विवेक सावरीकर मृदुल, vivek mridul
पाक्षिक ब्लॉग विवेक सावरीकर 'मृदुल' की कलम से....

राग विहाग में सुलक्षणा-भूपी की सुरीली बोलियां

           संगीतकार कनू रॉय ने हिंदी की चुनिंदा फ़िल्मों में ही संगीत दिया है। वह भी ज़्यादातर बासु भट्टाचार्य निर्देशित फ़िल्मों में। लेकिन माधुर्य और सांगीतिक ऊंचाई के लिहाज़ से कनू रॉय अपने समकालीन संगीतकारों से कहीं भी कमतर नहीं दिखायी देते। वर्ष 1979 में बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘गृह प्रवेश’ के गाने इसकी बानगी हैं। इसी फ़िल्म में राग विहाग पर आधारित दोगाना है- ‘बोलिए सुरीली बोलियां’। इसे गाया है सुलक्षणा पंडित और भूपिंदर सिंह उर्फ़ भूपी दा ने।देखा जाये तो फ़िल्म की शुरूआत इसी गाने से होती है।

एक सस्ती चॉल में संजीव कुमार पत्नी शर्मिला टैगोर के लिए कॉफ़ी बनाने जाते हैं और शर्मिला दीवार से सटे पड़ोस के घर से नवविवाहित जोड़े के मधुर प्रणय गीत का आनंद ले रही है। मीना (अभिनेत्री प्रियदर्शिनी) मुखड़े की पहली लाइन को निषाद से उठाती है, जिस पर शशि (अभिनेता दिनेश ठाकुर) टोकता है- ‘छोड़िए आप गाना, छोड़िए’। यहां कनू रॉय बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में संगीत की भाषा के रूपक को अपनाते हैं। यह बताने के लिए कि सुर अकारण ऊपर की पट्टी का छिड़ जाये तो बात बिगड़ सकती है। फिर चाहे वह गायन हो या दाम्पत्य जीवन। अगली पंक्ति में मीना पंचम से गाना शुरू करती है और तब दोनों के बीच का रोमांस गुलज़ार के शब्दों की मखमली चादर ओढ़ खिलने लगता है, बोल उठता है- ‘खट्टी मीठी आंखों की रसीली बोलियां’।

grih pravesh song screenshot

अंतरा देखिए- ‘रात में घोले चांद की मिश्री, दिन के ग़म नमकीन लगते हैं, नमकीन आंखों की नशीली बोलियां’। अगर आप इन पंक्तियों बल्कि पूरे गाने पर ग़ौर करेंगे तो पाएंगे कि जगह-जगह गाने में गायिका की मादक हंसी है, ठिठोली का अंदाज़ है तो कभी अपने प्रेमी को प्रसन्न मन से दी गयी दाद भी है। बासु दा ने इसके चित्रण में बिना फ़िज़िकली लाउड हुए एक तरह से शृंगार के अंतरंग क्षणों को मीठे गाने से आच्छादित (केमोफ्लेज) किया है।

विहाग राग का गायन समय रात का दूसरा प्रहर होता है। यानी रात नौ बजे से मध्यरात्रि तक। शृंगार के लिए एकदम अनुकूल राग। सुलक्षणा पंडित के स्वर वातावरण में मिसरी घोलते हैं, तो भूपी की आवाज़ पौरुष चेतना का उद्घोष है। पूरे गाने के दौरान बासु दा का कैमरा शर्मिला टैगोर (मानसी) की आंखों और होंठों की थिरकन बड़ी बारीक़ी से दर्ज करता है और उसके मन की चंचल वृत्तियों को उजागर करता है।

सुलक्षणा पंडित ने इस गाने को बहुत रूमानियत और ठहराव के साथ गाया है। वे संजीव कुमार से एकतरफ़ा प्रेम करती थीं, क्या इस रूमानियत का यह भी एक कारण रहा होगा! गाने के बीच में सरगम (नि-सा-ग-म-प) का प्रयोग है, जो विहाग के बेसिक अलंकार ही हैं, पर गाने की कशिश बढ़ा देते हैं। इसमें कनू रॉय का भी योगदान कम नहीं। आख़िर गीता दत्त ने जिस फ़िल्म ‘अनुभव’ में अंतिम बार अपनी पुरकशिश आवाज़ दी थी, उसके भी संगीत निर्देशक निर्देशक कनू दा ही तो थे। वो गाने- “कोई चुपके से आके” और “मेरी जां, मुझे जां न कहो मेरी जां”… भला हम कैसे भूल सकते हैं? प्रसंगवश यह बताना चाहता हूं कि बासु दा ने भी सत्यजीत रे की तरह दाम्पत्य जीवन पर फिल्म त्रयी बनायी है, जिसमें 1971 की अनुभव, 1973 की आविष्कार के साथ 1979 की गृह प्रवेश भी एक है।

विवेक सावरीकर मृदुल

सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।

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