
- August 30, 2025
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पाक्षिक ब्लॉग प्रीति निगोसकर की कलम से....
सुषमा जैन - परम्परा का नया रूप
सुषमा जैन-एक सौम्य व्यक्तित्व। व्यक्तित्व की झलक उनके चित्रों में साफ़ झलकती है। शांत स्वभाव कलाकार लाल, पीले, रंगों को चित्रों में उतारती हैं और गर्म रंगों को भी शांत करते हुए बरतती हैं। उनके पीले रंग में नारंगी, लाल सभी रंग अपनी पूरी गरिमा के साथ उतरते हुए सौम्यता और शांति का अहसास देते हैं।
विषयसूचक चित्र, प्राकृतिक चिह्न, इंसानी आकारों का विषयानुरूप आकारने और भाव पक्ष उभारने के लिए टेक्सचर का सहारा लेती हैं सुषमा जैन। टेक्सचर्स भी बहुत भिन्न-भिन्न आकारों में विषयानुसार और संयोजन के अनुरूप रंगों से बड़े ही सरल तरीक़े से बने दिखायी पड़ते हैं। चित्र बनाने के पीछे उनका परिश्रम भी स्पष्ट दिखता है। परिश्रम ही नहीं उनके कलाकार की एकाग्रता और सोच की गंभीरता भी उल्लेखनीय होती है।
सुषमा जैन, उज्जैन जैसे सांस्कृतिक शहर में जन्मीं, पली-बढ़ीं और शहर के कलाविद गुरुओं के मार्गदर्शन में प्रशिक्षित हुईं। स्वर्गीय पद्मश्री वि.श्री. वाकणकर जी की कलाकक्षा ‘भारती कला भवन’ में शिक्षण लेती रहीं। आज भी वह कलाकक्षा, कलागुरु, गुरुमाता और उस गुरुकुल का वातावरण उनके सतत कलाक्षेत्र में निरंतर बढ़ते जाने का प्रेरणास्रोत है। उज्जैन में अखिल भारतीय चित्र एवं मूर्तिकला प्रदर्शनी की शुरुआत वाकणकर सर ने ही की थी और कालिदास उत्सव का शहर पर बहुत बड़ा असर रहा। इन कलागुरुओं, घटनाओं और वातावरण का असर सुषमा जैन पर बचपन से ही रहा। वह नगर की इस गरिमा और सभ्यता को साथ ले चलती रहीं।
कालिदास विषय चित्रित करते-करते उस परम्परागत चित्रण शैली को आज के समय और बदले विषयानुसार चित्रित करती हुई सुषमा परम्परा में अपने रंग, आकार और सोच से परिवर्तित रूप प्रस्तुत कर रही हैं। भारतीयता के प्रतीकों और तौर-तरीक़ों से बने सौम्य और सभ्य चित्रों की शृंखलाएं मनलुभावन तो हैं ही, ऐसे भी हैं कि आम आदमी को सहज समझ में आएं। उनके चित्र सीधे जनमानस के दिलो-दिमाग़ तक पहुँचते हैं। सुषमा की बहुत बड़ी सफलता है कि उनके चित्र बिना शब्दों के ही अपने रंगों और आकारों के संयोजन से सीधे दर्शक तक पहुँच जाते हैं।
सुषमा जैन : एक नज़र में
वाकणकर जी के सान्निध्य में अपनी कलायात्रा करती रहीं सुषमा जैन पारम्परिक चित्रकला को अपने अनोखे अंदाज़ में ढाल रही हैं। दरअसल उज्जैन शहर में कालिदास रचित ग्रंथों पर चित्रों को लेकर अखिल भारतीय स्तर की स्पर्धाएं और आयोजन होते हैं इसलिए यहां के विद्यार्थियों पर इन प्रदर्शनियों और परंपरा का प्रभाव दिखता है।
सुषमा ने विवाहोपरांत अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए 22 साल के अंतराल के बाद कूची थामी और इन्दौर के देवलालीकर कला वीथिका में अपने चित्र प्रदर्शित किये। रंगों का चयन विषयानुसार करने वाली सुषमा ने ‘मराठा राज्य की भित्ति चित्र परम्परा’ पर रिसर्च कर पी.एच.डी. हासिल की है। शुभांकन फाइन आर्ट्स कॉलेज, इन्दौर में दो दशक तक प्राचार्य पद सुशोभित किया है। सेवानिवृत्त होकर पुनः अपने चित्रण में व्यस्त हैं और प्रदर्शनियाँ लगाती हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके शोध पत्र प्रकाशित होते रहे हैं। प्रागैतिहासिक चित्रकला, जैन मूर्ति शिल्प और भित्ति चित्रकला, आदिवासी गोदना, चित्रकला का मराठा युग में विकास आदि विषय पर लेखन कार्य जारी है। कला महाविद्यालय परिसर में 6 दिवसीय राष्ट्रीय कला शिविर, कार्यशाला और कला प्रदर्शनी का आयोजन, कला कुम्भ 2015-2016 का आपने सफलतापूर्वक आयोजन किया है। विभिन्न राज्य स्तरीय प्रतियोगिता की निर्णायक भूमिका में भी आप रही हैं।
एकल प्रदर्शनी जहाँगीर आर्ट गैलरी, मुंबई में काफ़ी सराही गयी और अनेक एकल और समूह प्रदर्शनियों में आपका सहभाग रहा। कई सम्मान और कला क्षेत्र के भिन्न-भिन्न पदों पर सेवाएं भी उल्लेखनीय रही हैं। प्रकृतिप्रेमी सुषमा पारम्परिकता को नये सिरे से अपने कैनवास पर ढालते हुए कुछ निराली ही कृतियाँ गढ़ रही हैं।

प्रीति निगोसकर
पिछले चार दशक से अधिक समय से प्रोफ़ेशनल चित्रकार। आपकी एकल प्रदर्शनियां दिल्ली, भोपाल, इंदौर, उज्जैन, पुणे, बेंगलुरु आदि शहरों में लग चुकी हैं और लंदन के अलावा भारत में अनेक स्थानों पर साझा प्रदर्शनियों में आपकी कला प्रदर्शित हुई है। लैंडस्केप से एब्स्ट्रैक्शन तक की यात्रा आपकी चित्रकारी में रही है। प्रख्यात कलागुरु वि.श्री. वाकणकर की शिष्या के रूप में उनके जीवन पर आधारित एक पुस्तक का संपादन, प्रकाशन भी आपने किया है। इन दिनों कला आधारित लेखन में भी आप मुब्तिला हैं।
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