राजा अवस्थी, raja awasthi
पाक्षिक ब्लॉग राजा अवस्थी की कलम से....

साहित्य की सकारात्मक दृष्टि

            साहित्कार, साहित्य, दर्शन और आलोचना के लिए दृष्टि महत्वपूर्ण है। दृष्टि के साथ दिशा भी बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है। दृष्टि और दिशा दोनों के लिए सकारात्मकता को बहुत ज़रूरी या कहें कि सबसे अधिक ज़रूरी तत्व की तरह समझा जाता है और समझने की हिदायत दी जाती है। सकारात्मकता को मैं भी उत्तम समझता हूँ, किन्तु सकारात्मकता के लिए हम निकट अतीत को या उस अतीत को भुला नहीं सकते, जिसे हमने देखा, भोगा और जिया हो। हम ऐसे सुदूर अतीत के गान से सकारात्मकता का विकास नहीं कर सकते, जो हमें आज अलौकिक लग रही हो। जिसके बारे में सिर्फ़ पढ़ा हो। हमें गलवान घाटी के सौंदर्य का वर्णन करते समय सैनिकों की शहादत और चीन के छल को भी लिखना ही होगा। दीपों से जगमगाते बनारस के घाटों पर लिखते हुए ठगों की ठगी और वहाँ के अधिकांश पंडितों की दयनीय दशा को नहीं छोड़ा जा सकता। हम वह लिखें, कि आज से पचास साल बाद कोई उसे पढ़े तो हमारे आज की स्थितियों के संकेत पा सके।

कालिदास जब भागते हुए हिरण के सौंदर्य का वर्णन करते हैं, तो वह निरुद्देश्य नहीं है।वास्तविक और उत्तम कविता का उदय करुणा से होता है, किन्तु यह करुणा दया-भाव नहीं है। यह करुणा आक्रोश पैदा करती है। यही आक्रोश वाल्मीकि में करुण दृश्य को देखने के बाद पैदा हुआ और वे व्याध को श्राप दे देते हैं। यहीं से कविता और आदिकवि का जन्म होता है। कालिदास भी उपरोक्त दृश्य-वर्णन के द्वारा दृश्य की समाप्ति पर गहन करुणा की व्याप्ति चाहते हैं और सफल भी होते हैं। वहीं वे दुष्यन्त को आक्रोश से बचाने के लिए ऋषि दुर्वासा के द्वारा श्राप की योजना भी अपने ग्रन्थ में करते हैं। अन्यथा महाभारत में मूलकथा में यह श्राप वाला प्रसंग नहीं है। वहाँ राजा दुष्यन्त की प्रवृत्ति को ही ऐसा कहा गया है। तात्पर्य यह कि हमें पता होना चाहिए कि हम क्या और क्यों लिख रहे हैं?

लेखक का उद्देश्य और लेखक की अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदारी महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी ईमानदारी हमारे समय और समाज के प्रति हमारे दायित्व को निभाने में दिखनी चाहिए। एक ही समय और समाज में रहते हुए भी सबकी अलग दृष्टि और अलग दिशा होने के कारण सबका अपना अलग लेखन, अलग शैली और अपनी अलग मौलिकता होती है, होनी ही चाहिए। और इसका सम्मान भी किया जाना चाहिए।

अपनी दृष्टि, दिशा, मन्तव्य और मौलिकता की रक्षा करते हुए अपने समय को जब-जब भी लेखन के साथ रखा जाता है, तब-तब वह लेखन, वह सृजन, वह रचनाकर्म महत्वपूर्ण होता है। वह सृजन अपराध और अपराधी के प्रति आक्रोश पैदा करने में समर्थ होता है। अपराध और अपराधी के प्रति आक्रोश पैदा होना ज़रूरी है और अपराध छिपा लिया जाये, लोग उसके बारे में जान ही न पाएँ, तो समाज में अपराध और अपराधी ही बढ़ेंगे। इसका तात्पर्य यह नहीं कि हमें सौंदर्य की उपासना, प्रशंसा ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें सौंदर्य की रक्षा और प्रशंसा करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि इनकी रक्षा में काँटों की बड़ी भूमिका है। हमें उन काँटों का भी आभारी होना ही चाहिए और यह आभार प्रकट भी करना चाहिए। फूलों के बाग़ की रक्षा करने के लिए काँटों की बाड़ लगानी ही पड़ती है और यह बाड़ लगाने का ख़्याल पहली बार बाग़ को नुक़सान होने के बाद ही आया होगा। साहित्य, दर्शन और आलोचना की कोई सकारात्मक दृष्टि समय और समाज के प्रति ईमानदारी के बिना सार्थक हस्तक्षेप नहीं कर सकती। सकारात्मकता और नकारात्मकता को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से समझे बिना इन दो शब्दों के मर्म को पकड़ पाना मुश्किल है।

राजा अवस्थी

राजा अवस्थी

सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।

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