पाक्षिक ब्लॉग ज़ाहिद ख़ान की कलम से....

‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा देने वाला शायर

       जंग-ए-आज़ादी में सबसे अव्वल ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का जोशीला नारा बुलंद करना और हिंदुस्तान की मुकम्मल आज़ादी की मांग, महज़ ये दो बातें ही मौलाना हसरत मोहानी की बावक़ार हस्ती को बयॉं करने के लिए काफ़ी हैं। वरना उनकी शख़्सियत से जुड़े ऐसे अनेक क़िस्से और हैरतअंगेज़ कारनामे हैं, जो उन्हें जंग-ए-आज़ादी के पूरे दौर और फिर आज़ाद हिंदोस्तां में उन्हें अज़ीम बनाते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा था, ‘‘मुस्लिम समाज के तीन रत्न हैं और मुझे लगता है कि इन तीनों में मोहानी साहब सबसे महान हैं।’’ मोहान कस्बे में पैदा होने की वजह से उनके नाम के पीछे मोहानी लग गया और बाद में ‘हसरत मोहानी’ के नाम से ही मशहूर हो गए। उन्नाव की डौडिया खेड़ा के राजा राव रामबख़्श सिंह की शहादत का उनके दिल—ओ—दिमाग़ पर ऐसा असर पड़ा कि वे छात्र जीवन से ही आज़ादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे।

मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी ज़िंदगी की शुरूआत में ही पत्रकारिता और क़लम की अहमियत को पहचान लिया था। साल 1903 में अलीगढ़ से उन्होंने एक सियासी-अदबी मैगज़ीन ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ निकाली। जिसमें अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों की कड़ी आलोचना की जाती थी। इस मैगज़ीन में हसरत मोहानी ने हमेशा आज़ादी—पसंदों के लेखों, इंक़लाबी शायरों की क्रांतिकारी ग़ज़लों-नज़्मों को तरजीह दी, जिसकी वजह से वे अंग्रेज़ सरकार की आंखों में खटकने लगे। साल 1907 में अपने एक मज़मून में मौलाना हसरत मोहानी ने सरकार की तीख़ी आलोचना कर दी। जिसके एवज़ में उन्हें जेल जाना पड़ा और सज़ा, दो साल क़ैद-ए-बा-मशक़्क़त ! जिसमें उनसे रोज़ाना एक मन गेहूँ पिसवाया जाता था। क़ैद के हालात में ही उन्होंने अपना यह मशहूर शे’र कहा था:

है मश्क़-ए-सुख़न जारी, चक्की की मशक़्क़त भी
इक तुर्फ़ा तमाशा है हसरत की तबीयत भी

मौलाना हसरत मोहानी ने इस दरमियान साल 1904 के आसपास भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मेंबरशिप भी ले ली। अब वे कांग्रेस की सरगर्मियों में हिस्सा लेने लगे। वैचारिक स्तर पर वे कांग्रेस के ‘गर्म दल’ के ज़्यादा क़रीब थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से उनका ज़्यादा लगाव था। कांग्रेस के ‘नर्म दल’ के लीडरों की नीतियों से वे रज़ामंद नहीं थे। वक़्त पड़ने पर वे इन नीतियों की कांग्रेस के मंच और अपनी मैगज़ीन ’उर्दू-ए-मुअल्ला’ में सख़्त नुक्ताचीनी भी करते। साल 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक कांग्रेस से जुदा हुए, तो वे भी उनके साथ अलग हो गए। यह बात अलग है कि बाद में वे फिर कांग्रेस के साथ हो लिए। साल 1921 में मौलाना हसरत मोहानी ने ना सिर्फ़ ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ नारा दिया, बल्कि अहमदाबाद में हुए कांग्रेस सम्मलेन में ’आज़ादी—ए—कामिल’ यानी पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव भी रखा। कांग्रेस की उस ऐतिहासिक बैठक में क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला ख़ॉं के साथ-साथ कई और क्रांतिकारी भी मौजूद थे। महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव को मानने से इंकार कर दिया। बावजूद इसके हसरत मोहानी ‘पूर्ण स्वराज्य’ का नारा बुलंद करते रहे और आख़िरकार यह प्रस्ताव, साल 1929 में पारित भी हुआ। भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद समेत तमाम क्रांतिकारियों ने आगे चलकर मौलाना हसरत मोहानी के नारे ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ की अहमियत समझी और देखते-देखते यह नारा आज़ादी की लड़ाई में मक़बूल हो गया। एक समय आलम यह था कि देश भर में बच्चे-बच्चे की ज़बान पर यह नारा था। इस बात का भी बहुत कम लोगों को इल्म होगा कि महात्मा गांधी को स्वदेशी आंदोलन की राह मौलाना हसरत मोहानी ने ही सुझाई थी। ख़ुद उन्होंने इसका ख़ूब प्रचार-प्रसार किया। यहॉं तक कि एक खद्दर भण्डार भी खोला, जो कि बहुत मक़बूल हुआ था।

इस दरमियान अपनी क्रांतिकारी और साहसिक सरगर्मियों के लिए मौलाना हसरत मोहानी दो बार साल 1914 और 1922 में भी जेल गए। लेकिन उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया। वे जेल से वापस आते और फिर उसी जोश और जज़्बे से अपने काम में लग जाते। अंग्रेज़ हुकूमत का कोई ज़ोर-ज़ुल्म उन पर असर नहीं डाल पाता था। साल 1925 में मौलाना हसरत मोहानी का झुकाव कम्युनिज़्म की तरफ़ हो गया। यहॉं तक कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के पहले सम्मेलन की नींव उन्होंने ही रखी। साल 1926 में कानपुर में हुई पहली ‘कम्युनिस्ट कॉफ्रेंस’ में मौलाना हसरत मोहानी ने ही स्वागत भाषण पढ़ा। जिसमें उन्होंने पूर्ण आज़ादी, सोवियत रिपब्लिक की तर्ज़ पर स्वराज की स्थापना और स्वराज स्थापित होने तक काश्तकारों और मज़दूरों के कल्याण और भलाई पर ज़ोर दिया। साल 1936 में जब लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कॉन्फ्रेंस हुई, तो मौलाना हसरत मोहानी सिर्फ़ एक दावत—नामे पर बिना किसी औपचारिकता के कानपुर से इस कान्फ्रेंस में हिस्सा लेने लखनऊ पहुंच गए। अपनी तक़रीर में ना सिर्फ़ उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र और इसके मक़सद से रज़ामंदी ज़ाहिर की, बल्कि इस बात भी ज़ोर दिया कि ‘‘अदब में आज़ादी की तहरीक की अक्कासी होनी चाहिए। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े लेखकों को मज़दूरों, किसानों और तमाम पीड़ित इंसानों की पक्षधरता करना चाहिए। लेखक को ज़िंदगी के ज़्यादा महत्वपूर्ण और गंभीर मसलों की तरफ ध्यान देना चाहिए।’’

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हसरत मोहानी के नाम के आगे भले ही मौलाना लगा रहा, लेकिन उनकी विचारधारा क्या थी? यह उन्होंने ख़ुद अपने एक मशहूर शे’र में बतलाया है:

दरवेशी—ओ—इंक़लाब है मस्लक मेरा
सूफ़ी मोमिन हूँ, इश्तिराकी मुस्लिम

मौलाना हसरत मोहानी के व्यक्तित्व में कई विरोधाभास थे। एक तरफ़ वे ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ की क़ायमगी में पेश-पेश रहे, तो दूसरी ओर ‘आल इंडिया मुस्लिम लीग’ और ‘जमीअत उलेमा—ए—हिंद’ के भी संस्थापक सदस्य रहे। यहॉं तक कि मुस्लिम लीग के एक अधिवेशन की अध्यक्षता की और आज़ादी से पहले मुस्लिम लीग के टिकट पर असेंबली चुनाव भी जीते। ‘मुस्लिम लीग’ में रहे, लेकिन उसके द्वि—राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया। यहॉं तक कि पाकिस्तान बनने के विरोध में खड़े हो गए और जब बंटवारा हुआ, पाकिस्तान जाने से साफ़ मना कर दिया। पांचों वक़्त के नमाज़ी-परहेज़गार थे, मगर भगवान कृष्ण के भी मुरीद थे। कृष्ण की तारीफ़ में उन्होंने अपनी नज़्म में लिखा:

मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भरती है आरज़ू इसी का
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का।

मौलाना हसरत मोहानी, हिंदुस्तानी तहज़ीब के एक बड़े और सच्चे मुहाफ़िज़ थे। रंगों के पर्व ‘होली’ पर भी उनकी एक नज़्म है। जिसमें वे कृष्ण भक्ति में लिखते हैं:

मोहे छेड़ करत नंद लाल
लिए ठाड़े अबीर गुलाल।

मौलाना हसरत मोहानी, फ़ारसी और अरबी ज़बान के बड़े विद्वान थे। उनका अध्ययन भी बड़ा व्यापक था। उन्होंने अपने पूर्वज शायरों को ख़ूब पढ़ा और उनसे फ़ायदा भी उठाया। इस बात का ज़िक्र उन्होंने ख़ुद अपने एक शे’र में किया है:

ग़ालिब-ओ-मुसहफ़ी-ओ-मीर-ओ-नसीम-ओ-मोमिन
तबा-ए-‘हसरत’ ने उठाया है हर उस्ताद से फ़ैज़

लेकिन इसके ये मायने नहीं हैं कि मौलाना हसरत मोहानी की ख़ुद की कोई पहचान नहीं थी। उनके कलाम में अपना ही एक रंग है, जो सबसे जुदा है। हुस्न-ओ-इश्क़ में डूबी उनकी ग़ज़लें, हमें एक अलग हसरत मोहानी का तआरुफ़ कराती हैं। मिसाल के तौर पर उनकी ग़ज़लों के कुछ अश्आर देखिए:

न सूरत कहीं शादमानी की देखी
बहुत सैर दुनिया-ए-फ़ानी की देखी।

दिल को ख़याल-ए-यार ने मख़मूर कर दिया
साग़र को रंग-ए-बादा ने पुर-नूर कर दिया।

मौलाना हसरत मोहानी की ऐसी और भी कई ग़ज़लें हैं, जो आज भी बेहद मक़बूल हैं। ख़ास तौर पर ‘‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है’’ तो जैसे उनकी पहचान है। ग़ज़ल को दोबारा ज़िंदगी बख़्शने वाले और ग़ज़ल की आलीशान इमारत के पॉंच सुतून फ़ानी बदायूनी, असगर गोंडवी, फ़िराक़ गोरखपुरी और जिगर मुरादाबादी के साथ हसरत मोहानी भी एक अहम स्तंभ माने जाते हैं। मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी ज़िंदगानी में तेरह दीवान संकलित किए और हर दीवान पर ख़ुद ही प्रस्तावना लिखी। उनके अशआर की तादाद भी तक़रीबन सात हज़ार है। जिनमें से आधे से ज़्यादा उन्होंने जेल की क़ैद में लिखे हैं।

मौलाना हसरत मोहानी को किसी भी तरह की औपचारिकता, बनावट और पाखंडपूर्ण बर्ताव से नफ़रत थी। किसी भी बात की परवाह किए बिना, वे सच कहने से नहीं हिचकिचाते थे। एक बार जो फ़ैसला उन्होंने कर लिया, वे उस पर आख़िर तक अटल रहते थे। आज़ादी के बाद भी वे लगातार मुल्क की ख़िदमत करते रहे। संविधान बनाने वाली कमेटी में मौलाना हसरत मोहानी शामिल थे। संविधान सभा के मेंबर और संसद सदस्य रहते, उन्होंने कभी वीआईपी सहूलियतें नहीं लीं। यहॉं तक कि वे संसद से तनख़्वाह या कोई भी सरकारी सहूलियत नहीं लेते थे। सादगी इस क़दर कि ट्रेन के थर्ड क्लास और शहर के अंदर तॉंगे पर सफ़र करते थे। छोटा सा मकान उनका आशियाना था। दिल्ली में जब भी संविधान सभा की बैठक में आते, तो एक मस्जिद में उनका क़याम होता। मौलाना हसरत मोहानी की ज़िंदगानी से जुड़ा एक और दिलचस्प वाक़िया है, जो उनके उसूल—पसंद होने को दर्शाता है। मौलाना हसरत मोहानी, संविधान सभा के एक अदद ऐसे मेम्बर थे, जिन्होंने संविधान पर अपने दस्तख़त नहीं किये, और वो इसलिए कि उन्हें लगता था कि देश के संविधान में मज़दूरों और किसानों की हुकूमत आने का कोई ठोस सबूत नहीं है।

जाहिद ख़ान

जाहिद ख़ान

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक से लेखन की शुरुआत। देश के अहम अख़बार और समाचार एवं साहित्य की तमाम मशहूर मैगज़ीनों में समसामयिक विषयों, हिंदी-उर्दू साहित्य, कला, सिनेमा एवं संगीत की बेमिसाल शख़्सियतों पर हज़ार से ज़्यादा लेख, रिपोर्ट, निबंध,आलोचना और समीक्षा आदि प्रकाशित। यह सिलसिला मुसलसल जारी है। अभी तलक अलग-अलग मौज़ूअ पर पन्द्रह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’ के लिए उन्हें ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ मिला है। यही नहीं इस किताब का मराठी और उर्दू ज़बान में अनुवाद भी हुआ है।

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