जाहिद खान, jahid khan
पाक्षिक ब्लॉग ज़ाहिद ख़ान की कलम से....

न वो दिल है न वो शबाब... आबरू-ए-ग़ज़ल ख़ुमार बाराबंकवी

           ख़ुमार बाराबंकवी का शुमार मुल्क के उन आलातरीन शायरों में होता है, जिनकी शानदार शायरी का ख़ुमार एक लंबे अरसे के बाद भी नहीं उतरा है। एक दौर था जब उनकी शायरी का ख़ुमार, उनके चाहने वालों के सर चढ़कर बोलता था। जिन लोगों ने मुशायरों में उन्हें रू-ब-रू देखा-सुना है या उनके पुराने यूट्यूब वीडियो देखे हैं, वे जानते हैं कि वे किस आला दर्जे के शायर थे। मुल्क की आज़ादी के ठीक पहले और उसके बाद जिन शायरों ने मुशायरे को आलमी तौर पर मक़बूल किया, उनमें भी ख़ुमार बाराबंकवी का नाम अव्वल नंबर पर लिया जाता है। मुशायरों की तो वे ज़ीनत थे और उन्हें आबरू-ए-ग़ज़ल तक कहा जाता था।

साल 1938 में महज़ उन्नीस साल की उम्र में मोहम्मद हैदर ख़ान ने ख़ुमार बाराबंकवी के नाम से बरेली में अपना पहला मुशायरा पढ़ा। मुशायरे में जब उन्होंने अपना पहला शे’र ‘वाक़िफ नहीं तुम अपनी निगाहों के असर से/इस राज़ को पूछो किसी बर्बाद नज़र से।’ पढ़ा, तो इस शे’र को स्टेज पर बैठे शायरों के साथ-साथ सामईन की भी भरपूर दाद मिली। ये तो महज़ एक शुरूआत भर थी, बाद में मुशायरों में उन्हें जो शोहरत मिली, उसे उर्दू अदब की दुनिया से वाक़िफ़ सब लोग जानते हैं। ‘ख़ुमार’ उनका तख़ल्लुस था, जिसके हिंदी मायने ‘नशा’ है और उन्होंने अपने इस नाम को हमेशा चरितार्थ किया।

ख़ुमार बाराबंकवी मुशायरों में अपनी ग़ज़लें तहत की बजाय तरन्नुम में पढ़ते थे। जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी से लेकर मजरूह सुल्तानपुरी तक उस दौर के ज़्यादातर शायर, मुशायरों के अंदर तरन्नुम में ही अपनी ग़ज़लें पढ़ा करते थे। यह एक आम रिवाज था, जो सामईन को भी काफ़ी पसंद आता था। ख़ुमार बाराबंकवी भी उसी रहगुज़र पर चले। उनकी आवाज़ और तरन्नुम ग़ज़ब का था। जिस पर ग़ज़ल पढ़ने का उनका एक जुदा अंदाज़, हर मिसरे के बाद ‘आदाब’ कहने की उनकी दिलफ़रेब अदा, उन्हें दूसरे शायरों से अलग करती थी।

इब्तिदाई दौर में ख़ुमार बाराबंकवी ने अपने दौर के सभी बड़े शायरों के साथ मंच साझा किया। अपने कलाम से वे लोगों को अपना दीवाना बना लेते थे। इश्क़-मोहब्बत, माशूक़ के साथ मिलन-जुदाई के नाज़ुक एहसास में डूबी ख़ुमार बाराबंकवी की ग़ज़लें सुनने वालों पर गहरा जादू-सा करती थीं। ख़ुमार बाराबंकवी का समूचा कलाम यदि देखें, तो वे अपनी ग़ज़लों में अरबी, फ़ारसी के कठिन अल्फ़ाज़ का न के बराबर इस्तेमाल करते थे। उनकी ग़ज़लों के ऐसे कई शे’र मिल जाएंगे, जो अपनी सादा ज़बान की वजह से ही लोगों के बीच मशहूर हुए और आज भी उतने ही मक़बूल हैं। ‘न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है/दिया जल रहा है हवा चल रही है’, ‘कोई धोका न खा जाये मेरी तरह/ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिए’… इस तरह के अशआर आसानी से सामईन के कानों से होते हुए, उनकी रूह तक उतर जाते हैं।

ख़ुमार बाराबंकवी थोड़े से ही अरसे में पूरे मुल्क में मशहूर हो गये। मुशायरे में उन्हें और उनकी शायरी को तवज्जोह दी जाने लगी। यह वह दौर था, जब जिगर मुरादाबादी और ख़ुमार बाराबंकवी का किसी भी मुशायरे में होना, मुशायरे की कामयाबी की गारंटी माना जाता था। लोग इन्हें ही मुशायरे में सुनने आया करते थे।

ख़ुमार बाराबंकवी बुनियादी तौर पर ग़ज़ल-गो थे। जिनकी ग़ज़ल-गोई का कोई सानी नहीं था। उन्होंने नज़्में न के बराबर लिखीं। मुल्क में जब तरक़्क़ीपसंद तहरीक अपने उरूज पर थी और ज़्यादातर बड़े शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, जोश मलीहाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी, मख़दूम नज़्में लिख रहे थे, तब भी ख़ुमार बाराबंकवी ने ग़ज़ल का दामन नहीं छोड़ा। हसरत मोहानी, जिगर मुरादाबादी और मजरूह सुल्तानपुरी की तरह उनका अक़ीदा ग़ज़ल में ही बरक़रार रहा। अपने शानदार अशआर से उन्होंने ग़ज़ल को अज़्मत बख़्शी। वे मुशायरे में शायरी इस अंदाज़ में पढ़ते, जैसे सामईन से गुफ़्तगू कर रहे हों। अपनी शायरी और ख़ूबसूरत तरन्नुम से ख़ुमार बाराबंकवी मुशायरे को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा देते थे। सामईन उन्हें घंटों सुनते, मगर उनका दिल नहीं भरता। इस तरह की मक़बूलियत बहुत कम शायरों को हासिल हुई है।

ख़ुमार बाराबंकवी की एक नहीं, कई ऐसी ग़ज़लें हैं, जो आज भी उसी तरह से गुनगुनायी जाती हैं। उनकी मशहूर ग़ज़लों के कुछ अशआर हैं, ‘तेरे दर से जब उठके जाना पड़ेगा/ख़ुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा’, ‘ख़ुमार उनके घर जा रहे हो तो जाओ/मगर रास्ते मैं ज़माना पड़ेगा।’, ‘वही फिर मुझे याद आने लगे हैं/जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं’, ’क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गयी है/ख़ुमार अब तो मस्जिद जाने लगे हैं’, ‘बुझ गया दिल हयात बाक़ी है/छुप गया चाँद रात बाक़ी है’, ‘न वो दिल है न वो शबाब ख़ुमार/किस लिए अब हयात बाक़ी है’…

जाहिद ख़ान

जाहिद ख़ान

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।

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