
- April 26, 2025
- आब-ओ-हवा
- 0
गीत तब
हबीब जालिब
इक पटरी पर सर्दी में
अपनी तक़दीर को रोये
दूजा ज़ुल्फ़ों की छाँव में
सुख की सेज पे सोये
राज सिंहासन पर इक बैठा
और इक उसका दास – भए कबीर उदास
ऊँचे-ऊँचे ऐवानों में
मूरख हुकम चलाएँ
क़दम-क़दम पर इस नगरी में
पंडित धक्के खाएँ
धरती पर भगवान बने हैं
धन है जिनके पास – भए कबीर उदास
गीत लिखाएँ, पैसे ना दें
फ़िल्म नगर के लोग
उनके घर बाजे शहनाई,
लेखक के घर सोग
गायक सुर में क्यों कर गाये,
क्यों ना काटे घास – भए कबीर उदास
कल तक जो था हाल हमारा
हाल वही है आज
‘जालिब’ अपने देस में सुख का
काल वही है आज
फिर भी मोची गेट पे लीडर
रोज़ करे बकवास – भए कबीर उदास

हबीब जालिब
24 मार्च 1928 को जन्मे जालिब को उनके समकालीन फ़ैज़ ने 'अवामी शायर' की उपाधि दी थी। उन्होंने अपनी शायरी और जीवन में अधिनायकवाद, तानाशाही, सैन्य शासन और राज्य की क्रूरताओं का विरोध किया। कई बार जेल गये। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों ने प्रतिरोध का एक नायाब स्वर पैदा किया।
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