
- June 12, 2025
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भारतीय क्षेत्रीय भाषाएं और उर्दू
हिन्दी उर्दू का भाषाई रिश्ता – 2
हिन्द-आर्याई ख़ानदान से संबंधित उर्दू का शुमार भारत की आधुनिक प्रमुख भाषाओं में होता है। देहली, मेरठ एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में पंजाबी, हरियाणवी, मेवाती, बृज भाषा एवं खड़ी बोली का चलन आम था। 12वीं सदी में उक्त क्षेत्रीय भाषाओं एवं फ़ारसी बोलने वालों के परस्पर संपर्क में आने से एक नयी बोली जन्म लेती गयी, जिसे आरंभ में हिन्दोस्तानी, रेख़्ता, हिंदवी आदि नामों से पुकारा गया और जब बाज़ारों में बोली जाने वाली इस ज़बान ने साहित्यिक अभिव्यक्ति का रूप धारण किया तो इसे ही उर्दू के नाम से जाना जाने लगा।
उर्दू ज़बान की संरचना एवं विकास में भारत की कई क्षेत्रीय बोलियों एवं भाषाओं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उर्दू ज़बान के आग़ाज़ के संबंध में कई भाषाविदों ने अपने अपने लिसानी नज़रियात पेश किये हैं।
- मोहम्मद हुसैन आज़ाद के नज़दीक़, उर्दू बृज भाषा से निकली है।
- सैयद सुलेमान नदवी उसकी उत्पत्ति सिंधी भाषा से मानते हैं।
- हाफ़िज़ मेहमूद शीरानी ने अपनी किताब ‘पंजाब में उर्दू’ में पंजाबी को उर्दू की मां क़रार दिया है।
- डॉ. नसीरुद्दीन हाशमी अपनी पुस्तक ‘दक्कन में उर्दू’ में उर्दू को दक्कनी से क़रीब बताते हैं।
- कुछ भाषाविदों ने बंगाली, मागधी, मराठी, कोंकणी एवं तमिल भाषाओं से भी उसके रिश्ते जोड़ने के दावे किये हैं। जबकि डॉ. मसूद हुसैन ख़ां, डॉ. ज्ञानचंद जैन, डॉ. गोपीचंद नारंग, शौकत सब्ज़वारी, सुनीति कुमार चटर्जी एवं जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के अनुसार उर्दू ज़बान का आग़ाज़ खड़ी बोली से हुआ है।
वास्तव में, उर्दू ने कई क्षेत्रीय भाषाओं एवं बोलियों से प्रभावित होकर, उनके अक्षरों व शब्दों को अपने में इस तरह सम्मिलित कर लिया कि अब वह उसी के हो गये हैं।
डॉ. ज्ञानचंद जैन के अनुसार, ‘फ़रहंग-ए-अस्फ़िया’ में उर्दू में शामिल अल्फ़ाज़ की तादाद 54009 है, जिनमें अरबी के 7584, फ़ारसी के 6041 अल्फ़ाज़ शामिल हैं। जिनकी मजमूई तादाद 13625 है। और उनका तनासुब यानी औसत 23% है (हवाला – पुस्तक ‘लिसानी मुतालए’, पृष्ठ 181)। उपर्युक्त विवरण प्रमाण है कि उर्दू ज़बान में शामिल शेष 77% अल्फ़ाज़ का संबंध हिंदोस्तान की क्षेत्रीय भाषाओं एवं बोलियों से ही है। यह भी सच है कि अपने सौतियाती निज़ाम (भाषाई संरचना) एवं ज़ख़ीर-ए-अल्फ़ाज़ (शब्द-भंडार) के लिहाज़ से उर्दू अपनी एक अलग शिनाख़्त रखती है। उसने कई बोलियों एवं भाषाओं के असरात क़बूल किये हैं परंतु उन्हें अपने रंग में, अपने अस्तित्व में इस तरह समा लिया है कि अब वे उसी के बन गये हैं।
इस सिलसिले में उर्दू के प्रख्यात शायर एवं भाषाविद इंशा अल्लाह ख़ां इंशा अपनी पुस्तक ‘दर्या-ए-लताफ़त’ में लिखते हैं, ‘जो लफ़्ज़ उर्दू में मशहूर और मुस्तमल (उपयोग) हो गया, चाहे अरबी हो या फ़ारसी, तुर्की हो या सिरयानी या पंजाबी हो या पूर्बी, अपने अस्ल की रूह से ग़लत हो या सही, वो लफ़्ज़ बहरहाल उर्दू हैं… उसका ग़लत और सही होना उर्दू ज़बान के इस्तेमाल पर मुनहसिर (आधारित) है।’ बाबा-ए-उर्दू मौलवी अब्दुल हक़ ने इसे ‘उर्दूवाने’ का नाम दिया है।
उर्दू ज़बान में इस्म (संज्ञा) के ज़ख़ीरे में क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों के साथ साथ अरबी, फ़ारसी, तुर्की, हिंदी एवं अंग्रेज़ी आदि भाषाओं के शब्द भी शामिल हैं। फ़ैल (क्रिया) को बुनियादी हैसियत हासिल है कि जिसके बग़ैर बामआनी (सार्थक) फ़िकरे (फ़्रेज़) या जुमले नहीं बन सकते। इस आधार पर उर्दू के तमाम अफ़आल (क्रियाएं) और उनके मसादिर (क्रियाओं का उद्गम) हर्फ़-ए-जार (प्रीपोज़िशन), मुसम्मतें (व्यंजन) और मुसव्वतें (स्वर) आदि पूर्णत: हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़े हुए हैं।
उर्दू ज़बान की अस्ल जड़ यानी खड़ी बोली की प्रमुख पहचान यह है कि उसके असमा (संज्ञाएं), अफ़आल, ज़मीर (सर्वनाम), सिफ़ात (विशेषण) या तवील मुसव्वतें (दीर्घ स्वर) आदि ‘अ’ या ‘अलिफ़’ पर ख़त्म होते हैं। इसी कारण खड़ी बोली को ‘अलिफ़’ या ‘अ’ पर ख़त्म होने वाली बोली कहा जाता है। उर्दू भाषा ने अपने आग़ाज़ से ही खड़ी बोली की लिसानियाती ख़ुसूसियात (भाषाई विशेषताओं) को अपना लिया था।
अदबी (साहित्यिक) सतह पर भी उर्दू एवं क्षेत्रीय भाषाओं का अदब एक-दूसरे को न केवल प्रभावित करता रहा है, बल्कि एक-दूसरी भाषाओं में उनका अनुवाद भी होता रहा है। उर्दू में गीता, महाभारत, रामायण आदि धार्मिक ग्रंथों के अनुवाद भी हुए हैं। और कई लेखकों एवं कवियों जैसे कालिदास, भर्तृहरि, संत कबीर, संत तुकाराम, गुरुनानक एवं गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर आदि की रचनाएं, जातक एवं पंचतंत्र की लोककथाएं, गाथाएं हिंदी, पंजाबी, बंगाली, मराठी, मलयालम, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, गुजराती, कश्मीरी, राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी, मागधी, मालवी, बुंदेलखंडी, कोंकणी, हरियाणवी, सिंधी, उड़िया साहित्य के शाहकारों का उर्दू भाषा में अनुवाद किया जा चुका है। इसी प्रकार उर्दू की साहित्यिक रचनाएं भी हिंदी एवं उक्त भाषाओं में अनुवाद होकर हस्तांतरित हो चुकी हैं।
साहित्य के परस्पर आदान-प्रदान एवं अनुवाद का यह सिलसिला सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने और एक-दूसरे को समीप लाने में महत्वपूर्ण किर्दार अदा कर रहा है। यह काम केवल अनुवाद की हद तक ही नहीं है बल्कि साहित्यिक विधाओं का आदान-प्रदान भी इसमें शामिल है।
सभी भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने की ज़रूरत पहले से भी अधिक इसलिए है कि हमारी सभी भाषाओं को बाहरी भाषाओं से बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है।
हमारी भाषाएं केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर एवं धार्मिक व सामाजिक अस्मिता, अस्तित्व की पहचान भी हैं।
उर्दू की पहली मसनवी ‘कदमराव पदमराव’ में यदि दक़नी अल्फ़ाज़ शामिल हैं तो मोहम्मद अफ़ज़ल के ‘बारहमासा’, ’बिकट कहानी’ और अमीर ख़ुसरौ के हिंदवी कलाम में हिंदी और बृज भाषा के अल्फ़ाज़, कबीर के दोहों में उर्दू एवं भोजपुरी के अल्फ़ाज़, मलिक मो. जायसी की ‘पद्मावत’ में अवधि, अमानत लखनवी की ‘इंदरसभा’ और नज़ीर अकबराबादी की रचनाओं में हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं के अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किये गये हैं। प्रख्यात उर्दू शायर एवं साहित्यकार इंशा अल्लाह ख़ां इंशा ने अपनी लिखित उर्दू दास्तान ‘रानी केतकी की कहानी’ में एक शब्द भी अरबी, फ़ारसी का सम्मिलित नहीं किया है।
यह संक्षिप्त विवरण प्रमाण है कि विभिन्न भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं ने उर्दू भाषा की उत्पत्ति, उद्भव एवं विकास में ही योगदान नहीं दिया है, बल्कि उर्दू साहित्य को प्रबल एवं प्रभावशील बनाने में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। यही वह समावेशी विशेषता है, जिसने अन्य भाषाओं की तरह उर्दू भाषा को भी भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रमुख नमूना बना दिया है।
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हिन्दी उर्दू का भाषाई रिश्ता

मो. नौमान ख़ान
उर्दू साहित्य की सात किताबों के लेखक, 6 किताबों के संपादक और दर्जनों पाठ्यपुस्तकों के संकलक/संपादक रह चुके हैं डॉ. नौमान। सवा सौ ज़्यादा शोधपत्र प्रकाशित हैं। आधा दर्जन साहित्यिक किताबें प्रकाशनाधीन हैं। दर्जनों सेमिनार में बतौर एक्सपर्ट वक्ता शामिल होने के साथ ही आपको आधा दर्जन से ज़्यादा महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। 2 जुलाई 1952 को जन्मे डॉ. नौमान एनसीईआरटी में प्रोफ़ेसर रहे हैं और बतौर पत्रकार और महत्वपूर्ण अकादमिक संस्थानों में सेवाएं दे चुके हैं।
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