नसीम बानो, naseem bano
नियमित ब्लॉग मिथलेश राय की कलम से....

हिन्दी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार

            बड़का जी ऐसे आदमी थे, जिन्हें कॉलोनी का बड़ा बूढ़ा बच्चा सभी बड़का जी कहता था। तबीयत के भी बड़े यार आदमी थे। जिसके साथ बैठ जाते, उन्हीं की तरह दिखायी देने लगते। उन्हें दुनिया भर के सारे काम आते थे, खाना बनाना, स्वेटर बुनना, कपड़े सिलना खेती किसानी, गाय दुहना… सब आता था। उन्होंने हमें राजेश खन्ना की ‘बावर्ची’ फ़िल्म दिखायी थी। असल में मुझे सिखाना चाहते थे कि केवल सूट बूट पहने हुए लोग नहीं, बल्कि मेहनत मजूरी और छोटे मोटे काम करने वालों में बहुत से ऐसे भी लोग भी होते हैं, जिनमें मनुष्य होने के सारे गुण मिलते हैं।

उनके साथ मेरी ख़ूब बैठक होती, वे बताते फ़िल्में देखने का शौक़ उन्हें बहुत पहले से था। उन्हें फ़िल्में देखने की आदत उनके गुरु ने लगायी थी। वे कहते, मैं बिल्कुल तुम्हारी ही उम्र का रहा होऊंगा उन्हीं दिनों एक कलाकार से मेरी मुलाक़ात हो गयी। उसके साथ मिलकर मैंने कुछ नाटक भी किये, लेकिन बाद वह एक रोज़ ऐसे ग़ायब हुआ कि फिर नहीं मिला। लेकिन अपने जाने के पहले उसने मेरे देखने, सोचने के नज़रिये को बिल्कुल बदलकर रख दिया था…

आगे बड़का जी ने कहा- मैं देहाती तो था, सिनेमा के बारे में मेरी बहुत ग़लत समझ थी, मैंने अपने बड़ों से सिनेमा के बारे में ख़ूब उल्टा सीधा सुन रखा था, वैसे इसमें कुछ ग़लत भी नहीं था। फ़िल्मों में आज की तरह अभिनेत्रियां नहीं होती थीं सिनेमा जब शुरू हुआ तो इसके प्रारंभिक दौर में बहुत सी अभिनेत्री तवायफ़ घरानों से आयी थीं। थोड़ा सा झिझकते हुए मैंने कहा, क्या बोल रहे हैं बड़का जी? वे बोले, सच बोल रहा हूं भाई, इसमें ग़लत क्या है। दरअसल संगीत, सुर लय ताल, अभिनय आदि की जानकार महिला कलाकार को तब तवायफ़ के नाम से जाना जाता था। उन दिनों कई ऐसी तवायफ़ें थीं, जिनको कई भाषाएं आती थीं। संगीत के जानकारों में उनका अच्छा ख़ासा रुतबा था। अच्छा, भला बताओ सायरा बानो कौन है? हीरोइन है, मैंने कहा। तो बोले, कहां से आई? मैंने फिर कहा, होगी किसी अच्छे कुल खानदान से… बच्चू है तो वह अच्छे ख़ानदान से ही पर ख़ानदान की जो परिभाषा तुम पढ़ रखे हो, उससे अलग ख़ानदान की है वह। -वो कैसे?

बताता हूं, थोड़ा बस कुकर उतार के रख दूं… हूंह तो सायरा बानो की मां थी नसीम बानो, बला की ख़ूबसूरत थी और हुनरमंद भी। जितनी रूप से सुन्दर उतना ही दिल, दिमाग़ से भी। नसीम बानो की मां शमशाद बेगम दिल्ली की मशहूर तवायफ़ थीं। नसीमा को संगीत का माहौल बचपन से ही मिल गया था, लेकिन उसकी मां उसे डॉक्टर बनाना चाहती थी। उसने नसीम का दाख़िला अच्छे स्कूल में कराया था, पर व्यक्ति की क़िस्मत उसे कहां ले जाएगी, वह नहीं जानता। नसीम के साथ भी यही हुआ, वह अपनी मां के साथ एक बार बॉम्बे आयी और सोहराब मोदी से मिलना हुआ। और शुरू हो गया फ़िल्मी सफ़र। नसीम की फ़िल्म शीशमहल मैंने अपने गुरु के साथ देखी थी। फ़िल्म में जागीरदारी सोच पर एक चोट है। इस फ़िल्म में नसीमा सोहराब मोदी (जागीरदार) की छोटी बेटी है जिसकी शादी जागीरदार किसी कुलीन ख़ानदान में करना चाहता है। पर परिस्थितियां उसके अनुकूल नहीं रहतीं और उसकी लड़की साहूकार के लड़के से शादी कर लेती है। जानकर जागीरदार सीढ़ियों से गिर कर मर जाता है, किंतु मरते मरते बेटी का हाथ साहूकार के लड़के के हाथ में दे जाता है।

नसीम बानो, naseem bano

अब तक बड़का जी का खाना बनकर तैयार हो चुका है। अब वे नहाने जाने की तैयारी कर रहे हैं। साथ में बोलते भी जा रहे हैं। उन्होंने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा, मेरा गुरु कमाल का नाट्यकर्मी था, वह जहां जाता सबसे पहले शेक्सपियर का नाटक “हेमलेट” ज़रूर खेलता। नसीमा का वह इसलिए भी एक बड़ा प्रशंसक था कि नसीमा ने सोहराब मोदी की फ़िल्म “ख़ून का ख़ून” जो हेमलेट का ही रूपांतरण थी, उसमें ओफेलिया की भूमिका निभायी थी। नसीम लंबी, सुडौल और आर्कषक तो थी ही, साथ ही उसका रहन सहन भी बहुत अलग था। अपनी बातचीत, लहजे और बॉब कट हेयर स्टाइल से वह स्वीडिश हीरोइन की तरह दिखती थी।

बाद में मैंने नसीम की कई फ़िल्में देखी थीं, तलाक, खान बहादुर, मीठा जहर… नसीमा ने केवल अभिनेत्री के तौर पर काम ही नहीं किया, उसने फिल्में भी बनायीं। अपने बच्चों को उसने इंग्लैंड में रखकर पढ़ाया। अपने बाद के वर्षों में नसीमा ने फ़ैशन डिज़ाइनिंग का काम शुरू किया। सायरा बानो को फ़िल्मों में लाने से लेकर उसके जीवन को संवारने में नसीम का बहुत हाथ था। सायरा बानो को जिन नये तरह के कपड़ों का चलन शुरू करने के लिए जाना जाता है ना, उनकी डिज़ाइनिंग नसीम ने ही की।

हिन्दी सिनेमा की पहली महिला सुपर स्टार अभिनेत्री नसीम अपने जीवन में तमाम विवादों और घटनाओं के लिए जानी जाती रही, फिर भी अभिनय की जिन ऊंचाइयों को नसीम ने हासिल किया, वह कुछ चुनिंदा हीरोइनों के ही नाम है। नसीम के फ़िल्मों के कई गाने मुझे याद थे, “जिंदगी का साज़ भी क्या साज़ है”, “नज़र मिल गयी जाने किसकी नज़र मिल गयी”… इस तरह क़िस्सा पूरा होते ही बड़का जी इन्हीं गानों को गुनगुनाते हुए नहाने चल दिये और मैंने भी उनसे विदा ली।

मिथलेश रॉय, mithlesh roy

मिथलेश रॉय

पेशे से शिक्षक, प्रवृत्ति से कवि, लेखक मिथिलेश रॉय पांच साझा कविता संग्रहों में संकलित हैं और चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित। 'साहित्य की बात' मंच, विदिशा से श्रीमती गायत्री देवी अग्रवाल पुरस्कार 2024 से सम्मानित। साथ ही, साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका "वनप्रिया" के संपादक।

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