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ललित निबंध शशि खरे की कलम से....

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बांचे कोय

             छांदोग्य उपनिषद में वर्णित है कि ब्रह्म सृष्टि से पहले एक ही था, उसने सोचा मैं एक से अनेक हो जाउं, ‘तदैक्षतबहु स्यां प्रजायेति’। प्रेम करने की इच्छा से सृष्टि की रचना का भाव जागा। इस प्रकार प्रेम सृष्टि का प्रथम भाव हुआ। तब प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है? उपनिषदों और महान धार्मिक ग्रन्थों में उल्लिखित कोई गंभीर दर्शन है या सामान्य मानव मन को उद्वेलित और गतिमान रखने वाला कोई भाव?

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- ‘हे अर्जुन, तुम मुझे प्रिय हो क्योंकि तुम प्रश्न करते हो, तुम जिज्ञासु हो।’ जिज्ञासा जो तथ्यों की गहन छानबीन करने की दिशाएं दिखाती है, वही परम सत्य के दर्शन करवाती है, अतः प्रश्न करो।

बुद्ध कहते हैं प्रश्न से परे कुछ भी नहीं है। संपूर्ण सृष्टि प्रश्नों में समाहित है। प्रश्न सुप्त मस्तिष्क को जाग्रत करते हैं। नयी राह खोजने को प्रेरित करते हैं। प्रश्न रूढ़ हो चुकी परंपरा को चुनौती देते हैं। जब प्रश्न झकझोरते हैं तो सदियों से शव हो चुकी सोच में नये प्राण कुलबुलाने लगते हैं।

प्रश्न मशाल होते हैं, राह दिखाते हैं, लक्ष्य खोजने की प्रेरणा देते है। पहले जिज्ञासा जागती है, फिर उसके समाधान खोजे जाते हैं। यह क्रम सृष्टि के आदि और संभवतः अंत से भी जुड़ा है। मेधा प्रश्न उठाती है, प्रज्ञा समाधान करती है। खुसरो प्रेम के बारे में बताते हैं किन्तु वे लीक पर नहीं चलते, वे समाधान पहले ही सामने रख देते हैं।

खुसरो ने प्रेम से संबंधित सभी प्रश्नों को, कुतुहलों को, जिज्ञासाओं को परदे में रखा है। उत्तर सामने रख दिया है- “खुसरो पाती प्रेम की बिरला बांचे कोय/वेद पुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।” प्रेम की पाती को बांचना सबके वश की बात नही है। प्रेम को तो कोई विशिष्ट ही समझ पाएगा, अंतस में उतार पाएगा, तब वह बाक़ी को पढ़कर, समझाकर सुना सकता है, यह समाधान है प्रेम को जानने-समझने का एक पहेली के रूप में। यह उत्तर है तो प्रश्न क्या है? हमें प्रश्न खोजकर लाना है और खुसरो के समाधान से उनका सामंजस्य बिठा कर देखना है। अनेक प्रश्न सामने खड़े हो गये हैं- प्रथम प्रश्न है, क्या है प्रेम?

-क्या है उस पाती में जिसमें प्रेम के बारे में लिखा है? उसमें इस सनातन सत्य का उद्घाटन है कि सारे, झगड़े बनावटी हैं, भ्रम हैं इसलिए द्वेष का जीवन में कोई स्थान नहीं है। बस प्रेम ही एकमेव सत्य है।

-अगला प्रश्न है- क्या है यह बांचना..? सब तो पढ़े-लिखे हैं तो केवल बिरला क्यों बांचेगा? सभी क्यों नहीं बांच सकते? ऐसा क्या है कि सब नहीं समझ पाते हैं?

-और कौन है वह ‘बिरला’ जो प्रेम की पाती बांच पाता है? आगे खुसरो कहते हैं भले ही कोई वेद, पुरान, पोथियों का ज्ञानी पंडित हो पर हृदय में प्रेम को समझने की सामर्थ्य न हो तो व्यर्थ है ज्ञान।

खुसरो उत्तर सामने रखकर प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रहे हैं। हम प्रश्नों की खोज में निकल पड़े हैं किंतु प्रश्न तो सामने ही पलक झपकते उपस्थित हो गये हैं, जिनके उत्तर खुसरो ने कूटभाषा में लिखे हैं, इनको समझने के लिए गहरे पानी पैठना होगा।

-प्रेम क्या है… जो किसी कारण से हमें अच्छा लगता है और उसे हम, तो उस भाव को प्रेम भाव कहते हैं। कभी बिना किसी कारण के भी कोई अच्छा लगता है यह विशुद्ध निर्मल प्रेम तो श्रेष्ठतम होता है। मन में अनेक रंग-रूप होते हैं इस प्रेम भाव के। भारतीय दर्शन कहता है मन जैसी कोई चीज़ होती नहीं है, हमारे पास केवल चेतना होती है। चेतना सदैव मानसिक, भौतिक या आध्यात्मिक सत्ता को अपना विषय बनाती है। मन और चेतना दोनों अलग-अलग हैं, यह भ्रम है, दोनों बस उतने ही अलग हैं जितने समुद्र और उसमें उठती लहरें अलग हैं।

….चेतना यदि आध्यात्मिक स्तर पर ठहरी है, आज्ञा चक्र पर स्थिर हुई है तो ईश्वर से लगन लगती है।

इसके विपरीत मन यदि भौतिकता पर मंडराता है तो प्रेम के अनेक सांसारिक रूप देखने को मिलते हैं।

-विभिन्न रिश्तों का प्रेम, मित्रता का प्रेम, प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम, पति-पत्नी का प्रेम। रिश्तों के प्रेम में वात्सल्य सर्वोपरि पूज्य माना जाता है। माता-पिता का प्रेम निस्वार्थ है। यद्यपि वर्तमान समय में, अनेक बार भाई-बहन वास्तविकता में किसी काम नहीं आते, फिर भी यह प्रेम त्यौहार मनाने के काम तो आता है।

सख्य भाव कृष्ण और सुदामा जैसा यदि ऐसा मित्र मिलें तो जीवन सफल हो जाये। इन सभी रिश्तों, संबंधों के प्रेम का रूप सर्वथा भिन्न दिखायी देता है किंतु निश्छलता, निस्वार्थता और असीम होना सभी के साथ अनिवार्य शर्त्त है, तभी वह प्रेम भाव माना जाएगा। इस प्रेम को भी बहुत परीक्षाएं देना पड़ती हैं, दिन-रात काजल बनाने वाले समाज के पास केवल अविश्वास होता है। इसका सबसे सशक्त उद्धरण है लाला हरदौल और उनकी भाभी का पवित्र रिश्ता। उन्हें ज़हर पीना ही पड़ा।

 

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शृंगार रस, प्रिय-प्रियतमा का प्रेम, साहित्य जगत में और पूरे संसार में सर्वोच्च सिंहासन पर आरूढ़ है। सर्वाधिक विरोध भी उसे ही झेलना पड़ता है। यह इश्क़ तो पतंग की मानिंद होता है और रूढ़ रिवाज इसकी डोर हैं। पतंग खुले आकाश में उड़ान भरना चाहती है और डोर छोड़ती नहीं है।

प्रेमियों के मन-गगन में ख़ूब मगन हो कर डोलती है ‘प्रेम पतंग’। किन्तु विरोधी भी कांच से पैने बनाये हुए मांजे से काटते ही रहते हैं डोर को – कभी धर्म की ग़लत व्याख्या, कभी जाति की आड़, कभी अशुद्ध ख़ून की रिपोर्ट लेकर प्रेम की हत्या करने पर तुले रहते हैं।

बहुत कठिन है प्रेम को परिभाषित करना। कालिदास कहते हैं ‘आत्मा से आत्मा का जुड़ाव’।

दो आत्माएं एक हो जाती हैं तो प्रेम का जन्म हो जाता है। यह जुड़ाव हमें सशक्त और प्रबुद्ध बनाता है। हर कोई न प्रेम कर पाता है न हर कोई इसे ‘बांच’ पाता है। लोग इसे किसी न किसी फ्रेम में कसकर या रिश्तों में फ़िट कर देखना चाहते हैं किन्तु यह तो एक अहसास है, कोमलतम भाव है यह सौंदर्य की चरमसीमा है। इसे पवित्र निश्छल आत्मा की सत्ता ही बांच पाती है। कोई भेद होता नहीं प्रेम में, रूप-कुरूप होता नहीं, क्षुद्रता से ऊपर उठा मन ही इसे देख पाता है। जब मन में प्रेम पनपता है, तो समस्त सृष्टि में प्रेम दृष्टिगत होता है। पोथियां भरी पड़ी हैं प्रेम के स्तुतिगान से। वेद महमहा रहे है सृष्टि-सौन्दर्य प्रेम से:

“अरे मानवो! गान करो
इस झरते सोम का…
मंगल क्षरण करो तुम राजन,
गाय, अश्व, औषधियों के हित” – बशीर बद्र, स्वर्णरेख।

वेदों ने निरंतर सबके प्रति प्रेम ही निवेदित किया है- हे मेघ, हे वायु, हे वरुण, हे रवि, हे आकाश, हे इन्द्र हम तुम्हारी अभ्यर्थना करते हैं। हमने इस प्रेम सिन्धु को अपने जीवन में कितना समेटा है? कितना उतारा है जीवन में? वेदों की बातें चलो विश्व में न सही, भारत में कितनी समझी गयी हैं, कितनी मानी गयी हैं?

कभी बांचा ही नहीं, गहराई में जाकर समझने का यत्न ही नहीं किया, तो जीवन में कैसे उतारते? स्वार्थ अवश्य है मन में, किन्तु प्रेम किसी से नहीं है न धरती से, न आकाश से, न मिट्टी से, न पानी से। आज धवल-पटल गंगा के, अब सचमुच काली पड़ गयी यमुना के, नर्मदा के आंसू देखे हैं किसी ने? पर्यावरण की रक्षा, जलवायु परिवर्तन की चिन्ता पर वैश्विक मीटिंग होती हैं, प्रकृति से धरती से प्रेम होता तो यह आवश्यकता ही नहीं आती।

खुसरो जिसकी बात करते हैं, जो प्रेम पाती के लिखे भाव समझ पाता है उस बिरले की बात करते हैं। कौन है वह बिरला जो प्रेम की पाती बांच लेता है। सृष्टि के निर्माण से आज तक प्रेम कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं हो पाया, प्रत्यवरोधन प्रेम के मार्ग में हमेशा मानव ने ही लगाये हैं फिर असूया भाव भी तो होता है- एकाधिपत्य की तृष्णा- मेरे सिवा किसी और का न हो। कबीर ने उसे ही “पंडित”, खुसरो के शब्दों में “बिरला” कहा है, जो प्रेम की इस अपूर्णता को संपूर्णता में बदल पाता है- मैं मेरा सब दे दूं, स्वत्व का भाव ही न रहे बाक़ी, और जब स्वत्व ही न रहेगा, मैं का भाव ही न रहेगा तो लेगा कौन, पाने की अभिलाषा का अंत होने पर हृदय में प्रेम बचता है।

जिन्होंने सभी ग्रन्थों के निचोड़- ‘प्रेम’ को आत्मसात कर लिया था, वे संत, वे समाज सुधारक, समाज को समझा-समझा कर चले गये, किंतु समाज हांके जा रहे पशुओं की भांति जिनके हाथों में लाठी है, उनकी बतायी राह पर चलता है। ईश्वर है सर्वत्र प्रेम के रूप में, उस प्रेम का विस्तार असीम है विभाजन की असंख्य रेखाएं खींचने वाला मानव इतनी सरल बात को स्वीकार नहीं कर पाता।

जिन्होंने कुछ नहीं बांचा, ऐसे बड़े चतुर चालाक, कलुष बुद्धि के समाज-कर्णधार, स्त्री-उद्धारक, उन्होंने प्रेम को भांति-भांति की ज़ंजीरों से बांधने के नियम बनाये। रूसो ने कहा था मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है किन्तु सर्वत्र ज़ंजीरों से बंधा होता है। इंसान ने जितना अवरुद्ध, अपनी क्षुद्र बुद्धि से प्रेम को किया है उतना और किसी भाव को नहीं। शिशु-सा सरल हो मन और आकाश-सा विशाल हो हृदय, ऐसा कोई बिरला ही होता है, वही प्रेम कर पाता है और वही प्रेम को समझ पाता है। ऐसे लोग जो असीम में विस्तारित प्रेम को समझ पायें, ऐसे बिरले ही हुए हैं।

आज फिर ऐसे ही किसी ‘बिरले’ की प्रतीक्षा है, जो क्षणभंगुरता ही एकमेव सत्य है इसलिए दूसरों को भी जी लेने दो, इसलिए लालच के पहाड़ मत खड़े करो तथा जो दुनिया में फैली भयानक गलाकाट प्रतिस्पर्धा, मारकाट को शान्त करने वाली प्रेम की पाती बांच दे।

खुसरो ने ऐसे प्रेम का उल्लेख किया है और ज्ञानी-ध्यानी पंडितों में ऐसा ‘बिरला’ खोजना चाहा है, वही ‘पाती’ बांच सकेगा।

(चित्र परिचय: प्रेम भाव को व्यक्त करती दो कृतियां प्रस्तर कलाकार अनिता दुबे द्वारा रचित)

Shashi khare, शशि खरे

शशि खरे

ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।

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