विशेष वैचारिकी। साहित्य, कला, शिक्षा आदि से संबद्ध नियमित ब्लॉग्स अपने रंग, तेवर और कतिपय समसामयिकता के समावेश के साथ हैं। एकाधिक पुरखे रचनाकारों को याद करने का प्रयास। ग़ज़ल की क्लास भी और किताबों की चर्चाएं भी और ‘तब’ के कुछ गीतों की फुहार भी…