पाक्षिक ब्लॉग राजा अवस्थी की कलम से....

मनुष्यता के लिए बेचैन नवगीत-कवि कौशलेन्द्र सिंह

       कवि को समकालीन होने के लिए उसके अपने समय के प्रति गहरी संवेदनशीलता की दरकार होती है। यही संवेदनशीलता उसे अपने समय की असंगतियों-विसंगतियों, विषमताओं, बढ़ते शोषण, अनाचार, भ्रष्टाचार, छद्म, पाखण्ड आदि के प्रति बेचैन बनाती है। यही संवेदनशीलता उसे इनसे उबरने के सकारात्मक प्रयास के लिए रचनात्मक बनाती है। उसकी यही रचनात्मकता किसी कविता, चित्र अथवा किसी कला के रूप में सामने आती है। 20 जनवरी 2048 को ढेमा, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे नवगीत कवि कौशलेन्द्र सिंह को पढ़ते हुए हमें उनके भीतर की इसी बेचैनी से बार-बार और लगातार दो-चार होना पड़ता है। कौशलेंद्र सिंह जवाहरलाल नेहरू इन्टर कालेज इलाहाबाद में प्रधानाचार्य रहते हुए सेवानिवृत्त हुए थे। दुर्भाग्यवश 08 मई 2021 को उनका निधन हो गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से 2016 के विजयदेवनारायण साही पुरस्कार से सम्मानित कवि कौशलेंद्र जी की दिन ढले, हरे पात पियराये, आँगन में विष बेल और काँपते जल काव्य कृतियांँ प्रकाशित हैं।

मनुष्य अपने समय में कई तरह की समस्याओं से जूझता है। जहाँ एक ओर वह रोजगार के लिए जूझता है, तो दूसरी और परिवार का पालन-पोषण, बच्चों की शिक्षा, बुजुर्गों की देखभाल, पारिवारिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों का निर्वाह और इन सबके मूल में उसकी आर्थिक स्थिति की सुदृढ़ता या दुर्बलता से संघर्ष होता है। किसी व्यक्ति, समाज और देश की आर्थिक स्थिति, विकास आदि के लिए चुने गए पहरुए, शासन-तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष और उसका भोक्ता होना भी उस मनुष्य के जीवन से जुड़ा होता है। ऐसे में उसके भीतर संस्कृति और समाज तथा मनुष्य की दशा के प्रति जो भाव पलता-पनपता है, उस भाव की समझ और पड़ताल भी उसकी समकालीनता का ही हिस्सा होती है। कौशलेन्द्र जी की नवगीत-कविताओं में भी हम समकालीनता के इसी रूप को पाते हैं।

कौशलेन्द्र जी की काव्यजगत में सक्रियता आठवें दशक से शुरु होती है और वे पूरे पाँच दशक से भी अधिक समय, अपने अन्तिम समय 2021 तक रचनारत रहे। 1970 से लेकर 2021 तक की कालावधि को देखें तो यह वह समय है जब भारतीय मानुष का विश्वास अपने राजनेताओं से पूरी तरह उठ चुका है।देश ने आपातकाल और मंडल-कमंडल, मंदिर – मस्जिद और धर्म के नाम पर सत्ता – परिवर्तन देखा। लेकिन आम आदमी की स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया। बड़े-बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार ने बड़े-बड़े कद्दावर नेताओं तक को नंगा कर दिया है। बावजूद इसके इनकी बेशर्मी का स्तर बढ़ता ही गया है। इन सारी स्थितियों के बीच मनुष्य के भीतर बढ़ती बेलगाम भौतिक-आकांक्षाओं का दबाव और इन दबावों के बीच टूटते – बिखरते आपसी संबंध, पारिवारिक रिश्ते, दायित्वों से मुँह चुराता मनुष्य शेष रह गया है। कौशलेन्द्र जी की नवगीत – कविताओं के केन्द्र में यही टूटता-बिखरता हुआ मनुष्य है। उसके दरक रहे रिश्ते हैं और उन्हें बचाने की आकांक्षा है। अपनी एक नवगीत-कविता ‘अपना-अपना अदहन’ में वे अपनी इस चिन्ता को इस तरह कहते हैं:

“आँगन में दीवार खड़ी है /अम्मा टूटी खाट पड़ी है। छोटका चार टके का नौकर /छोटके की हर बात बड़ी है। अपना-अपना उबले अदहन/चौके-चौके चलती अनबन/रिश्तों के पुल टूट चुके हैं /अब कैसे उतरूँ /इन कच्ची डालों पर कैसे फूलूँ और फलूँ।” इन पंक्तियों से जो चित्र उभरता है, वह भारतीय समाज के आधार ‘संयुक्त परिवार’ के बिखरने का यथार्थ हमारे सामने ला देता है। रिश्तों के टूटे पुलों पर से विकास और सुख-चैन के घाट पर कैसे उतरा जाए? यही कवि की बेचैनी है।

कौशलेन्द्र जी के तीन नवगीत – कविता संग्रह ‘आँगन में विष बेल’, ‘दिन ढले’ और ‘हरे पात पियरायें’ प्रकाशित हुए हैं। इन नवगीत – कविता संग्रहों के शीर्षक बहुत प्रतीकात्मक हैं और हमारे घर-परिवार से लेकर वृहत्तर समाज और पूरी व्यवस्था के चरित्र और उपलब्धियों – नाउम्मीदियों के हाल कह रहे हैं। इन स्थितियों को कहने-दिखाने के लिए कौशलेन्द्र जी लट्ठमार भाषा का इस्तेमाल नहीं करते। दरअसल वे रोने-रिरियाने अथवा समस्याओं का ठीकरा किसी और पर फोड़कर मुक्त हो जाने वाले कवि नहीं हैं। लेकिन एक बेचैनी है, जिसे कहना वे अपना धर्म समझते हैं और कहते भी हैं। मनुष्य का पूरा दिन साँस – साँस हाड़-तोड़ मेहनत करते हुए बीतता है, तब कहीं शाम को कुछ चमक चेहरे पर आती है, किन्तु वह चमक ऐसी नहीं कि अगली सुबह तक भी ठहर सके। भिनसारे ही फिर उसी कोल्हू में जुत जाना होता है। यह हालत पूरे देश में केवल मजदूर की ही नहीं है, बल्कि उस किसान की भी है, जो सिर्फ कहने के लिए किसान है! दरअसल वह भी मजदूर ही है। कभी अपने ही खेत में खटता है! नहीं तो किसी और के खेत में! इस विकराल स्थिति को कौशलेन्द्र जी का कवि इस तरह कहता है, कि एक अंतरे में ही पूरा परिदृश्य उभर आता है। देखें:

“साँसों से दिन भर बतियाती
गंध पसीने की
खुशियाँ लेकर शामें आतीं
दुख बोते भिनसार
हाड़-तोड़ इस धंधे में कब
होता है इतवार
मेहनत की रोटी पाती
गंध पसीने की।”
(‘हरे पात पियराये ‘ से)

कौशलेन्द्र जी ऐसा भी लिखते हैं, जिसमें अथाह करुणा बहती है। दीनता बहती है। यद्यपि जरूरत तो जीवटता और जुझारूपन की है, किन्तु अधिसंख्य मजदूर – किसान इसी करुणा, उदासी, नैराश्य और असहायता के भाव से दबा जीता है। उसके सारे सपने किसी अंधकार में दबे हुए हैं। यही यथार्थ है और इस यथार्थ को कौशलेन्द्र जी ‘दिन ढले’ संग्रह के गीत ‘हठीली धूप’ में इस तरह कहते हैं:

“साँझ हुई फिर लगी सरकने /दूर हठीली धूप
हारे-थके बटोही लौटे /सूनी राह पड़ी
सारी फसल अँधेरा ओढ़े /आँखें सपन जड़ी
चाह रहा मन बड़ी देर से /फिर चमकीली धूप
एड़ी से चोटी तक अपना/घने अँधेरे में
उड़ने को फड़फड़ा रहे हम /रैन बसेरे में
रुँधे गले में फँसी टेर-सी /धुँधली-पीली धूप”

हमारी व्यवस्था में आजादी तो आ गई, किन्तु यह आजादी किसके लिए है? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। सवाल यही अकेला नहीं है! सवाल तो अनगिन हैं; क्योंकि, गाँव – गली और गलियों में बसे आम आदमी की प्यास की फिक्र उसने नहीं की, जिसे करना था। सामंती आचरण ही राष्ट्रीय आचरण घोषित हो रहे हैं। यही सामंती प्रवृत्ति मनुष्य को मनुष्य नहीं समझती। वह स्वयं को मालिक और आमजन को गुलाम ही समझती है। हर पड़ाव पर इस महादेश का मनुष्य संभावना के आसरे पर रहता है, किन्तु हर बार हाथ खाली के खाली रह जाते हैं। देखें:

“पैरों ने काटी हैं बेड़ियाँ/ मन के बन्धन नहीं खुले
सामन्ती ओहदों का राष्ट्रीयकरण
काली करतूतों पर स्वच्छ आवरण
गंधहीन अंग्रेजी फूल गूँथकर
गाँधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण
सिंहासन पर इनकी पीढ़ियाँ
ढोती हैं यही सिलसिले।
एक प्रश्न के उत्तर में कई सवाल
कंधे पर /लटके हैं अब तक बैताल
डाल पर/ प्यासी पगडंडी का अंत नहीं है
हर पड़ाव पर/ अब तक फटे हाथ
सारी संभावना लिए फूले अब तक नहीं फले”

(‘दिन ढले’ संग्रह के ‘इनकी पीढ़ियाँ’ गीत से)

कौशलेन्द्र जी का कवि यह स्पष्ट देख पाता है कि मनुष्य सभी तरह के दबाव, निराशा, दीनता, विश्वास का टूटना सहने का आदी – सा हो गया है। उसकी इसी निराशा को वे इस तरह दिखाते हैं:

“बादल तुम बरसो ना बरसो
हम तो प्यासे रह लेते हैं
  जन्मों का मृगदाव जिया है
  आश्वासन से होठ सिया है
  जाने कितनी डाँट सहा है
  पत्थर से भी सख्त हिया है
  चाहे जितना गरजो – धमको
  हर दहाड़ अब सह लेते हैं”

(हरे पात पियराये)

इस देश के आम जन की नियति यही है। वह हर बार एक छलावा ही पाता है। किन्तु, उसकी जिजीविषा केवल सबकुछ सहकर जीते रहने में ही दिखाई पड़ती है और इसे ही वह उपलब्धि भी मान लेता है। इसी में निबाह भी करता है। देखें:

       “दिन सौ बार छलावा बोये
      आँखों में आशा ही ढोये
       भीतर-भीतर काँप उठा है
       पर जिजीविषा रहे सँजोये
       चाहे हर अवलम्ब हटा लो
       अपने आप निबाह लेते हैं। “

                          (हरे पात पियराये)

कौशलेन्द्र जी का कवि इस दृश्य को भी साफ देखता और इससे चिन्तित भी है कि जिन लोगों ने देश को एक प्रगतिपथ पर ले जाने का संकल्प लिया है। देश की, देश के मनुष्य की जीवन स्थिति को सुधारने का आश्वासन दिया है, वे ही एक भीड़ के नारों में खो चुके हैं। उनके चारों ओर चाटुकारों की लम्बी फौज जमा हो गई है। वह भी इन्ही सब में खुश है। जैसे यही उसका लक्ष्य रहा हो और यही उसका असली चेहरा हो। देशवासी यही सब देखने – भोगने को विवश हैं। इसीलिए वे लिखते हैं:

   “मैली हो गई उजली खादी
  झाड़-झटककर पहनी फिर भी
  उजली हो गई मैली खादी
  राजघाट से विजयघाट तक
  कहीं नहीं बूँद भर पानी
  रेत हो गई नदी प्यास की
  लिखकर अपनी अकथ कहानी
  चौराहों पर माला पहने
  मुँह लटकाए नेहरू-गांधी
  भाषण, भीड़, भड़ैती, भगदड़
  चौराहों पर रोज सभाएँ
  हाथ जोड़कर खड़े सभासद
  राजा-रानी के गुण गाए
  कल फिर यही जमात जुड़ेगी
  होती चारों ओर मुनादी। “

इस मोहभंग से उपजी निराशा और इस सब के बीच जीने की विवशता के बावज़ूद इन पर एक प्रश्न खड़ा करने से वे स्वयं को रोक नहीं पाते। बहुत परदे के साथ वे बार-बार इस पर प्रश्न उठाते हैं। किन्तु उनकी बेचैनी के केन्द्र में मनुष्य के आपसी रिश्तों में पड़ती-पनपती दरारें हैं। गाँव – घरों में अनपेक्षित बदलाव की घुसपैठ, भौतिक सुविधाओं के प्रति बढ़ता आकर्षण और आत्मीय संबंधों की कीमत पर भी इन्हें भोगने का चाह इनकी चिन्ता का बड़ा विषय है। कौशलेन्द्र जी की अधिकांश नवगीत – कवितायें इन्हीं चिन्ताओं को केन्द्र में रखती हैं। अपने ‘दिन ढले’ संग्रह के एक नवगीत ‘राग रंग की दुकान’ में वे वे लिखते हैं – “घर के बाहर ढोल मंजीरे /घर के भीतर कान /चूल्हे पर बटलोई जैसे /भोर चमकती है सिर पर/अदहन जैसे दिन भर खौले /अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर /आँतों की टेढ़ी यात्रा में /भटक गये मन प्राण /इस आँगन से राग रंग की /चली गई दुकान।”

यह कवि की ही नहीं परिवार को बचाए रखने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति की बेचैनी है, कि बाहर ढोल-मंजीरों के बीच भी उसका ध्यान और कान घर के भीतर चल-पल रही अनबन पर है। उसकी पीड़ा घर-परिवार से प्रसन्नता और आनन्द भरे रागात्मक संबन्धों के रंग उड़ जाने से पैदा हुई है। उसकी टूटन को कौशलेन्द्र जी एक पंक्ति में कह देते हैं – “हमने जिस पौधे को सींचा था/ उसमें अब काँटे उग आए।”

कौशलेन्द्र जी की नवगीत कविताओं में जिस तरह गाँव का, घर का आँगन, रसोई, खौलता अदहन बार-बार अपने प्रतीकात्मक और विविध व्यञ्जना वाले अर्थों में आते हैं, उसी तरह माँ और बच्चा भी बार-बार आते हैं। और इन जगहों पर कवि की रागात्मकता पूरी संवेदना और आत्मीय भाव से भरकर उभरती है। देखें:

“बच्चा घर में हँसता है /या रोता है /बच्चा हर क्षण /माँ की आँखों में होता है /आँखों में बच्चा बढ़ता है /सपनों की सीढ़ी चढ़ता है /बच्चा अपनी माँ के सपनों को ढोता है /बच्चा दीपक-सा दिखता है /आँचल में लुकता-छिपता है /बच्चा माँ के आँचल की अँगड़ाई होता है /बच्चा माँ की लम्बी उम्र संजोता है। “

बच्चे को लेकर कुछ नवगीतों में कौशलेन्द्र जी की व्यञ्जना बहुत मार्मिक हो उठती है। वे लिखते हैं -” गाँव के तालाब में बच्चे नहाते हैं /कद भर डूब जाते हैं /धरातल नहीं पाते हैं /यही बच्चे बँधे जल से खुले जल तक /एक मुट्ठी आत्मबल से बाहुबल तक /भँवर में फँसकर किनारे छूट जाते हैं /बच्चे छटपटाते हैं।” एक नवगीत में ‘माँ’ पर भी उनकी पंक्तियाँ देखने लायक हैं:

“चूल्हे की जलती रोटी-सी /तेज आँच में जलती माँ /भीतर-भीतर बलके लेकिन /बाहर नहीं उबलती माँ।”

इस बेचैन कवि के तीनों नवगीत संग्रहों को पढ़ते हुए हम उन नवगीत कविताओं में भीतर से उमगता हुआ अपूर्व उल्लास भी पाते हैं, जहाँ वे खेतों में पनपती, फलती, पकती फसल को एक किसान की दृष्टि से देखते हैं। उनके ‘पहला फूल’ शीर्षक नवगीत को देखते हैं। आप भी देखें – ” आज पहला फूल आया है /आँगने उमड़ी सुवासित गंध/बाँटती घर-घर हवा मकरंद/मन कहीं कुछ भूल आया है /आज पहला फूल आया है।” इसी तरह ‘बिहान’ नवगीत में उम्मीदों का जैसा चित्र रचते हैं, वह पाठक को भीतर तक संवेदित कर जाता है। पंक्तियाँ इस तरह हैं – “ताल भरे पुरइन /खेत भरे धान /देहरी से घरवाली /झाँकती बिहान /दूध भरे दाने हैं /कल तक गदराएँगे /अँजुरी भर पानी में /चंद्रमा उगाएँगे /आँखों का इन्द्रधनुष /घेरे मन प्राण।”

जब हम इस बेचैन कवि के विषय में और गहराई से देखते हैं, तो पाते हैं, कि वे जहाँ” गाँवों में ऋतु बदली है /शहराती हवा बहुत तेज चली है। “लिखते हैं, वहाँ ‘शहराती हवा’ में व्यञ्जना की कई-कई पर्तें हैं। यह शहरातीपन अजनबीपन भी है। निजी स्वार्थ की अति भी है। आत्मीय संबंधों का छीजना भी है। इसी लिए वे यह भी कहते हैं, कि – “यहाँ साँसें घुट रही हैं /अब वहाँ हो लें/आइने में एक मोटे धुन्ध का परदा पड़ा है /अँधेरे में नहीं दिखता /द्वार पर आगत खड़ा है /बंद दरवाजे मन की खिड़कियाँ खोलें /परिचितों के बीच ढोते अजनबीपन को /किस तरह चीरें कुण्ठाओं भरे मन को /जोर देकर भरे बोझिल क्षण धकेलें। ” वे कहते हैं -” कोई जतन करो /बस्ती का यह मौसम बदले /मन के आँगन नागफनी का फूल फूलता है /शंका का बैताल डाल पर टँगा झूलता है /कोई जतन करो /पछुआ भी शीतल हवा झले।”

इस तरह कौशलेन्द्र जी की नवगीत कविताओं में हम लगातार समाप्त होते आत्मीय बोध, रिश्तों के बीच से लुप्त होती रागात्मकता, आँगन ही नहीं दिलों के बीच भी उठती दीवारों, स्वार्थान्धता का शिकार होता मनुष्य और इस तरह मनुष्यता के ही छीजते जाने की चिन्ता बहुत गहन होकर उभरती है और हम मनुष्यता व आत्मीयता को लेकर एक बेचैन कवि के रूप में कौशलेन्द्र जी को पाते हैं।

राजा अवस्थी

राजा अवस्थी

सीएम राइज़ माॅडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटनी (म.प्र.) में अध्यापन के साथ कविता की विभिन्न विधाओं जैसे नवगीत, दोहा आदि के साथ कहानी, निबंध, आलोचना लेखन में सक्रिय। अब तक नवगीत कविता के दो संग्रह प्रकाशित। साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित 'समकालीन नवगीत संचयन' के साथ सभी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय समवेत नवगीत संकलनों में नवगीत संकलित। पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, दोहे, कहानी, समीक्षा प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्र जबलपुर और दूरदर्शन केन्द्र भोपाल से कविताओं का प्रसारण।

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