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अनुवाद में राजनीति और लेखन बनाम अनुवाद

 

              प्रसंगवश… कन्नड़ लेखक बानू मुश्ताक़ को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला तो अनुवाद चर्चा में आ गया। यह भी मुद्दा बनाने का प्रयास दिखा कि अनुवादक दीपा भास्ती को कम महत्व दिया गया। महत्वपूर्ण दोनों ही हैं लेकिन ‘लेखक बनाम अनुवादक’, बहस नयी नहीं है। बुकर के लिए बानू को नामांकन मिलते ही यह विमर्श शुरू हो गया था। पहले जयश्री कलाथिल का एक लेख आया , उसके जवाब में अंबई ने अपने 2013 के पुराने व्याख्यान के अंशों को एक लेख रूप में स्क्रॉल पर प्रस्तुत किया। तमिल और अंग्रेज़ी की महत्वपूर्ण लेखक, महिलाओं के अध्ययन पर शोधकर्ता और वक्ता सी.एस. लक्ष्मी उर्फ़ अंबई के लेख के अंश हिंदी पाठकों के लिए यहां साभार। (अनुवाद: भवेश दिलशाद)

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             अनुवाद का मतलब किसी पाठ को सिर्फ़ एक भाषा से दूसरी भाषा में ढाल देना भर नहीं है…अनुवाद के अर्थ को हमें उस बड़े फ़लक पर समझना होगा, जिसमें किसी पाठ को देखना, संदर्भ से जुड़ना, वर्गीकरण, उस पाठ को कम या अधिक फैलाव दिया जाना शामिल हो।… किसी भाषा से किसी भी दूसरी भाषा में सौ फ़ीसदी तो अनुवाद मुमकिन है ही नहीं। कुछ तमिल शब्द अंग्रेज़ी में एकदम इकहरे हो जाते हैं। चूंकि उनके अर्थ की गहराई उनके सांस्कृतिक संदर्भों में निहित है, जो उससे बाहर निकलते ही खो जाती है क्योंकि शब्दों के ज़ाहिर अर्थ और भीतरी अर्थ अक्सर निजी अनुभव, भाषा के तौर-तरीक़ों और संकेतों पर आधारित होते हैं। …मैं भाषा में गेस्टाल्ट शिफ़्ट (धारणा से एकदम अप्रत्याशित बदलाव) की बात नहीं कर रही, जो दो-छवि वाली अवधारणा है: एक ज़ाहिर और एक पोशीदा। बल्कि मेरी मुराद उन परतों से है जो किसी शब्द, किसी छवि, किसी ध्वनि के साथ खुलती हैं।

तमिल शब्दों में अलग-अलग ध्वनियाँ और लय हैं। गिडुगिडु, कुडुकुडु, सलासला, पलापला, मिनुमिनु, सदासदा और गदागदा ऐसे शब्द नहीं हैं जिनका अनुवाद संभव हो। भाषा को समझना और अनुवाद करना बच्चों का खेल कभी नहीं रहा। पाठ और अनुवाद के बीच लगातार एक खींचतान चलती है। अक्सर लगता है जैसा ग़ालिब ने कहा था:

या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बाँ और

जब मेरी किसी रचना का कोई अनुवाद मेरे पास आता है तो पहले-पहल तो एकदम अजनबी-सा लगता है। बहुत वक़्त लगता है यह पहचानने में कि यह मेरी ही रचना है क्योंकि उसके चित्र और ध्वनियाँ एकदम अलग हो जाती हैं। जिस भाषा में अनुवाद हुआ है, उसमें रमने के लिए एक ख़ास मूड धीरे-धीरे बनता है और फिर लेखक देखता है कि दो भाषाओं के बीच के अवकाश में उड़ने के लिए अनुवाद ने उसे पंख दिये हैं। दूसरी भाषा में कोई पाठ तभी आकार ले सकता है, जब दूसरी भाषा के विशाल महासागर में अनुवाद उसी तरह मूल पाठ को धकेले जैसे मत्स्याखेट वाली नाव को समुद्र के भीतर हौले से धकेला जाता है।

अब रही बात अनुवाद के मेरे अपने अनुभवों की तो, वे बेहद दिलचस्प रहे हैं और कभी-कभार हैरतअंगेज़ भी या परेशान करने वाले भी। मैंने ऐसा भी महसूस किया कि अनुवाद के साथ एक राजनीति भी संबद्ध है। अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में वर्चस्व का भाव कहीं अंतर्निहित रहता है। पाठ का चयन, अनुवाद व व्याख्या और लेखक को कैसे प्रस्तुत करना है, यह सब उसमें विचारा जाता है। अनुवादक के साथ अच्छी-ख़ासी बातचीत होती है, एक तरह से सौदेबाज़ी और मूल पाठ, लेखक और उसकी संस्कृति को एक ऐसे प्रारूप में ढाला जाता है, जिसे आसानी से बेचा जा सके।

भारतीय भाषा से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाले को हमेशा लगता है, जैसे वह कोई कृपा कर रहा है, वह भारतीय भाषा के लेखक को न जाने कौन-से आसमान पर बिठाने जा रहा है। भारतीय भाषा के लेखक भी इस अनुवाद को ऐसे ही मानते हैं, जैसे इससे उन्हें कोई बड़ा उठान मिलेगा। यह जैसे कोई जादुई रूप परिवर्तन हो, कि एक बदसूरत मेंढक एक सुंदर शहज़ादा बन जाएगा या किसी दिव्य पुरुष के पैर भर रख देने से कोई शापित पत्थर किसी स्त्री में तब्दील हो जाएगा। कुल मिलाकर रूपांतरण की इस प्रक्रिया में लेखन एक ऐसा उत्पाद बना दिया जाता है, जिसे क़िस्म-क़िस्म के पाठकों के बाज़ार में खपाया जा सके।

जब बात किसी भारतीय भाषा से अंग्रेज़ी में अनुवाद की हो, तब अनुवादक का वर्चस्व होता है। लेखक और अंग्रेज़ी के पाठकों के बीच एक महन्तशाही बनायी जाती है। ऐसे संवेदनशील अनुवादकों से भी मेरा पाला पड़ा है, जिन्हें मैंने कभी कहा कि आपके द्वारा किये गये अनुवाद में ये सुधार किये जाने चाहिए, तब उन्हें सुधार शब्द पर ऐतराज़ हुआ। उन्होंने साफ़ कहा कि जिस भाषा में वे अनुवाद कर रहे हैं, उसकी बारीक़ियों को वे मुझसे बेहतर समझते हैं इसलिए मैं तो कोई ‘सुधार’ उन्हें सुझा ही नहीं सकती।

…अनुवाद का समकालीन तरीक़ा पाठ की परतों को खोलना और इसे पूरी तरह से पारदर्शी बना देना है जबकि मैं मानती हूं कहानियों का मज़ा उन्हें खोलने में नहीं बल्कि किस तरह छुपाया जाना है, इसमें है। कहानियाँ अपने भावों और कथातत्वों इस तरह छुपाती हैं कि हर एक पाठक के स्तर पर अलग ढंग से खुल सकें। किसी भी कहानी या पाठ को पूरी तरह खुल के कभी नहीं आना चाहिए; कुछ रहस्य रहने ही चाहिए। अब ऐसा तभी होगा जब अनुवादक पाठ के प्रति विनम्रतापूर्ण आग्रह रखे और ऐसा न हो तो लेखक इनकार करे इस तरह की मौत से।

…अनुवाद मूल से कमतर नहीं है। अलग है। मेरा मत यह भी नहीं कि अनुवाद शब्दशः हो या लकीर के फ़कीर की तरह “वफ़ादार”। अलबत्ता इससे इनकार कोई नहीं कर सकता कि अनुवाद में राजनीति है। कई अनुवादक समझते हैं अनुवाद मूल से बेहतर है और अनुवाद करते समय लेखक की सलाह ग़ैर-ज़रूरी है। उन्हें लगता है अमुक भाषा के पाठकों की ज़रूरत वही समझते हैं यह तय करने की आज़ादी ले लेते हैं कि मूल पाठ के कौन से वाक्य हटा दिये जाएं। मैंने एक बार कहानी में कहीं “कैटरपिलर” लिखा था, एक अनुवादक ने इसे सेंटीपीड और दूसरे ने सांप लिखा।

हाल में डिब्रूगढ़ में एक साहित्यिक उत्सव में ममांग दाई ने कहा उनके साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उपन्यास ‘द ब्लैक हिल’ का तमिल अनुवाद उनकी जानकारी के बिना ही हो गया और अनुवाद ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता। तब उन्होंने अनुवादक का संपर्क खोजा और फ़ोन करके पूछा कि उपन्यास में इतने पेचीदा सांस्कृतिक संदर्भ थे, तो बग़ैर उनसे बातचीत किये अनुवाद कैसे कर दिया गया! तब अनुवादक का कहना था अनुवाद करते हुए उसे महसूस होने लगा था जैसे वह अरुणाचल प्रदेश का ही हिस्सा हो इसलिए मदद की ज़रूरत क़तई महसूस नहीं हुई।

…इतना कुछ कहने के पीछे मेरी कोशिश यही है कि अनुवादक भारतीय हो या पश्चिमी, अनुवाद में जिस महन्तशाही का सामना लेखक को करना पड़ता है, उसकी तरफ़ ध्यान खींच सकूं। अनुवाद पर हाल में इतना ज़ोर दिया गया है कि यूरोप या किसी भी देश का अनुवादक जब तमिल या किसी भी भारतीय भाषा की किताब का अंग्रेज़ी में अनुवाद करता है तो लेखक से संपर्क करने की ज़रूरत महसूस ही नहीं करता। बात चाहे भारतीय भाषा में ही अनुवाद की हो, अंतिम पांडुलिपि से पहले लेखक को ज़ोर देना चाहिए कि अनुवादक के साथ वह बैठे, बतियाये।

विदेशों में अनुवाद सम्मेलनों में भी मैंने शिरकत की, जहाँ लेखकों को मूल भाषा से एक छोटा-सा अंश पढ़ना भर होता था, ताकि भाषा की ध्वनि की समझ बन सके, अनुवाद की बारीक़ियाँ, अनुवादकों की कठिनाइयाँ, अनुवाद कब-कब मूल पाठ को बेहतर बनाता है, इन सभी पर अनुवादक चर्चा करते थे। लेखकों को कई अर्थों में “हीन” माना जाता था।

…एक अच्छा अनुवादक मूल पाठ पर हावी नहीं होता। नाव की तरह इसे हौले-से दूसरी भाषा के महासागर में उतारता है, वह जानता है कि नाव भी सागर की ही तरह महत्वपूर्ण है, यह डूब न जाये, बस यही अनुवादक और लेखक दोनों की असली जीत है। अनुवाद एकतरफ़ा कारोबार कभी नहीं होना चाहिए; हमेशा एक साझा कोशिश हो।

2 comments on “अनुवाद में राजनीति और लेखन बनाम अनुवाद

  1. अनुवाद जरूरी है तो सावधानी भी है।
    बहुत बड़ा रिस्क भी ।
    फिर भी जो अनुवाद का बीड़ा उठाते है उनके लिए महत्वपूर्ण आलेख ।
    बधाई …

  2. शानदार आलेख।बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय बिन्दुओं को रेखांकित किया गया है। मेरे एक दोहे की अर्द्धाली है। ‘..भाषा से कब हो सका अश़्कों का अनुवाद। अनुवाद में हमेशा कुछ छूट जाने की स्थिति बनी रहती है और यह स्वाभाविक भी है। यह भी सत्य है कि अनुवाद मूल रचना पर भारी नहीं होना चाहिए।

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