सलीम सरमद, saleem sarmad
पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....

लफ़्ज़, सियासत और अली सरदार जाफ़री

            तरक़्क़ीपसंद शायरी का ज़िक्र आते ही उन लफ़्ज़ों की दस्तकों की धमक सुनायी देने लगती है, जिनमें सिर्फ़ नारेबाज़ी है। हर शायर का एक ही एजेंडा है। एक जैसे मसाइल, एक ही हल, हर ज़बाँ पर एक ही बात… कोई भी लफ़्ज़ हो लेकिन एक ही मफ़हूम… हर सुख़नवर के पास एक ही आवाज़ है। जैसे हांफते, तड़पते, प्यासे पंछियों का झुंड एक साथ चीख रहा है।

मक़तूलों का क़हत पड़ न जाये
क़ातिल की कहीं कमी नहीं है
काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूच-ए-क़ातिल के सिवा
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बे-गुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा
जिसकी तेग़ है दुनिया उसकी जिसकी लाठी उसकी भैंस
सब क़ातिल हैं सब मक़्तूल हैं सब मज़लूम हैं ज़ालिम सब
ज़ख़्मी सरहद ज़ख़्मी क़ौमें ज़ख़्मी इंसाँ ज़ख़्मी मुल्क
हर्फ़-ए-हक़ की सलीब उठाये कोई मसीह तो आये अब

ali sardar jafri

मैंने उन सुख़नवरों को ख़ुश होते हुए भी देखा है, जिन्होंने तरक़्क़ीपसंद तहरीक से जुदा अपनी ज़ाती दुनिया बसायी और उनको भी पढ़ा है, जो इसके घेरे को तोड़ने में आगे रहे। मैं भी तब उनकी बातों में आ गया था और सोचता रहा कि मैं क्यों किसी पॉलिटिकल विल को ढोने पर मजबूर हो जाऊं? जो आग मेरे घर तक पहुँची ही नहीं उसको बुझाने के जतन में कैसे लग जाऊं? मैं क्यों अपनी ज़ेह्नी सतह पर एक ही प्रकार की आईडियोलॉजी का भार धर लूँ? क्यों मेरे मन की दीवारों पर सांप की तरह एक ही रंग की बेलें चढ़ें? बरसों तक भोपाल की सेंट्रल लाइब्रेरी में अली सरदार जाफ़री साहब की किताब ‘मेरा सफ़र’ आँखों के सामने आती-जाती रही, कभी-कभार किताब उठायी भी, एक-दो पन्ने पलटकर देखे भी, कुछ सतरें पढ़ीं और फिर उसे रख दिया। काश किताब में साँसें होतीं तो मेरी इस हरकत पर मुस्कुरातीं ज़रूर। एक दिन मुझे एक आवाज़ सुनायी दी… जो मेरे इतने क़रीब थी मानो मेरे ही अंदर से आयी हो। आवाज़ थी- कौन आज़ाद हुआ, किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी… कोई इसे इकतारे की धुन पर बुलंद आवाज़ में गा रहा था-

और सोने के चमकते सिक्के
डंक उठाये हुए फन फैलाये
रूह और दिल पे चला करते हैं
मुल्क और क़ौम को दिन-रात डसा करते हैं
कौन आज़ाद हुआ?
किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी

इस आवाज़ का पीछा करते हुए मैं अली सरदार जाफ़री की किताब मेरा सफ़र के पास फिर जा पहुँचा और इस बार उस किताब में साँसें थीं, वो मुस्कुरा रही थी और किताब आख़िर वही गीत गा रही थी-

कौन आज़ाद हुआ?
किसके माथे से सियाही छूटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
मादर-ए-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही
ख़ंजर आज़ाद हैं सीनों में उतरने के लिए
मौत आज़ाद है लाशों पे गुज़रने के लिए
चोर-बाज़ारों में बद-शक्ल चुड़ैलों की तरह
क़ीमतें काली दुकानों पे खड़ी रहती हैं
हर ख़रीदार की जेबों को कतरने के लिए
कार-ख़ानों पे लगा रहता है
साँस लेती हुई लाशों का हुजूम
बीच में उनके फिरा करती है बेकारी भी
अपना खूँ-ख़्वार दहन खोले हुए
कौन आज़ाद हुआ?
किसके माथे से सियाही छूटी

वोट बैंक की राजनीति, लालची मीडिया, मुद्दाविहीन युवा, समाज में फैली नफ़रत, विधर्मियों की लाशें देखने की हसरत में बूढ़े होते शरीर, देश और धर्म के पाटों में पिसती हुई इंसानियत… नीति और नीयत को बर्बाद कर देती है। ऐसे में कोई कैसे लफ़्ज़ों से दिल बहला सकता है… वो आज भी लफ़्ज़ों को क्रांति का वसीला क्यों नहीं बनाएगा?

हम तो घर से निकले थे जीतने को दिल सबका
तेग़ हाथ में क्यूँ है दोश पर कमाँ क्यूँ है
कितनी आशाओं की लाशें सूखें दिल के आँगन में
कितने सूरज डूब गये हैं चेहरों के पीले-पन में
अभी तो औरों के दीवार-ओ-दर पे यूरिश थी
अब अपने साया-ए-दीवार-ओ-दर की ख़ैर मनाओ

हाँ तरक़्क़ीपसंद तहरीक के दौर की शायरी में कुछ ख़ामी होगी… वो इंसानी साइकी को छू नहीं पायी। लफ़्ज़ों से मासूमियत छूटती गयी मगर वजह तो होगी जो मजमूई तौर पर राजनीति और शायरी का घालमेल हो गया और लफ़्ज़ कारख़ानों, मज़दूरों, भूके बच्चों, नीम बरहना मांओं, महकूमों, मज़लूमों तक सीमित रह गये। ख़ैर लफ़्ज़ अगर सियासत के सीने पर वार करना चाहता है तो पहले उसे अपने लहू को अपनी आँख से टपकाना होगा, कबीर के दर्शन को अपनाना होगा।

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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