
- February 14, 2026
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डॉ. मंगला अनुजा की कलम से....
अर्द्धनारीश्वर
शिव का वह स्वरूप जिसमें उनके शरीर के दाहिने आधे अंग में वे स्वयं तथा बाहिने ओर के आधे अंग में पार्वती का रूप रहता है। वैद्यकशास्त्र के अनुसार ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम का एक अंजन भी होता है, जिसको लगाने से कैसा भी ‘ज्वर’ हो, उतर जाता है। इन दोनों बातों को यदि जोड़ दिया जाये, तो शिव के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप के दर्शन मात्र से सृष्टि में व्याप्त सभी प्रकार के ‘ज्वरों’ से मुक्ति पायी जा सकती है। उसमें उस तरह का ‘ताप’ भी हो सकता है कि मैं पुरुष हूँ, विद्वान हूँ, बलवान हूँ, धनवान हूँ और दुनिया मेरे द्वारा ही संचालित हो रही है या मैं स्त्री’ हूँ, सौन्दर्य की देवी हूँ और जन्म देने की क्षमता रखती हूँ। जबकि यह सभी जानते हैं कि अकेला ‘पुरुष’ संसार को नहीं चला सकता और न ही अकेली ‘स्त्री’ जन्म की अधिष्ठात्री देवी बन सकती है, दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से यदि देखा जाये तो ईश्वर का ‘सत्’ स्वरूप ‘मातृस्वरूप’ है और ‘चित्’ स्वरूप ‘पितृस्वरूप’ तथा तीसरा ‘आनन्द स्वरूप’ होता है, जिसमें मातृभाव और पितृभाव दोनों का पूर्णरूपेण सामंजस्य देखा जा सकता है, जो शिव और शक्ति के अर्द्धनारीश्वर रूप में हमारे सामने आता है। वह ऐसा स्वरूप है, जहाँ ‘पुरुष’, ‘प्रकृति’, ‘स्त्री’ कुछ नहीं है, केवल एक अद्वितीय वस्तु ‘एकमेवाद्वितीयम’, वही अनन्त आनन्द की मूर्ति अर्धनारीश्वर है। अर्थात् स्त्री-पुरुष एक हैं, समान हैं, छोटे-बड़े नहीं होते, पीड़क-पीड़ित नहीं हो सकते। साथ ही यह स्वरूप यह भी ज्ञान कराता है कि पुरुष में यदि स्त्रियों वाले दया, करुणा, परोपकार जैसे गुण नहीं होंगे तो वह पूर्ण सफल पुरुष कभी नहीं हो सकता। इसी प्रकार स्त्रियों में भी पुरुषों के समान साहस, समानता, उदारता यदि नहीं रहती तो वह डरायी जाती है, छोटी सोच वाली ‘हेय’ और ‘कृपण’ समझी जाती है।
अब प्रश्न यह उठता है कि योगीश्वर शिव को इस अर्द्धनारीश्वर स्वरूप को धारण करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? ‘शिवमहापुराण’ में पढ़ने को मिलता है- “ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि का निर्माण किया पर उसका विस्तार नहीं कर पा रहे थे, तो नारद जी ने उन्हें सुझाया कि महादेव का आह्वन करें, वे ही कोई रास्ता बताएंगे। ब्रह्माजी द्वारा शिव का आह्वान किया गया, तब शिवजी अर्द्धनारीश्वर रूप धारण कर उनके सामने प्रकट हुए। उनके उस रूप को देखते ही ब्रह्माजी को यह समझते देर नहीं लगी कि ‘शक्ति’ और ‘शिव’ दोनों के सहयोग से ही सृष्टि का विस्तार सम्भव है। उन्होंने ‘आदि शक्ति’ से प्रार्थना की कि- हे अंबे! मैं कामदेव की सहायता से सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूँ, परन्तु आपके ‘स्त्री’ स्वरूप के बिना यह संभव नहीं है- शक्ति ने उनका आग्रह स्वीकार करते हुए पहले ‘सती’ तत्पश्चात् ‘पार्वती’ के रूप में जन्म लेकर सृष्टि के विस्तार में अपना सहयोग दिया। यही कारण है कि हमारी प्राचीनतम पाषाण कला, चित्रकला, नृत्यकला और साहित्य सभी पर ‘शक्ति’ का प्रभाव देखने को मिलता है।
अर्द्धनारीश्वर स्वरूप स्त्री-पुरुष की उस समानता का भी द्योतक है, जिसके बिना घर, परिवार, समाज, धर्म, जाति और राष्ट्र का विकास सम्भव नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे हमारी संस्कृति में दूसरी संस्कृतियों और सभ्यता का घालमेल हुआ, वैसे-वैसे ‘स्त्री’ का महत्व घटता चला गया और समाज पुरुष प्रधान हो गया। ‘स्त्री’ केवल ‘वस्तु’ बन कर रह गयी। जबकि हर युग में उसने अपनी उपस्थिति न केवल दर्ज करवायी, अपितु अवसर आने पर अपने बुद्धि कौशल से स्वयं को पुरुषों से कहीं अधिक श्रेष्ठ साबित भी किया। लेकिन पुरुष प्रधान मानसिकता के चलते और स्त्री के सब कुछ सह जाने की प्रकृत्ति के कारण स्थितियाँ दयनीय होती चली गयी।
‘महाभारत काल’ में धन सम्पत्ति की तरह उसे जुए के दांव पर लगा, अपमानित किया गया। ‘रामायण काल’ में उससे अग्नि परीक्षा ली गयी। फिर भी दोषी माना गया और निर्वासित होकर उसे एकाकी जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा। ‘वीरगाथा काल’ में ज़र, जोरू, ज़मीन के लिए युद्ध लड़े जाने लगे, स्त्री विजेता की संपत्ति मानी जाने लगी तब ‘स्त्री’ को अपनी आत्मरक्षा के लिए ‘जौहर’ तक करना पड़ा। ‘भक्तिकाल’ में संसार को त्याग वह ‘मीरा’ बनी, तो भी उसे ज़हर पीने के लिए मजबूर किया गया। ‘रीतिकाल’ आया तो सुरा-सुन्दरी का महत्व इतना अधिक बढ़ गया कि राज दरबारों में हर सुन्दर स्त्री की प्रदर्शनी-सी लगने लगी और तत्कालीन साहित्य स्त्री के नैन-नक्श पर ही केन्द्रित हो गया। ‘आधुनिक काल’ में ‘शोषिता’, ‘पीड़िता’, ‘पथभ्रष्टा’ बनते बनते स्त्री का ‘अर्द्धनारीश्वर’ स्वरूप पता नहीं कहां लुप्त हो गया और वह केवल ‘इस्तेमाल’ की ‘वस्तु’ बन कर रह गयी। धन सम्पत्ति पर वह अधिकार न जमा पाये इसलिए उसे पतिभक्ति का पाठ पढ़ाया गया और जबरन ‘सती’ होने के लिए मजबूर कर दिया गया।

भारतीय साहित्य में स्त्री के अनेक स्वरूप गढ़े गये, उसको लेकर लिखा भी ख़ूब गया। कोई भी कलम का धनी स्त्री विषय से अछूता नहीं रह सका, सभी ने अपनी-अपनी क्षमता से स्त्री पात्रों पर ख़ूब कलम चलायी-
“अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी
आंचल में है दूध और आंखों में पानी”
के लेखक मैथिलीशरण गुप्त का नाम साहित्य जगत में इसलिए और भी आदर के साथ स्मरण किया जाता है, क्योंकि उन्होंने इतिहास के उन उपेक्षित नारी पात्रों को अपने लेखन का विषय बनाया, जिसे भारतीय साहित्य में कोई स्थान ही नहीं मिला था और यदि मिला भी तो नाममात्र को। त्याग-तपस्या की मूर्ति रहे वे सभी नारी पात्र भारत की संस्कृति की गौरवशाली परम्परा के परिचायक भी थे। उनके सभी नारी पात्र मुखर अवश्य रहे हैं, पर स्वच्छन्द कभी नहीं बन पाये। उनके साहित्य की स्त्री सती-साध्वी, पतिव्रता होने के साथ-साथ स्वाभिमानी और शक्ति की स्रोत भी रही थी।
आज के पतनोन्मुख होते हमारे समाज में जब स्त्री रोज़ ही हवस का शिकार बन रही है, उसकी सुरक्षा का नैतिक दायित्व घर, परिवार, समाज, सरकार कोई भी ठीक से उठा नहीं पा रहा है, ऐसे समय में ‘अर्द्धनारीश्वर’ स्वरूप के महत्व को जानना अत्यन्त आवश्यक है। अब स्त्री को अपनी शक्ति को पहचानने के साथ-साथ उसके दुरुपयोग से भी बचना होगा और समाज को इस बात का अहसास भी कराना होगा कि स्त्री पुरुष की जन्मदात्री है, उसके हाथ की कठपुतली नहीं। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि स्त्री को, शक्ति के कल्याणकारी स्वरूप को भी आत्मसात् करना होगा, ताकि वह समाज में अपने गिरते स्तर को बचा सके। यह अहसास पूरे समाज को विशेषकर पुरुष वर्ग को कराना नितान्त आवश्यक है कि स्त्री पुरुष के लिए मन बहलाने, तन की भूख मिटाने का साधन मात्र नहीं है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि अब स्त्री अपनी बिखरी हुई शक्ति को संचित करे और अपने बुद्धि-विवेक को तराशकर समाज में अपना वह स्थान, जो अर्द्वनारीश्वर स्वरूप में था, हासिल करे। अब समय आ गया है, जबकि स्त्री को अपनी ताक़त, अपनी क्षमता के बलबूते अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी अपने शक्तिस्वरूप को पुन: स्थापित करना होगा।
(चित्र परिचय: मधुबनी चित्रकार कृष्णकुमार झा रचित पेंटिंग इंडिकइंस्पिरेशन्स पोर्टल से साभार)

डॉ. मंगला अनुजा
वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और लेखक। आधी दुनिया की पूरी पत्रकारिता, भारतीय पत्रकारिता के नींव के पत्थर जैसी शोधपरक पुस्तकों के साथ ही हेमंतकुमारी देवी चौधरी और सुभद्राकुमारी चौहान पर मोनोग्राफ़ भी प्रकाशित। आधा दर्जन संदर्भ पुस्तकें आपके नाम। आंचलिक पत्रकार, कर्मवीर जैसे पत्रों के संपादन के साथ ही अनेक संकलनों एवं ग्रंथों का संपादन भी। सप्रे संग्रहालय में शोध में निरंतर संलग्न। अध्यापन एवं शोधार्थियों के मार्गदर्शन का अनुभव। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। संपर्क: 9827510592
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