
- August 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग आलोक कुमार मिश्रा की कलम से....
कक्षा के आयाम - स्मृतियों से सीख
पूर्वांचल में बीते बचपन के दिनों में सर्दियों का मुकाबला हम सामूहिक रूप से अलाव तापते हुए करते थे। वहाँ इसे कउड़ा कहा जाता है। शाम को कउड़ा जलाने की तैयारी दिन से ही की जाती थी। इसके लिए धान या किसी दूसरे अनाज की भूसी, सूखे पत्ते, लकड़ियों और पुवाल आदि का इंतज़ाम किया जाता था। अँधेरा घिरते ही रसोई के चूल्हे से सुलगते उपले लाकर उसमें डाल दिये जाते। फिर पैदा होता धुएँ और आग का एक विलक्षण घालमेल, जिस पर हम छोटे-बड़े परिवारजन और पड़ोसियों की हथेलियाँ अनायास ही गर्मी महसूस करने के लिए तन जातीं। इसके साथ ही शुरू हो जाता सर्द मौसम में गर्मी उगलते कौड़े के चारों तरफ़ खड़े या बैठे लोगों का आपसी संवाद, क़िस्सागोई और बातचीत। मज़ेदार प्रसंगों, दिलचस्प संस्मरणों, उत्सुकता जगाती कहानियों, बूझने की चुनौती देतीं पहेलियों के बीच कब घंटे-दो घंटे बीत जाते, पता ही न चलता। हालाँकि अब गाँव-गाँव बिजली आ जाने, हर हाथ में डेटा से परिपूर्ण मोबाइल होने से और इससे उपजी व्यस्तता से कउड़ा जलाने की ये परंपरा कमज़ोर-सी हो गयी है, लेकिन मेरी पीढ़ी की यादों में वो अलाव वैसे ही गर्म बने हुए हैं।
मेरी चेतना में बसी कउड़ों की इन स्मृतियों ने पिछले दिनों स्कूल की कक्षा में पैदा हुई एक चुनौती से निपटने में मदद की। विद्यार्थियों के बीच एक सोची हुई गतिविधि कराने के लिए मुझे ख़ुद ही एक चुनौती का सामना करना पड़ा। इस गतिविधि में बच्चों को मिलकर और आपस में विचार-विमर्श करते हुए दी गयी समस्या को सुलझाना था। पर पँक्ति में लगे बेंचों पर एक ही ओर मुँह करके बैठे विद्यार्थियों के लिए ऐसा करना संभव नहीं हो पा रहा था। इसे सुलझाने की प्रक्रिया में मुझे कुछ मज़ेदार और अनोखे अनुभव मिले। इस कार्य में विद्यार्थियों को पाँच-पाँच या छह के उपसमूह में बाँटकर दिये गये मुद्दों पर विचार-विमर्श करने, तत्पश्चात एक सामूहिक प्रस्तुति तैयार करने और फिर सभी के सामने उसे प्रस्तुत करने को कहा जाना था। सवाल ये था कि परंपरागत तरीक़े से पंक्तिबद्ध लगे बेंच वाली कुर्सियों पर बैठने की इस व्यवस्था में ये संभव कैसे हो? आगे-पीछे की बेंच के विद्यार्थियों का अगर एक समूह बना भी दिया जाता तो भी उन्हें घूमकर आमने-सामने बैठकर बातचीत करना संभव नहीं हो पा रहा था। बरबस ही मुझे उन कउड़ों की याद हो आयी, जिनके चारों तरफ़ जमे हुए हम आमने-सामने, एक-दूसरे से बेरोक-टोक बातचीत कर पाते थे। ये याद आते ही मैंने बैठने की व्यवस्था में बदलाव की युक्ति सोची।
कक्षा के चार बेंच खिसकाकर आमने-सामने और दाईं-बाईं तरफ़ से आपस में जोड़ दिये गये। बीच में आसानी से निकल सकने की कुछ जगह ही छोड़ी गयी। बेंचों के ऊपरी सिरे आपस में जुड़ने से बीच में एक चौड़ी पठारनुमा जगह बन गयी। उसी जगह पर चार्ट और अन्य सामग्रियाँ रख दी गयीं, जिन्हें आवश्यकतानुसार विद्यार्थियों को गतिविधि में प्रयोग करना था। कक्षा में कुल चौबीस बेंच थे, जिन्हें इस तरह खिसकाने और जोड़ने से ऐसे कुल छह समूह बन गये। पैंतालीस बच्चों की कक्षा में छह-छह या पाँच-पाँच विद्यार्थियों के छह उपसमूह बनाकर अलग-अलग बैठा दिया गया। ऐसा पाँच मिनट की थोड़ी सी अफरातफरी के बीच हो गया। इस तरह बैठने से बच्चे अब एक-दूसरे से बख़ूबी मुखातिब हो पा रहे थे। उनके बीच आपसी बातचीत और संवाद में कोई भी परिस्थितिजन्य अड़चन नहीं थी। बैठकी की इस नयी व्यवस्था से वो खुश भी थे। सीखने के बीच खड़ी पंक्तिबद्धता की कृत्रिम दीवार ढह चुकी थी।
जिस तरह उन कउड़ों को जलाने की व्यवस्था करने और जलने के बाद तापते हुए बातचीत की प्रक्रिया में वयस्कों के साथ साथ हम बच्चों की सशक्त भूमिका होती थी, वैसे ही उस दिन मेरी कक्षा की इस नवीन व्यवस्था को संभव बनाने और बन जाने के बाद उसका प्रयोग करने में मेरे विद्यार्थी पूरी तरह सक्रिय और संलग्न थे। अगले पीरियड में आने वाले दूसरे विषयों के शिक्षकों को भी मैंने इसके लिए तैयार कर लिया। बच्चे बहुत खुश थे। काम निपटा लेने के बाद भी वो इस व्यवस्था का आनंद ले रहे थे।

आलोक कुमार मिश्रा
पेशे से शिक्षक। कविता, कहानी और समसामयिक मुद्दों पर लेखन। शिक्षा और उसकी दुनिया में विशेष रुचि। अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। जिनमें एक बाल कविता संग्रह, एक शैक्षिक मुद्दों से जुड़ी कविताओं का संग्रह, एक शैक्षिक लेखों का संग्रह और एक कहानी संग्रह शामिल है। लेखन के माध्यम से दुनिया में सकारात्मक बदलाव का सपना देखने वाला मनुष्य। शिक्षण जिसका पैशन है और लिखना जिसकी अनंतिम चाह।
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