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पाक्षिक ब्लॉग संजीव जैन की कलम से....

ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा

              इस ब्लॉग की भूमिका- मेरा मानना है लेखन सीखा नहीं जाता, सुना जाता है इसीलिए यह शृंखला लेखन सिखाने के लिए नहीं है। यह उन लोगों के लिए है जो लिखते हैं या लिखना चाहते हैं पर भीतर एक बेचैनी महसूस करते हैं कि शब्दों से कुछ छूट रहा है। यदि आप सिर्फ़ बेहतर वाक्य बनाना चाहते हैं, यह शृंखला आपके लिए नहीं। यदि आप लेखन की तकनीकें खोज रहे हैं, यह शृंखला आपको अधूरी लगेगी। पर यदि आपने कभी महसूस किया है कि लिखते समय कुछ भीतर काँपता है और वही असली लेखन है, तो यह शृंखला आपकी है।

यह शृंखला लेखन को तकनीक नहीं, चेतना-प्रक्रिया मानती है। यह सिखाएगी नहीं, खोलेगी। यह बताएगी नहीं, भीतर सुनना सिखाएगी… मनुष्य बोलना सीखता है, पर अभिव्यक्त होना नहीं सीखता, वह उसके भीतर पहले से होता है। लेखन उसी अभिव्यक्ति की परिपक्व यात्रा है। हम अक्सर लेखन को भाषा का कौशल मान लेते हैं। पर लेखन भाषा से बहुत पहले शुरू हो जाता है- ध्वनि में, लय में, संवेदना में, मौन में। यह शृंखला उसी पूर्व-भाषिक क्षेत्र में प्रवेश का निमंत्रण है। आज का समय शब्दों से भरा हुआ है। इतना कि शब्द सस्ते हो गये हैं। हर कोई कह रहा है, बहुत कम लोग सुन रहे हैं। यह शृंखला लेखन को अभिव्यक्ति नहीं, श्रवण की परिपक्वता मानती है…

ध्वनि: अभिव्यक्ति का पहला कंपन

ध्वनि भाषा से पहले है और ध्वनि से पहले कंपन है, जो अनुभूति का मूल केंद्र है। प्रकृति की ध्वनियाँ: हवा और पानी की ध्वनि – पानी की ध्वनि “प्रवाह” का बोध कराती है, हवा की ध्वनि “अनुपस्थिति का स्पर्श” कराती है। हृदय-धड़कन जीवन का बोध कराती है। इस तरह ध्वनि एक जैविक प्रतिक्रिया है, इसीलिए लेखन की जड़ें ध्वनि-संवेदना में हैं। इस तरह लेखन मौन शब्द नहीं, जमी हुई ध्वनि है।

भाषा से पहले क्या था? यदि आप बहुत ईमानदारी से देखें तो पाएँगे— शब्द बाद में आये, ध्वनि पहले और ध्वनि भी बोलकर नहीं, घटकर आयी। हवा जब पत्तों से टकराती है, वह कोई वाक्य नहीं बनाती पर कुछ कह जाती है। जल जब बहता है, वह सूचना नहीं देता पर एक अनुभव छोड़ जाता है। हृदय जब धड़कता है, वह भाषा नहीं बोलता पर जीवन की घोषणा करता है। इस तरह ध्वनि, अर्थ से पहले की उपस्थिति है। यह कहना नहीं, होना है।

लेखन के लिए लेखक की ध्वनि के प्रति गहरी जागरूकता और सघन संवेदनशीलता का होना आवश्यक है, अन्यथा लेखन बहुत सतही बन सकता है।

ध्वनि के प्रति जागरूकता क्यों ज़रूरी? लेखन केवल शब्दों का अर्थ नहीं होता, वह शब्दों की ध्वनि, लय और स्पंदन भी होता है। जब लेखक ध्वनियों के प्रति जागरूक होता है, तो वह सुन पाता है: शब्द का वज़न, वाक्य की साँस, मौन की जगह, लय का टूटना और बनना, तब लेखन सिर्फ़ सूचना नहीं रहता, अनुभव बन जाता है।

ध्वनियों के प्रति जागरूकता का क्या मतलब? यह केवल “आवाज़ सुन लेना” नहीं है। यह तीन स्तरों पर होता है…

भौतिक स्तर- लेखक पहचानता है: यह सरसराहट है या हुंकार; यह कल-कल है या प्रलयकारी गर्जन; यह फुहार है या प्रहार। यानी वह ध्वनि के स्वरूप और भेद पहचानता है।

भावात्मक स्तर- वह समझता है: वही हवा किसी को शांति देती है, किसी को भय, वही पानी किसी को संगीत लगता है, किसी को बेचैनी, इस तरह ध्वनि केवल ध्वनि नहीं रहती, वह मनःस्थिति का दर्पण बन जाती है।

अस्तित्वगत स्तर- लेखक सुनता है: हवा में ख़ालीपन की गूंज, पानी में प्रवाह का दर्शन, मौन में भी ध्वनि की संभावना। यहाँ ध्वनि “घटना” नहीं, अस्तित्व का संकेत बन जाती है।

लेखन एक अनुभव

यह जागरूकता और संवेदनशीलता लेखन को गहराई कैसे देती है? लेखन अनुभवजन्य हो जाता है। सतही लेखक लिखेगा: हवा चल रही थी। संवेदनशील लेखक लिखेगा: हवा पत्तों से अपना नाम पूछती हुई गुज़र रही थी। पहले में सूचना है। दूसरे में अनुभव है।

लेखन में लय आ जाती है जो लेखक ध्वनियों को सुनता है, उसके वाक्य भी बहते हैं। छोटे वाक्य = झोंके, लंबे वाक्य = नदी का प्रवाह, विराम = ठहरा हुआ जल… इस स्थिति में लेखन पढ़ा नहीं, सुना जाता है।

लेखन में जीवंतता आती है। प्रकृति की ध्वनियाँ लेखन को: दृश्य से श्रव्य बनाती हैं, विचार से अनुभूति बनाती हैं, पाठक केवल समझना नहीं, महसूस भी करना चाहता है।

ध्वनियों के प्रति संवेदनशीलता का अर्थ:

लेखक जीवन की सूक्ष्म गतिविधियों के प्रति जागृत है। जो हवा की सरसराहट सुन सकता है, वह मन की सरसराहट भी सुन सकता है; जो पानी का स्वर पहचान सकता है, वह भावों का प्रवाह भी पहचान सकता है।

हवा = रिक्ति की गतिशीलता, पानी = अस्तित्व का प्रवाह। इनकी ध्वनियाँ सुनना दरअसल अस्तित्व के संकेत पढ़ना है। ऐसा लेखक केवल लिखता नहीं, अस्तित्व को अनुवादित करता है। जो लेखक ध्वनियाँ नहीं सुनता, वह जीवन की आधी भाषा नहीं जानता। जो लेखक आधी भाषा नहीं जानता उसका लेखन सतही होगा।

सतही लेखन क्या होता है?

सतही लेखन में: शब्द अर्थ देते हैं पर गूंज नहीं छोड़ते, वाक्य चलते हैं पर बहते नहीं, विचार होते हैं पर स्पर्श नहीं करते क्योंकि उसमें ध्वनि-संवेदना नहीं होती। ऐसा लेखन पढ़ा जाता है, पर भीतर नहीं उतरता।

ध्वनि-संवेदनशील लेखक क्या अलग करता है?

वह शब्द चुनता नहीं, सुनता है, वाक्य लिखता नहीं, साधता है, विराम को भी भाषा मानता है, उसे पता होता है कि “कठोर ध्वनियाँ” तनाव बनाती हैं, “मृदु ध्वनियाँ” प्रवाह बनाती हैं।

उदाहरण देखें: “पत्थर पर पानी गिरा” और “पत्थर पर पानी टपका” अर्थ लगभग एक, ध्वनि का अनुभव अलग।

लेखन और श्रवण का रिश्ता

गहरे लेखक पहले श्रोता होते हैं: प्रकृति के लोगों की बोलचाल के अपने भीतर की हलचल के लेखन सुनने से जन्मता है, देखने से नहीं। ध्यान देने योग्य बात- ध्वनि के प्रति जागरूकता दरअसल जीवन के प्रति जागरूकता है। जो व्यक्ति ध्वनि की बारीकियाँ सुन सकता है, वह भाव, संकेत, मौन— सब सुन सकता है और वही लेखन को सतह से गहराई में ले जाता है।

लेखन की चर्चा करते समय हम अक्सर शब्दों से शुरू करते हैं, जबकि लेखन की असली जड़ शब्दों में नहीं, संवेदना में है और संवेदना का पहला रूप ध्वनि है। वह सूक्ष्म कंपन जो हमें बताता है कि कुछ घटा है।

ज़रा ठहरकर सोचिए— जब आप किसी गहरे अनुभव से गुजरते हैं, क्या पहले शब्द आते हैं या एक अनाम कंपन? किसी गहरे दुख में मनुष्य अक्सर चुप हो जाता है। पर भीतर बहुत शोर होता है। किसी गहरे प्रेम में शब्द कम पड़ जाते हैं, पर भीतर लय चलती रहती है। यहीं से लेखन का जन्म होता है— भीतर की उस अनकही ध्वनि को आकार देने की बेचैनी से।

लेखक वह नहीं जो शब्द जानता है। लेखक वह है जो अपने भीतर की ध्वनियाँ सुन लेता है।
समस्या यह है कि हम शब्दों की दुनिया में इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि ध्वनियों को सुनना भूल गये हैं। हम अर्थ जल्दी पकड़ना चाहते हैं, अनुभव को पकने का समय नहीं देते। हम वाक्य बना लेते हैं, पर कंपन खो देते हैं और बिना कंपन के लेखन शव है—जीवित नहीं।

ध्वनि जैविक है, शिशु जन्म लेते ही रोता है—वह भाषा नहीं जानता, पर अभिव्यक्ति जानता है। वह रोना सूचना नहीं, उपस्थिति है। वह कहना नहीं घटना है। लेखन भी अपने शुद्ध रूप में यही है— एक घटना। पर हम उसे उत्पाद बना देते हैं।

गहरे लेखक जानते हैं कि लेखन शब्द चुनने से नहीं, सुनने से शुरू होता है। वे अपने भीतर की हल्की-सी खड़खड़ाहट तक सुनते हैं—वह बेचैनी, वह अस्पष्ट कंपन, वह अनाम आहट। वही कच्चा माल है।

आपने शायद अनुभव किया होगा— कुछ लिखते समय अचानक लगता है कि शब्द आगे नहीं बढ़ रहे। असल में शब्द नहीं रुके, ध्वनि छूट गयी। इसका मतलब है कि आप सतह पर लिख रहे हैं, भीतर का कंपन शामिल नहीं।

सच्चा लेखन तब शुरू होता है जब आप अपने भीतर की असुविधा से भागते नहीं। जब आप उस अनाम ध्वनि के साथ बैठते हैं जिसे अभी शब्द नहीं मिले। यहीं बेचैनी जन्म लेती है। और यही बेचैनी लेखन की जननी है।

यदि आप लेखक हैं, तो ख़ुद से एक कठोर प्रश्न पूछिए— आप शब्द लिखते हैं या ध्वनियाँ सुनते हैं? आप वाक्य बनाते हैं या कंपन पकड़ते हैं? क्योंकि शब्द सीखकर लिखे जा सकते हैं, पर ध्वनि सुनने के लिए भीतर उतरना पड़ता है। और भीतर उतरना सुरक्षित नहीं। वहाँ साफ़ ज़मीन नहीं, गहरा पानी है। लेखन वहीं है— उस गहरे पानी में उतरने का साहस।

शब्द किनारा हैं। ध्वनि गहराई है। और अर्थ? वह शायद तब जन्म लेता है जब कोई उस गहराई में डूबकर वापस आये।

इसलिए — लेखन मौन शब्द नहीं, जमी हुई ध्वनि है। जो कभी किसी जीवित क्षण में काँपी थी, और अब शब्द बनकर टिक गयी है। पर प्रश्न अभी भी बचा है— क्या आपके शब्दों में अभी भी वह कंपन जीवित है? या वे सिर्फ़ जमे हुए खोल हैं? यदि यह प्रश्न आपको थोड़ा अस्थिर कर रहा है— तो संभव है, आप सचमुच लेखन के गहरे पानी में उतर रहे हैं।

ध्वनि का नैतिक पक्ष भी होता है क्या हम दूसरों की आवाज़ सुनते हैं? क्या हम केवल अपनी आवाज़ लिखते हैं? क्या हम असुविधाजनक ध्वनियों को अनसुना करते हैं? जो लेखक कुछ ध्वनियों को दबा देता है, वह कुछ सच्चाइयों को भी दबा देता है। ध्वनि-संवेदनशीलता, संवेदनशील नैतिकता भी है।

ध्वनि हमें हमारी सीमाएँ बताती है कुछ ध्वनियाँ असह्य क्यों लगती हैं? कुछ सुकून क्यों देती हैं? यह केवल पसंद नहीं — यह हमारी आंतरिक संरचना का दर्पण है। लेखक के लिए यह आत्म-अध्ययन का साधन है।

गहरी ध्वनि-संवेदनशीलता का अर्थ है “अस्तित्व को सुनना” जब लेखक यहाँ पहुँचता है: उसे शब्दों की जल्दी नहीं रहती वह प्रतिक्रिया नहीं, प्रत्युत्तर देता है उसका लेखन शोर नहीं करता, गूँजता है। एक सूक्ष्म सूत्र- सामान्य लेखक शब्दों से लिखता है। अच्छा लेखक अनुभव से लिखता है। गहरा लेखक सुनकर लिखता है।

लेखन के लिए ध्वनि संवेदी होना भाषा से पहले की शर्त है। भाषा का काम इसके बाद आरंभ होता है। यह लेखन की पूर्वपीठिका है।

ध्वनि अभिव्यक्ति का पहला कंपन इसीलिए है कि पूरा ब्रह्मांड कंपन की भाषा में बात करता है, सिर्फ़ मनुष्य ने शब्दों की दृश्यात्मकता के चलते कंपन की भाषा को भौंथरा कर लिया है। लेखन सिर्फ़ मनुष्यों के लिए होता है, परंतु उसमें संपूर्ण ब्रह्मांड अभिव्यक्ति पाता है। इसलिए ध्वनि अभिव्यक्ति का पहला कंपन कहा गया है।

संजीव कुमार जैन

संजीव कुमार जैन

लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय सरोजिनी नायडू कन्या महाविद्यालय, भोपाल यानी नूतन कॉलेज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं। संपर्क: 98264 58553

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