अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare
पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....

21वीं सदी में व्यंग्य: अभिव्यक्ति के नये उपकरण तलाशना ज़रूरी

             21वीं सदी व्यंग्य के लिए वरदान बनकर आयी है। इस सदी में व्यंग्य हाशिये और संपादकीय पेज से निकलकर साहित्य की मुख्यधारा में स्थापित हो गया है। उसकी लोकप्रियता में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। व्यंग्य की इस स्थिति को देखते हुए मैंने कुछ वर्ष पूर्व मासिक व्यंग्य-पत्रिका ‘अट्टहास’ के एक अंक का अतिथि संपादन करते हुए लिखा था कि “यह व्यंग्य का स्वर्णकाल है। आज व्यंग्य के उपवन में फागुन छाया हुआ है और उसे पतझड़ का कोई भय नहीं है।”

स्वर्णकाल कहे जाने के पीछे उस समय मेरे मन में कई ठोस कारण थे, जो आज भी हैं। पहला तो यही है वर्तमान में जितने व्यंग्यकार सक्रिय हैं, उतने एक साथ पहले कभी नहीं रहे। बीस-पच्चीस वर्ष पहले सक्रिय व्यंग्यकारों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती थी, लेकिन आज नाम लिखने बैठें तो यह संख्या पाँच सौ से ऊपर पहुँच जाएगी और फिर भी कुछ नाम छूट जाने की आशंका बनी रहेगी। दूसरा कारण यह है कि इस सदी के मात्र पच्चीस वर्षों में जितने व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं, उतने शायद पिछली पूरी सदी में भी नहीं आये होंगे। इनके साथ ही हर वर्ष दर्जन भर से अधिक साझा संकलन भी नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे हैं। अनेक प्रकाशकों द्वारा कई चर्चित व्यंग्यकारों के मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, मेरी प्रतिनिधि व्यंग्य रचनाएँ, चुनिंदा व्यंग्य, गौरतलब व्यंग्य, चयनित व्यंग्य व बेहतरीन व्यंग्य शीर्षक से संग्रह प्रकाशित किये गये हैं। तीसरा महत्वपूर्ण कारण अख़बारों में व्यंग्य की बढ़ती स्वीकार्यता है। आज लगभग हर प्रमुख अख़बार प्रतिदिन व्यंग्य प्रकाशित करता है। कुछ अख़बारों के पास सीमित स्पेस है- 300 से 500 शब्दों तक, तो कुछ इस सीमा से परे जाकर बड़े व्यंग्यों को भी स्थान देते हैं। इसके साथ ही साहित्यिक पत्रिकाएँ भी व्यंग्य को नियमित रूप से प्रकाशित कर रही हैं और समय-समय पर व्यंग्य विशेषांक निकालकर व्यंग्य की लोकप्रियता को मान्यता दे रही हैं। कुछ सामाजिक एवं राजनीतिक पत्रिकाओं ने भी व्यंग्य के कॉलम प्रारंभ कर व्यंग्य की उपादेयता को स्वीकार किया है। चौथा कारण ई-मेल और द्रुतगामी डाक सेवाओं ने प्रकाशन की प्रक्रिया को अत्यंत सरल, सहज और त्वरित बना दिया है, जिससे व्यंग्यकारों की संख्या में वृद्धि हुई है। पाँचवाँ महत्वपूर्ण पहलू है- ब्लॉगिंग की सुलभता, ई-पत्रिकाओं की बढ़ती लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर स्व-प्रकाशन की सुविधा। इन माध्यमों ने न केवल व्यंग्य के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया है, बल्कि उसके लिए भरपूर पोषक तत्व भी उपलब्ध कराये हैं। यूट्यूब, ऑडियो बुक्स और बॉक्स एफ.एम. जैसे दृश्य-श्रव्य माध्यमों ने भी व्यंग्य को एक नयी ज़मीन प्रदान की है, जिसके परिणामस्वरूप व्यंग्य की पहुँच विस्तृत हुई है तथा एक नया श्रोता-पाठक वर्ग भी व्यंग्य के प्रति आकृष्ट हुआ है।

व्यंग्य परिदृश्य की चिंताएं

आज के व्यंग्य को लेकर कुछ आलोचकों और व्यंग्य के सुधी प्रेमियों में संशय और चिंता का भाव भी देखा जाता है। उनकी चिंता यह है कि समकालीन व्यंग्य की रचनाएँ क्या सुदीर्घ जीवन पा सकेंगी? क्या उन्हें बीस-पच्चीस वर्षों बाद भी कोई स्मरण करेगा? उनका मानना है कि हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी और प्रेम जनमेजय जैसी परंपराओं को आगे बढ़ाने वाली कालजयी रचनाओं का प्रवाह धीरे-धीरे मंद पड़ रहा है।

यह चिंता एक हद तक वाजिब है, परंतु परिदृश्य पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। हाल के वर्षों में कई ऐसी सशक्त रचनाएँ सामने आयी हैं, जिन्होंने व्यंग्य के भविष्य को लेकर आश्वस्त किया है। व्यंग्य का पाठक वर्ग निरंतर बढ़ रहा है और अनेक युवा लेखक इस विधा में गंभीर योगदान दे रहे हैं। इनमें से कुछ की लेखनी में वह धार है जो व्यंग्य के सरोवर को निरंतर लबालब बनाये रख सकती है। महिला व्यंग्यकारों की उल्लेखनीय सक्रियता भी इस समय विशेष ध्यान खींच रही है, जो विधा के विस्तार और विविधता को समृद्ध करती है।

व्यंग्य की प्रचुरता से कुछ प्रश्न ज़रूर उत्पन्न होते हैं। क्या इतनी बड़ी संख्या में लिखा जा रहा व्यंग्य वास्तव में व्यंग्य की मानक कसौटियों पर खरा उतर रहा है या मात्र संख्यात्मक वृद्धि कर रहा है? दूसरा बड़ा प्रश्न यह है कि व्यंग्य की मानक कसौटियाँ आखिर क्या हैं? क्या परसाई के समय की कसौटियाँ ही आज भी प्रासंगिक हैं, या समय के अनुरूप उनमें परिवर्तन आवश्यक है? इस संदर्भ में प्रख्यात व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी के वक्तव्य का उल्लेख किया जा सकता है जो उन्होंने पिलकेंद्र अरोड़ा के व्यंग्य संग्रह ‘साहित्य के अब्दुल्ला’ के विमोचन के अवसर पर दिया था – “आज व्यंग्यकारों के समक्ष चुनौतियाँ बड़ी हैं। व्यंग्य परसाई जी के जमाने का न होकर बदल गया है। आज समय विकट है, इसलिए परसाई जी के अस्त्रों से आज नहीं लड़ा जा सकता। आपको व्यंग्य के लिए नये हथियार खोजने होंगे।” इस वक्तव्य को लेकर बहुत विवाद हुआ था यद्यपि वक्तव्य में विवाद की कोई गुंजाइश नहीं थी, फिर भी कुछ लोगों ने इसे परसाई को कमतर आँकने का या अप्रासंगिक सिद्ध करने का प्रयास समझा।

नये उपकरणों की ज़रूरत

वास्तव में, समय के साथ परिस्थितियाँ और विषय बदलते हैं, और यह परिवर्तन ही विकास की दिशा तय करता है। यदि ऐसा नहीं होता तो, न नई खोजें संभव होतीं, न नये आविष्कार होते और न ही जीवन-शैली में सुधार आता। परसाई के समय में सोशल मीडिया, बाज़ारवाद और इतना गहन वैश्विक संपर्क नहीं था जितना आज है। वर्तमान समय, अपनी नयी विसंगतियों के साथ सामने खड़ा है। आपकी निजी जानकारी किसी भी व्यक्ति द्वारा आसानी से चुरायी जा सकती है, दुनिया के किसी कोने में बैठकर कोई ठग आपका पूरा बैंक बैलेंस खाली कर सकता है, आपको विश्वास में लेकर सोशल मीडिया पर बना कोई मित्र आपसे अंतरंग फोटो शेयर कर आपको ब्लैकमेल कर सकता है, ऑनलाइन गेमिंग के ज़रिये बच्चों को जुए जैसी लत लगायी जा सकती है, या फिर कोई साइबर अपराधी आपको सरकारी अधिकारी बनकर डिजिटल अरेस्ट कर आपसे मनचाहे काम करवा सकता है। ये नये समय की कुछ ऐसी नयी विसंगतियाँ हैं, जिनसे वर्तमान समाज जूझ रहा है। इन नयी परिस्थितियों में यदि पारंपरिक उपकरणों के अतिरिक्त नये उपकरणों की आवश्यकता महसूस होती है, तो यह समय की माँग है। इन विसंगतियों पर लिखने के लिए यदि पारंपरिक टूल्स के अलावा नये टूल्स की आवश्यकता महसूस होती है तो उन पर काम होना चाहिए।

क्रिकेट के उदाहरण से इसे ज़्यादा स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं। टेस्ट क्रिकेट के बहुत से स्ट्रोक टी-20 तक आते-आते बेमानी हो गये। आज कोई बल्लेबाज़ लेग ग्लांस नहीं खेलता और न ही पहले किसी बल्लेबाज़ को हेलीकॉप्टर शॉट या रिवर्स स्वीप खेलते देखा गया था। आज यदि नये प्रकार के उपकरणों की ज़रूरत महसूस हो रही है तो इसमें आपत्तिजनक या अस्वीकार्य करने जैसा कुछ भी नहीं है। समय की माँग के अनुसार व्यंग्य को नये उपकरणों से सज्जित करना साहित्यिक ज़िम्मेदारी है। यह परसाई की महत्ता को कम नहीं करता बल्कि व्यंग्य को यथार्थ से जोड़ता है। परसाई व्यंग्य के शलाका पुरुष हैं, जब भी व्यंग्य की चर्चा होगी, परसाई का नाम प्रथम पूज्य की तरह लिया जाता रहेगा।

सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उससे उपजी नई विसंगतियों ने व्यंग्य के लक्ष्यों और उनकी प्राप्ति के तरीक़ों में उल्लेखनीय बदलाव ला दिया है। पारंपरिक उपकरण, जैसे आइरनी, उलटबांसी (पैराडॉक्स), अतिशयोक्ति, उपहास, कटाक्ष, फैंटेसी, संकेतात्मकता, विनोद और हास्य, नयी जटिलताओं को सम्यक रूप से अभिव्यक्त करने में अपर्याप्त जान पड़ते हैं। इन उपकरणों से डिजिटल युग की उन मानसिक ग्रंथियों और आभासी दुविधाओं को पूरी तीव्रता और सटीकता से नहीं पकड़ा जा सकता, जिनका समाज आज सामना कर रहा है। परिणामस्वरूप, व्यंग्य की उद्देश्यपरकता और उसकी मारक क्षमता पर भी आँच आने की आशंका है।

नये औज़ारों के उदाहरण

आज की पीढ़ी ‘डिजिटल अरेस्ट’, ‘ऑनलाइन गेमिंग’ और ‘रील बनाम रियल लाइफ’ के मायाजाल में उलझकर वास्तविकता की ज़मीन से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में व्यंग्य को उसके मर्म तक पहुँचाने के लिए नए औज़ारों की तलाश ज़रूरी हो गयी है, ऐसे औज़ार जो आदर्श और यथार्थ के टकराव को अधिक प्रभावी ढंग से उजागर कर सकें। हमें सोचना होगा कि क्या आम मान्यताओं और पारंपरिक भूमिकाओं को पलटकर प्रस्तुत करने अथवा आदर्श व यथार्थ के मध्य पसरी विडंबनाओं की विवेचना में “भूमिका-परिवर्तन” (रोल रिवर्सल) या “व्यंग्य-विरोधाभास” (सैटायरिक कंट्रास्ट) जैसे उपकरण कारगर हो सकते हैं? क्या ये उपकरण नयी पीढ़ी के मनोविज्ञान को स्पर्श कर सकते हैं? मेरा मानना है कि निश्चित रूप से ऐसा कर सकते हैं।

रोल रिवर्सल दरअसल एक ऐसी प्रभावशाली युक्ति है, जिसमें पारंपरिक भूमिकाओं को उलट कर प्रस्तुत किया जाता है, ताकि समाज में व्याप्त विसंगतियाँ, अन्याय और जड़ मान्यताएँ उजागर हो सकें। इसमें किसी पात्र, वर्ग, संस्था या उसकी भूमिका को उसके विपरीत संदर्भ में रखकर देखना होता है, जिससे मंशा, कमियों और दूषित मानसिकता के साथ ही सामाजिक व्यवहारों की अलक्षित विडंबनाएँ भी स्पष्ट आकार लेने लगती हैं। उदाहरण के लिए, यदि स्त्री-पुरुष की पारंपरिक भूमिकाएँ बदल दी जाएँ- जैसे पुरुष घरेलू काम करें और महिलाएँ कार्यालयों में नेतृत्व संभालें, तो यह लिंग आधारित पूर्वाग्रहों को चुनौती देने वाली दृष्टि विकसित करेगा। एक नेता को आम आदमी की स्थिति में रखा जाये, जो महंगाई, भ्रष्टाचार और अफसरशाही से परेशान हो तो सत्ता की दोहरी मानसिकता और असंवेदनशीलता को समझने में आसानी होगी। रोल रिवर्सल एक ऐसा उपकरण है, जो व्यंग्य को तीव्रता और गहराई प्रदान करता है। डिजिटल युग में, जब सामाजिक भूमिकाओं में लगातार भ्रम और असंतुलन उभर रहे हैं, यह युक्ति अधिक प्रासंगिक व प्रभावशाली हो सकती है।

सैटायरिक कंट्रास्ट भी वर्तमान की जटिल परिस्थितियों में व्यंग्य का एक अत्यंत प्रभावी उपकरण सिद्ध हो सकता है। ख़ासकर तब, जब वास्तविकता और आदर्श, कथन और कर्म तथा प्रतिष्ठा और आचरण के बीच मौजूद विरोधाभास को सामने लाना हो। इस कंट्रास्ट से हास्य, विडंबना और आलोचना का वातावरण बनेगा। इस उपकरण से सोशल मीडिया में व्याप्त कमियों, चालाकियों, अन्याय, दोगलेपन और धोखाधड़ी की सार्थक पड़ताल कर सकते हैं। यह उपकरण व्यंग्य को सिर्फ दिशाबोध कराने वाला नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक साहित्यिक हस्तक्षेप बना सकता है। यह उपकरण नया नहीं है लेकिन इसका प्रयोग अब तक सीमित रूप से ही हुआ है। परसाई जी ने ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ में गणतंत्र की गरिमा और आम आदमी की दुर्दशा के बीच सैटायरिक कंट्रास्ट से ही तीखा व्यंग्य रचा है।

आज जब सोशल मीडिया पर ‘इन्फ्लुएंसर’ आत्मनिर्भरता का संदेश देते हुए ब्रांडेड स्पॉन्सरशिप में उलझे होते हैं, या ‘फ़ैक्ट-चेकिंग संस्थाएँ’ स्वयं भ्रामक सूचनाओं का हिस्सा बन जाती हैं, तब सैटायरिक कंट्रास्ट व्यंग्य की सशक्त प्रस्तुति का उपकरण हो सकता है।
नये उपकरणों की आवश्यकता के इस विमर्श में व्यंग्य समालोचकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे इस बदलते दौर में व्यंग्य के स्वरूप, उसकी शैलीगत चुनौतियों और उपकरणों की प्रभावशीलता पर गंभीरता से विचार करें। व्यंग्य की सतत प्रासंगिकता और साहित्यिक गरिमा को बनाये रखने के लिए यह चिंतन आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *