
- February 14, 2026
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विश्व रेडियो दिवस के संदर्भ में डॉ. दिनेश पाठक की कलम से....
बदली-बदली नज़र आती है दुनिया आवाज़ की
पाश्चात्य विद्वानों ने रेडियो को थिएटर ऑफ़ द माइंड यानी मस्तिष्क का रंगमंच कहा है क्योंकि इसके ज़रिये कानों तक पहुंचे शब्द और स्वर प्रत्येक श्रोता के मस्तिष्क में एक अलग छवि की रचना करते हैं। अगले ही पल क्या सुनायी देगा यह उत्सुकता, काम के साथ-साथ सुनने की इसकी सहज सुलभ एवं सस्ती उपलब्धता, रेडियो को मनोरंजन साधनों के महासमर वाले इस युग में नौ दशक बाद भी जीवित रखे हैं।
जल्द ही एक शताब्दी का सफ़र पूरा करने वाले भारतीय रेडियो प्रसारण की पहली संगठित शुरूआत 23 जुलाई 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के बंबई केंद्र से हुई थी। सन 1930 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस माध्यम के महत्व को समझते हुए इसे अपने नियंत्रण में लेकर इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम दिया जो 1936 से ऑल इंडिया रेडियो के नाम से जाना जाने लगा। स्वतंत्रता के बाद, सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस एकमात्र सार्वजनिक सरकारी प्रसारण माध्यम का नामकरण आकाशवाणी कर दिया और धीरे-धीरे आकाशवाणी शब्द ही भारतीय रेडियो प्रसारण का पर्याय बन गया।
भारत में रेडियो प्रसारण का पर्याय रही आकाशवाणी कला, साहित्य और सांस्कृतिक मूल्यों की सर्जक और प्रणेता के रूप में जानी जाती रही है। एक से बढ़कर एक कलाकार साहित्यकार और संगीतज्ञ आकाशवाणी से जुड़कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते रहे हैं। इनमें बड़े ग़ुलाम अली खां, पंडित रविशंकर, बिस्मिल्लाह ख़ान, गिरिजा देवी, सिद्धेश्वरी देवी, बेगम अख्तर जैसे संगीतज्ञ एवं गायक तथा सुमित्रानंदन पंत, इलाचंद्र जोशी, पंडित नरेंद्र शर्मा, अमृत लाल नागर, भगवती चरण वर्मा, खुशवंत सिंह, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, उपेंद्र नाथ अश्क, मजाज़, रमानाथ अवस्थी, गिरिजाकुमार माथुर जैसे साहित्यकार और शायर शामिल थे। उन दिनों कई उच्च स्तरीय साहित्यिक रचनाएं सिर्फ़ रेडियो की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए ही लिखी गयीं। चौथे, पांचवें और छठे दशक में साहित्य और संगीत को आम आदमी से जोड़ने का जो काम रेडियो ने किया, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है। इसीलिए आज भी देश का बड़े से बड़ा संगीतज्ञ और साहित्यकार रेडियो को ससम्मान याद करता है।
नौ दशकों के दौरान रेडियो ने महानगरों के ड्रॉइंग रूम से गांव की चौपालों और मेहनतकशों के झोपड़ों से खेत में काम करते किसान के हल तक का सफ़र तय किया। दशक दर दशक तकनीक के विस्तार के साथ चौथे दशक के भारी-भरकम रेडियो का आकार भी घटता गया और टेबल ट्रांज़िस्टर से पॉकेट ट्रांज़िस्टर बनने के बाद रेडियो जेब में रखे मोबाइल तक सिमट गया। पिछले ढाई दशक में मनोरंजन और ज्ञानार्जन के संसाधनों के विस्फोटक विस्तार के बावजूद आज भी रेडियो, देश की लगभग 99% जनता तक सीधी पहुंच के चलते प्राथमिक संचार का सबसे प्रभावी माध्यम है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने मन की बात देश की जनता से साझा करने के लिए तमाम दूसरे माध्यम छोड़कर इसका चयन किया गया। कोरोना के कारण लॉकडाउन के चलते, ज़्यादातर लोगों के हाथों में दिन के अधिकांश वक़्त मोबाइल रहा, इसे देखते हुए ऑल इंडिया रेडियो ने, डिजिटल टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के सहारे इस माध्यम में नयी ऊर्जा का संचार किया।

ऑल इंडिया रेडियो के तमाम प्राथमिक केंद्र अपने फ़ेसबुक पेज के माध्यम से केंद्र से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की न केवल सूचना दे रहे हैं बल्कि कई बार उनका लाइव प्रसारण भी कर रहे हैं, साथ ही कार्यक्रम पूरा होने के बाद उसे अपने यूट्यूब चैनल पर भी डाल रहे हैं ताकि प्रसारण के समय जो श्रोता उन कार्यक्रमों को नहीं सुन सके हैं, वह उन्हें अपनी सुविधानुसार बाद में सुन सकें। आकाशवाणी की सर्वाधिक लोकप्रिय प्रसारण सेवा विविध भारती राष्ट्रीय सेवा ने अपने सभी कार्यक्रमों को एक नया रंग रूप दिया और सोशल मीडिया के ज़रिये इनके वृहद प्रचार प्रसार ने लोगों को उन शानदार कार्यक्रमों का मुरीद बना दिया है, जिन्हें इस सेवा ने पिछले छह दशक में अपने ख़ज़ाने में संजोया है।
पिछले दो-ढाई दशक के दौरान एफ.एम. चैनल्स के ज़रिये रेडियो को पुनर्जीवित करने का जो प्रयास किया गया था, उसने इसे मोबाइल ऐप्लीकेशन के ज़रिये आम जनता तक और भी सहज सरल तरीक़े से पहुंचा दिया है। वर्तमान में ऑल इंडिया रेडियो की, ‘न्यूज़ ऑन एयर ‘तथा ‘ऑल इंडिया रेडियो लाइव’ ऐप्लीकेशन के ज़रिये रेडियो श्रोता कभी भी, कहीं भी देश भर के रेडियो स्टेशनों के साथ आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा, विविध भारती सेवा, उर्दू सेवा, अंतर्राष्ट्रीय सेवा और शास्त्रीय संगीत के चैनल रागम के कार्यक्रम भी एकदम साफ़-साफ़ सुन सकते हैं, ज़रूरत सिर्फ इंटरनेट उपलब्धता की है।
देखा जाये तो यह समय का बदलाव है, विभिन्न एफ़.एम. चैनल्स के ज़रिये निजी क्षेत्र के प्रसारणकर्ताओं के साथ ऑल इंडिया रेडियो की प्रतिस्पर्धा के परिणामस्वरूप उसकी विभिन्न सेवाओं से लेकर प्राइमरी चैनल्स तक के स्तर पर प्रोग्रामिंग और कार्यक्रमों के प्रस्तुतिकरण में काफ़ी बदलाव आया है, और इसे विकसित करने के प्रयास भी हो रहे हैं। आने वाले समय में बेहतर सेवा शर्तें और आर्थिक लाभ के साथ कामकाजी स्वतंत्रता निश्चित रूप से रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में बेहतर प्रतिभाओं को अपनी ओर आकर्षित करेगी। तकनीकी स्तर पर विश्व में हुई नवीनतम उपलब्धियों को अंगीकार करते हुए प्रसारण की गुणवत्ता में बढ़ोतरी के साथ-साथ रिकॉर्डिंग तथा ब्रॉडकास्टिंग में डिजिटल तकनीक का उपयोग तथा फ़ोन-इन कार्यक्रमों एवं सोशल मीडिया के ज़रिये अधिक से अधिक श्रोताओं को अपने से जोड़ने के रेडियो के प्रयासों को आशातीत सफलता मिल रही है।
13 फरवरी 1946 को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की गयी और वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को विश्व रेडियो दिवस के रूप में मान्य किया।
बदलती परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस वर्ष ‘विश्व रेडियो दिवस’ का मुख्य विषय ‘रेडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ रखा है। क्योंकि यूनेस्को के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग अब रेडियो संचालन के कई चरणों में किया जा रहा है- प्रसारण सामग्री निर्माण और श्रोता विश्लेषण से लेकर अभिगम्यता उपकरणों और स्वचालन तक। इससे इस क्षेत्र के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों उत्पन्न हो रही हैं। वर्तमान में विश्व रेडियो दिवस, सार्वजनिक, वाणिज्यिक और सामुदायिक प्रसारकों के साथ-साथ पॉडकास्ट और डिजिटल ऑडियो निर्माताओं के लिए भी रेडियो की बदलती भूमिका का विश्लेषण करने का एक वैश्विक अवसर बन गया है।
डीप फेक और ग़लत डिजिटल सूचना के युग में, रेडियो विश्वसनीय और जनोपयोगी सामग्री प्रदान करता है। हालांकि, रेडियो उद्योग को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों से तीव्र प्रतिस्पर्धा, विज्ञापन राजस्व पर दबाव और नियामक बाधाओं जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन चुनौतियों का सामना करने के लिए, यह सक्रिय रूप से डिजिटल एकीकरण, सामग्री विविधीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीक को अपना रहा है। डिजिटल-फ़र्स्ट रणनीतियों, पॉडकास्टिंग, हाइपर-पर्सनलाइजेशन और रीजनल कंटेंट पर ध्यान केंद्रित करना इसकी समसामयिकता के आधार बिंदु हैं।
इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि रेडियो भारत के विविध और गतिशील मीडिया परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक माध्यम है और आगे भी बना रहेगा। रणनीतिक अनुकूलन, नीतिगत समर्थन और तकनीकी एकीकरण के माध्यम से, रेडियो न केवल जीवित रहेगा बल्कि अपनी अद्वितीय उपयोगिता और सामाजिक मूल्य को पुनः परिभाषित कर, सूचना, मनोरंजन और विकास पारिस्थितिकी तंत्र का एक अनिवार्य घटक बनेगा।

डॉ. दिनेश पाठक
राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं हेतु दीर्घ काल से कला, संस्कृति, संगीत एवं सामायिक लेखन एवं संपादन। आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं विभिन्न टी.वी. चैनलों हेतु कार्यक्रम/वृतचित्र लेखन, निर्माण, प्रस्तुतकर्ता के रूप में संबद्ध। विविध क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों के शताधिक विस्तृत साक्षात्कार जिनमें लता मंगेशकर का अंतिम इंटरव्यू सम्मिलित है। तानसेन समारोह शताब्दी वर्ष हेतु निर्मित विशेष वृतचित्र, 'सुरों और संस्कृतियों का वैश्विक समागम तानसेन समारोह' सहित ऐसे अन्य प्रोजेक्टों में लेखन। 'स्वरित' का संपादन । साहित्य अकादमी म.प्र. सहित अन्य संस्थानों से सम्मानित। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर में पूर्व कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक। संपर्क: dpathak2005@gmail.com
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