मिथलेश रॉय, mithlesh roy
पाक्षिक ब्लॉग मिथलेश रॉय की कलम से....

मम्मी की फिल्मी यादें और कल्पना की दास्तान

           मम्मी जी ज़मींदार घर से थीं, ब्याह भी वैसे ही परिवार में हुआ, लेकिन थोड़ा फ़ायदा यह हुआ कि बाबूजी की नौकरी के कारण शहडोल आ गयीं। बच्चों और ख़ासकर लड़कियों पर, मर्यादा, नैतिकता के पाठ के तहत अनेक पाबंदियां होती हैं। लिहाज़ा मम्मी भी तमाम पाबंदी में पली बढ़ीं, उनके शहर में उनके ज़माने में कई टॉकीज़ें थीं पर वह फ़िल्म देखने नहीं जा सकती थीं, जबकि उनको फ़िल्मों का बहुत शौक़ था। नानी के साथ बाज़ार जातीं तो फ़िल्मी गानों की किताब खरीद लातीं, उनमें छपी पिक्चर में उन्होंने पुराने हीरो दिलीप कुमार, अशोक कुमार, देव आनंद को देखा था। रेडियो उन्हें सुनने से कोई नहीं रोकता, मम्मी जब कभी गातीं, “चंदा मामा आरे आवअ पारे आवअ” या “लाल रंग मुंगवा सबुज रंग मोतिया” तो हमें लगता ख़ुद बनाकर गा रही हैं। पर बाद में पता चला ये तो फ़िल्मी गाने हैं।

मम्मी और मेरा फ़िल्म देखने का सफ़र एक साथ शुरू हुआ। शहडोल में तब तीन टॉकीज़ें थीं, बाबूजी अक्सर ट्रांसफर पर रहते, लेकिन घर पर बड़ी दीदी का पूरा कन्ट्रोल था। हम दोनों भी डरते थे। इसका उपाय हमने ढूंढ लिया था। शनिवार को बाज़ार सब्ज़ी के लिए निकलते और उधर से पिक्चर देखकर शाम को लौटते। मम्मी को अभिताभ का डांस बहुत अच्छा लगता। फ़िल्में भी पसन्द थीं क्योंकि उन दिनों वही हीरो था, जो विलेन से पूरी तबीयत से बदला लेता था। हालांकि फ़िल्म देखना मम्मी और मेरे लिए जोखिम भरा था। बड़ी सावधानी रखनी पड़ती थी। ज़रा सी चूक से सब बेकार हो जाता। ख़ैर अब वही सब याद करके हम लोग ख़ूब हंसते हंसाते हैं।

आज पानी बरस रहा है। कुछ भुट्टे खेत से आये हैं। लव और कुशा की ज़िद्द पर मम्मी जी भुट्टे भूंजने के लिए बैठी हैं। मम्मी जी बैठीं, मतलब बात फ़िल्मों की छिड़ गयी। भाभी ने मम्मी जी से पूछा- ‘ना अम्मा जी सुनने में आया कि आप और बबुआ जी ख़ूब पिक्चर देखते थे’। मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘हां देखते थे, संविधान में कहां लिखा है कि औरत और बच्चों को फ़िल्म नहीं देखनी चाहिए। देखो बहू हर फ़िल्म में अच्छाई बुराई दोनों दिखायी जाती है, अब यह देखने वाले पर है वह क्या देखता है।’ मम्मी की बात सुनकर घर के और लोग भी आ गये, होने लगा सवाल जवाब। किसी ने, शायद अलका ने पूछा मम्मी जी आपको सबसे अच्छी हीरोइन कौन लगती थी? मम्मी ने कहा, नये में रेखा और हेमा पर मुझे सबसे पहली दिलचस्पी कल्पना कार्तिक को देखने में थी।

taxi driver movie poster

‘वो कौन थी?’ किसी ने मज़ाक़ में मम्मी की याददाश्त जानने के लिए पूछा। ‘कल्पना कार्तिक देव आनंद की पत्नी थीं’। ‘तो उससे आपको क्या?’ अबकी बार कुशा ने पूछा। हंसते हुए मम्मी ने कहा, “लड़कपन था, मैं कल्पना कार्तिक के बारे में इसलिए जानना चाहती थी क्योंकि जिस देव आनंद के काली कमीज़ पहनकर सड़क पर निकल जाने से लड़कियां छत से गिर जाती थीं, जिसकी सुंदरता के अनेक क़िस्से मशहूर थे और जो देव आनंद सुरैया के लिए पागल था, उसने अगर कल्पना से शादी की तो उसमें ज़रूर कोई बात तो होगी…

इस कल्पना कार्तिक को देखने के लिए मैं दिल्ली गयी। अपनी बहन को मनाया, फिर हम दोनों ने वहां फ़िल्म देखी ‘टैक्सी ड्राइवर’। कहते हैं इस फ़िल्म के बनने के दौरान ही दोनों ने शादी भी कर ली थी। वैसे फ़िल्म में सभी का काम बहुत अच्छा लगा था। शीला रमानी जो पहली सिंधी अभिनेत्री थी, इस फ़िल्म में डांस क्लब चलाने वाली एक डांसर है, जो मंगल (देव आनंद) से प्रेम करती है। जबकि माला (कल्पना कार्तिक) एक लोक गायिका है, जो एक संगीतकार के बुलावे पर बॉम्बे आती है। जहां गुंडों से मंगल उसको बचाता है। फिर गाना चलता है, “देखो माने नहीं रूठी हसीना” और दोनों के प्रेम प्रसंग के साथ कहानी आगे बढ़ती है। दोनों के बीच सादगी भरी नोक झोंक ने मेरा दिल जीत लिया और मैं कल्पना के अभिनय की एक तरह से मुरीद हो गयी। जॉनी वाकर मंगल का दोस्त है, जो उसकी हर जगह मदद करता है। इसी फ़िल्म का एक गाना मुझे बड़ा अच्छा लगा, “मस्तराम बनके ज़िंदगी के दिन गुज़ार दे” और मैंने तो अपनी ज़िन्दगी मस्तराम बनके बिता दी। जब तक सांसें हैं, हमें तो ऐसे ही रहना है। ऐसा मैंने इस फ़िल्म को देखने के बाद ही तय कर लिया था। ख़ैर, मेरी बहन को फ़िल्मों की ख़ूब जानकारी थी, उसी ने बाद में बताया कि कल्पना कार्तिक पंजाबी परिवार से थी। उसका असल नाम मोना सिंह था।

दरअसल भारत पाकिस्तान बंटवारे के समय नवकेतन फ़िल्म बैनर की मुख्य हीरोइन सुरैया पाकिस्तान चली गयी, अब चेतन आनंद को नयी हीरोइन की तलाश थी। उन्हीं दिनों कल्पना को मिस शिमला चुना गया। चेतना आनंद वहीं थे। उन्होंने कल्पना को अपने बैनर तले फ़िल्म में काम करने के लिए मना लिया। कल्पना की बतौर हीरोइन पहली फ़िल्म ‘बाज़ी’ हिट रही। उसके बाद कल्पना को इसी फ़िल्म में मोना सिंह की जगह नया नाम मिला। बाद में कल्पना ने आंधियां, हमसफर, टैक्सी ड्राइवर कुल छः फिल्मों में काम किया…”

फिर? (लव ने उत्सुकता से पूछा) “फिर क्या? शादी हो गयी उसकी, शादी के बाद जो मेरा हाल है, वही उसका भी हुआ”। मम्मी की बात पर सब हंसने लगे। हां सही है, औरत के साथ बहुत दिक्कत है। अभिनेता शादी के बाद बूढ़े होने तक फ़िल्में बनाते रहते हैं, जबकि अभिनेत्री की शादी हुई नहीं कि उसकी सारी क़ाबिलियत धरी की धरी रह जाती है।

– तब अम्मा जी शादी बेकार है कि अच्छी? भाभी ने पूछा। मम्मी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा, “रहिमन ब्याह व्याधि है सकहूं तो जाय बचाये, पाहन बेड़ी पड़त है ढोल बजाये बजाये…” अंत में मम्मी ने कहा, “कथा गईल वन में सोचा अपना मन में, आईं त कहिए न आई त जन कहिए”।

मिथलेश रॉय, mithlesh roy

मिथलेश रॉय

पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।

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