April 30, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं सोते हुए जागना और जागते हुए सोना! पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. सोते हुए जागना और जागते हुए सोना! अलसाई आंखें रात के अधूरे ख़्वाबों की दास्तां... और पढ़े
April 15, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं शहर की कीमत बढ़ी तो इंसान की घटी पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. शहर की कीमत बढ़ी तो इंसान की घटी अभी वक़्त ने एक नये फ़ाइनेंशियल ईयर में क़दम रखा। इसमें यह... और पढ़े
March 31, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो दुनिया इस वक़्त युद्धरत है। एक इंसान अपनी पूरी ज़िन्दगी... और पढ़े
March 15, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं आंखें छीनकर तो रोशनी न दिखायी जाये पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. आंखें छीनकर तो रोशनी न दिखायी जाये हिंदुस्तानी परिप्रेक्ष्य में मज़हबी जलसे इस तरह होते हैं जैसे हम हर दिन उठते हैं... और पढ़े
February 28, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं परचमों में क़ैद होकर रह गया हर रंग है पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. परचमों में क़ैद होकर रह गया हर रंग है रंग ज़िन्दगी को तालीम भी देते हैं और तरबीयत भी। रंग होंठों पर... और पढ़े
February 14, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं तंग नज़रों से ही देखें इस गुज़रते दौर को पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. तंग नज़रों से ही देखें इस गुज़रते दौर को यह समय लीडरों की बदमिज़ाजी, बेहयाई और बेशर्मी को... और पढ़े
January 30, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं सुबह और सांझ के माथे पर ग़मों की गठरी पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. सुबह और सांझ के माथे पर ग़मों की गठरी अलसुबह अरमानों को अपनी कांख में दबाकर... और पढ़े
January 15, 2026 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं वक़्त के ज़ख़्म और ग़ज़ल का दामन पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. वक़्त के ज़ख़्म और ग़ज़ल का दामन निहायत सादगीपसंद और दिलचस्प गुफ़्तगू करने वाले ख़ुमार... और पढ़े
December 31, 2025 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं आता-जाता साल और शाइरी के रंग पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. आता-जाता साल और शाइरी के रंग वक़्त किसी का नहीं होता। वह सभी के साथ चलता है और... और पढ़े
December 15, 2025 आब-ओ-हवा ग़ज़ल: लौ और धुआं छूटती चीज़ों को संभालती शाइरी पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से…. छूटती चीज़ों को संभालती शाइरी वक़्त बहुत तेज़ी से बदल रहा है। जिस तेज़ी से वक़्त बदल... और पढ़े