
- August 30, 2025
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
राजिंदर सिंह बेदी का पहला और आख़िरी नॉविल
‘एक चादर मैली-सी’ (प्रकाशन वर्ष 1962) राजिंदर सिंह बेदी का पहला और आख़िरी नॉविल। वास्तविक घटनाक्रम और परिस्थतियों पर आधारित यह नॉविल उर्दू का संक्षिप्त नॉविल भी है, जो सिर्फ़ 150 पृष्ठों में सीमित है। पंजाब के देहात के पिछड़े और वंचित परिवार के आर्थिक और सामाजिक पक्ष को बड़ी वास्तविकता से प्रस्तुत करता है। प्लॉट पंजाब के कोटला गांव के ताँगे वाले की बीवी रानो पर केन्द्रित है। इस नॉविल के किरदार हमारे समाज ही के लोग हैं। यही वजह है इसे पढ़ने के बाद कहानी के किरदार पाठक की स्मृति में घर बना लेते हैं। राजिंदर सिंह बेदी को इस नॉविल के लिए 1965 में साहित्य अकैडमी अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
नॉविल की थीम ग़रीब और वंचित परिवार की एक औरत की ज़िंदगी और उसकी समस्याएं हैं। जैसा कि आम तौर से किसी गांव में होता है। ये बेदी की पैनी नज़र का कमाल कहा जा सकता है। जैसे ज़िम्मेदारियों से पिसती हुई औरतें, बच्चों को जन्म देती और उनकी परवरिश करती हुई औरतें, विलासिता में डूबे हुए पैसे वाले लोग, मदद को तरसती हुई बेवाएं आदि… माहौल को इतनी सच्चाई के साथ पेश किया गया है कि गांव नज़रों के सामने घूमने लगता है।
इस नॉविल में अहम किरदार हैं, रानो- जो कहानी की हीरोइन है, चिन्नू- रानो की एक सहेली, तिलोका- रानो का पति, मेहरबान दास- चौधरी, घनशाम दास- मेहरबान का भाई, बनते सनते- जुड़वां बेटे, हुज़ूर सिंह- रानो का सुसर, चंदाँ- रानो की सास, हरिदास बावा, जोगी, ज्ञान सिंह- सरपंच, आयशा, जहलुम, सलामती- मुस्लिम लड़कियां, जमील, इस्माइल, ज्ञानचंद- मंगल के दोस्त वग़ैरह। सभी किरदार अशिष्ट और असभ्य हैं। बाक़ौल बेदी “मर्द अक्खड़ और औरतें झक्कड़ हैं”। औरत और मर्द के रिश्तों की गिरहें इसमें खुलती हैं। इंसान और माहौल के दरमयान कश्मकश का बयान मिलता है। जाबजा बेदी किसी घटना के परिप्रेक्ष्य में मौसम और माहौल का ऐसा चित्रण करते हैं कि पढ़ते ही बनता है। इसमें बहुत गहराई और बारीक़ विवेचना है। शायद इसीलिए मंटो ने कहा था “तुम लिखने से पहले सोचते हो, लिखते हुए सोचते हो और लिखने के बाद भी सोचते रहते हो”।
बेदी ख़ुद इस नॉविल के बारे में कहते हैं कि इसमें मैंने वो सब पेश किया है, जिसे मैंने बहुत ज़्यादा क़रीब से देखा है। ये कहानी मेरे अपने गांव की है और इसके बहुत से किरदार वास्तविक हैं।
ये पंजाब के एक गांव कोटला के एक पंजाबी परिवार की कहानी है। रानो और तिलोका पति पत्नी हैं। परिवार बहुत ग़रीब है। तिलोका एक आवारा आदमी है, जो न केवल शराबी है बल्कि भोली-भाली लड़कियों को बहला फुसला कर घनशाम दास और मेहरबान दास को शराब के बदले बेच देता है। रानो और तिलोका के तीन बच्चे हैं। बड़ी लड़की का नाम ‘बड़ी’ और जुड़वां बेटे हैं जिनके नाम ‘संते, बंते’ हैं। पति-पत्नी दोनों आये-दिन लड़ाइयां होती रहती हैं। एक बार एक जातरी की लड़की के सिलसिले में उनकी बड़ी ज़ोर की लड़ाई होती है जिसे तिलोका, चौधरी को बेच आया था। रानो का देवर मंगल बीच-बचाव करता है। इस तकरार में तिलोका की शराब की बोतल टूट जाती है, तब वो ग़ुस्से में ये कहते हुए चला जाता है कि अगली रात जमकर शराबनोशी करूँगा। लेकिन वो रात नहीं आती। जात्रियों का लड़का अपनी बहन का बदला लेने के लिए तिलोका की गर्दन में दाँत गाड़कर मार डालता है। मेहरबान दास और घनशाम दास को पुलिस पकड़कर ले जाती है, जिन्हें सात साल की क़ैद की सज़ा हो जाती है।
तिलोका की मौत के बाद रानो का जीना मुश्किल हो जाता है। वो अपनी जवान बेटी की सुरक्षा में हमेशा लगी रहती है। चुनूं उसकी सबसे क़रीबी सहेली है। एक दिन उसने पंचायत से ये फ़ैसला करा लिया कि मंगल और रानो की शादी कर दी जाये। मंगल, रानो से कोई 10 साल छोटा है। इसकी बड़ी बेटी का लगभग हमउम्र होता है। वो ख़ुद शादी करना नहीं चाहता लेकिन सरपंच उसकी शादी करा देते हैं। वो भी ऐसी शादी कि सर पर बस मैली-सी चादर डाल दी जाती है। यूं रस्म पूरी तो हो जाती है मगर मंगल रानो को अपनी पत्नी नहीं मान पाता। दूसरी तरफ़ मुसलमानों की एक लड़की सलामती, मंगल पर डोरे डाल रही थी। धार्मिक और सामाजिक ऐतबार से इसको रोकना ज़रूरी लग रहा था। एक रात मंगल और सलामती मिलने का इरादा करते हैं। उसी रात रानो को तिलोक की छुपायी हुई शराब की एक बोतल मिल जाती है और वो मंगल को शराब पिलाकर अपनी तरफ़ आकर्षित कर लेती है। कुछ दिनों बाद जात्रियों के इसी लड़के का बड़ी के लिए रिश्ता आता है, जिसने तिलोका का क़त्ल किया था। ग़रीबी को देखकर उसका रिश्ता स्वीकार कर लिया जाता है और इस तरह हर तरफ़ हरियाली और ख़ुशहाली फैल जाती है। इसीलिए वक़्त को सबसे बड़ा मरहम बताया गया है, जो हर तरह के घाव को अंततः भर देता है।
नॉविल में हर घटना को इतनी सच्चाई से पेश किया गया कि यह अनोखा और अछूता बन गया है। नॉविल में ज़ात पात, ग़रीबी और सामाजिक परंपराओं से उत्पन्न समस्याओं को बड़ी महारत से प्रस्तुत किया गया। इस कहानी पर फ़िल्में भी बनी हैं। भारत में इसी नाम से और पाकिस्तान में “मुट्ठी भर चावल” के नाम से।
राजिंदर सिंह बेदी : एक नज़र में
1 सितंबर 1915 को सयालकोट (वर्तमान में पाकिस्तान) में पैदा हुए। माता सेवा देवी हिंदू ब्राह्मण थीं जबकि पिता हीरा सिंह जाति के खत्री और पंथ के ऐतबार से बेदी थे। 1933 मैं इण्टर पास करने के बाद डाक विभाग में नियुक्त हो गये। 1934 मैं सोमावती उर्फ़ सतवंत कौर से शादी हुई। 1947 मैं लाहौर से दिल्ली आ गये। 1948 मैं जम्मू रेडियो स्टेशन के डायरेक्टर रहे। 1949 मैं मुंबई आये और फ़िल्मों के लिए संवाद लिखने लगे।
बहुत सी मशहूर हिन्दुस्तानी फ़िल्मों के संवाद लिखे जैसे अभिमान, अनुपमा, मधुमति आदि। ख़ुद भी गर्म कोट, रंगोली, दस्तक जैसी फ़िल्में बनायीं। दस्तक को राष्ट्रीय एवार्ड भी मिला। आरंभिक जीवन लाहौर में बीता और यहां से उर्दू में तालीम हासिल की। उनका देहांत 11 नवंबर 1984 को 69 साल की उम्र में हुआ।
ड्रामा निगार, फ़िल्म डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राइटर और लेखक थे। तरक़्क़ी-पसंद तहरीक से जुड़े थे। आपको फ़िल्मफेयर, साहित्य अकैडमी एवार्ड और पदम-श्री सम्मान से नवाज़ा गया। कहानियों का पहला संकलन “दाना-ओ-दाम” 1936 में प्रकाशित हुआ। दूसरा मजमूआ “गरहन” 1943 में। “एक चादर मैली सी” (1962) का अंग्रेज़ी में अनुवाद “I take this woman” के नाम से किया गया। बाद में कई भाषाओं में भी अनुवाद हुए। बेदी की अदबी ज़िंदगी की शुरूआत 1932 में हुई। पहले उन्होंने “मुहसिन लाहौरी” के नाम से अंग्रेज़ी और उर्दू में नज़्में और अफ़साने लिखे। राजेंद्र सिंह बेदी के नाम से पहला अफ़साना दुख सुख है। बेदी तरक़्क़ी-पसंद नस्ल के सबसे बड़े अफ़सानानिगार माने जाते हैं।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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