
- February 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग (भाग-3) मानस की कलम से....
मक़बूल... फ़िल्म की ज़मीन और आसमान
मक़बूल के प्रदर्शन से पहले कलात्मक सिनेमा के चहेतों को यह भनक लग गयी थी कि कुछ बेहतरीन आने वाला है। वजह थी मक़बूल का पोस्टर, जिस पर एक से एक दिग्गज कलाकार नज़र आ रहे थे। यह उम्मीद 2003 में मक़बूल के प्रदर्शन के साथ पूरी हुई। या यूँ कहें कि उम्मीद से बेहतर मिला। मक़बूल उन फ़िल्मों में शुमार हुई, जो इतिहास के पन्नों में भारतीय सिनेमा के एक अनूठे हस्ताक्षर की तरह दर्ज है।
मक़बूल मुख्यतः सिनेमा की दो ज़मीनों पर खड़ी दिखती है। एक गैंगस्टर फ़िल्म की ज़मीन और दूसरी ऐडैप्टेशन की ज़मीन। लेकिन मक़बूल इन दोनों रास्तों के समानांतर चलते हुए अपना एक अलग मोड़ और मुक़ाम बनाती है।
पहले बात करते है गैंगस्टर फ़िल्म के पहलू से। मक़बूल की कहानी इक्कीसवीं सदी के पॉपुलर फ़िल्म जॉनर- मुंबई अंडरवर्ल्ड की महत्वाकांक्षा और पावर गेम्स की समकालीन दुनिया को दिखाती है। ऐसी फ़िल्में ऐंटी-हीरो फ़िल्में होती हैं, जो ऐसी लाइफ़स्टाइल का अनुभव करने का मौक़ा देती है, जिसमें बहुत ज़्यादा ख़तरा, हिंसा और ग़लत तरीक़े से कमायी गयी लग्ज़री शामिल होती है, इस भरोसे के साथ कि आख़िर में (आम तौर पर) उनका प्रायश्चित हो जाएगा।
मक़बूल का रूप
मक़बूल, राम गोपाल वर्मा की दो बहुत ही महत्वपूर्ण फ़िल्मों– सत्या (2000) और कंपनी (2002) के ठीक बाद आयी थी। रामू ‘सत्या’ में मुंबई के अंडरवर्ल्ड को एक्सप्लोर करते हैं और दिखाते हैं असामाजिक तत्व कैसे और क्यों पैदा होते हैं; और कंपनी में रामू ने दिखाया एक अंडरवर्ल्ड ग्रुप का कॉर्पोरेट जैसा पावर-स्ट्रक्चर और उसका ‘ख़त्म’ होना। ये दोनों फ़िल्में प्रामाणिक और सक्षम सोशल डॉक्यूमेंट हैं। लेकिन विशाल भारद्वाज बड़ी चालाकी इस बनी-बनायी ज़मीन का फ़ायदा उठाते हैं और अपनी फ़िल्म को किरदारों के अंदर समेट देते हैं। यह भी एक याद है कि रामू की सत्या में विशाल जुड़े रहे थे।

मक़बूल में मुख्य किरदार ख़ुद के अंतर्द्वंद से लड़ रहा है। विशाल समाजशास्त्र को दर्शन में बदलते और ऊपर उठाते हैं। वह एक ज़रूरी मानवीय दृष्टिकोण पेश करते हैं– बुराई का भ्रष्ट होना और आख़िरकार ख़ुद ही जलकर ख़त्म हो जाना। और इस तरह वो अपनी थीम को यूनिवर्सल बनाते हैं और अपनी फ़िल्म को एक टाइमलेस क्वालिटी देते हैं। शायद इसीलिए, वह सबसे पहले शेक्सपियर के पास जाते हैं। यही वजह है कि मक़बूल में, सत्या के (ज़्यादातर) हिंदू माहौल के उलट, यहाँ का गैंग मुख्य रूप से मुस्लिम है- गैंगस्टर मुंबइया ज़बान की जगह उर्दू में बात करते हैं और दरबारी और सामंती तौर-तरीक़ों में है। जहाँ बॉस, डॉन नहीं ‘अब्बा जी’ पुकारा जाता है।
ये वो वजहें हैं, जो मक़बूल को गैंगस्टर फ़िल्म के दायरे में जकड़कर नहीं रख सकी।
मक़बूल बनाम मैकबेथ
अब बात करते हैं रूपांतरण की दूसरी ज़मीन की। शेक्सपियर रचित ‘मैकबेथ’ के एक मक़बूल रूपांतरण के रूप में जानी जाती है फ़िल्म ‘मक़बूल’। फ़िल्म मैकबेथ के अपराधबोध के केंद्रीय विषय और त्रासदी की शैली को अपनाती है लेकिन भारतीय तहज़ीब और समकालीन राजनीति के हिसाब से कुछ बदलाव भी करती है।
जैसे राजा डंकन के बदले हुए चित्रण के तौर पर जहाँगीर ख़ान फ़िल्म में ज़्यादा नेगेटिव लगता है। शेक्सपियर के नाटक के अनुसार, डंकन एक न्यायप्रिय राजा था, जबकि जहाँगीर ख़ान एक अपराधी-नेता है, एक भ्रष्ट आपराधिक गिरोह का डॉन, जिसके पास राजनीति से ताक़त और समर्थन दोनों हैं।
मैकबेथ के किरदार के रूपांतरण के तौर पर, मियां मक़बूल को फ़िल्म में एक नये अंदाज़ में दिखाया गया है। मैकबेथ के उलट, जिसके पास राजा डंकन को मारने का कोई निजी कारण नहीं था, मक़बूल के पास जहांगीर ख़ान को मारने के लिए काफ़ी वजहें हैं। वह जहांगीर की प्रेमिका, निम्मी से प्यार करता है, और यहाँ एक निजी कारण शामिल है। उसे मारकर, वह प्यार और शक्ति दोनों हासिल कर लेता है। इसके अलावा, जहांगीर का नेगेटिव किरदार और आपराधिक बैकग्राउंड भी इस हत्या में योगदान देता है। उसकी हत्या को किंग डंकन की हत्या जितना दुखद नहीं कहा जा सकता।
मक़बूल एक तरह से किरदारों के चुनाव और उनके पीछे की वजहों के बारे में भी है। मियाँ मक़बूल, पिता समान अब्बा जी और अपने प्यार में, प्यार को चुनता है। निम्मी अब्बा जी की क़ैद और और अब्बा जी की मौत में से मौत को चुनती है। यह चुनाव लालच और अपराधबोध संबंधी विषयवस्तु को दिखाने में मदद करते हैं।
एडैप्टेशन और विशाल
टोरंटो यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर लिंडा हचियन के अनुसार एडैप्टेशन “मूल काम की साधारण कॉपी होने के बजाय सोर्स मटेरियल की फिर से व्याख्या और पुनर्निर्माण होते हैं। एडैप्टेशन अपने आप में नये क्रिएटिव काम होते हैं, न कि सिर्फ़ नक़ल किये गये क्रिएशन। एडैप्टेशन दूसरे साहित्यिक और सांस्कृतिक कामों के साथ इंटरैक्ट करते हैं और स्वाभाविक रूप से इंटरटेक्स्टुअल होते हैं। एडैप्टेशन स्थिर या फ़िक्स्ड होने के बजाय एक मीडियम से दूसरे मीडियम में जाने पर बदलते हैं और लगातार विकसित होते हैं।” उनका यह भी कहना है, “एडैप्टेशन का मीडियम एडैप्टेशन प्रोसेस को प्रभावित करता है और हर मीडियम में कुछ ख़ास गुण और सीमाएं होती हैं, जो इस बात पर असर डालती हैं कि एडैप्टेशन कैसे बनाया जाता है।”
इस सिद्धांत को मानते हुए मक़बूल ऐडैप्टेशन को न्यायसंगत बनाती है। विशाल भारद्वाज ने बहुत समझदारी से पूरे नाटक का ट्रांसलेशन करने से परहेज़ किया, क्योंकि उनके लिए ओरिजिनल नाटक की बारीकियों को सामने लाना लगभग नामुमकिन होता। इसके बजाय, उन्होंने शेक्सपियर के नाटक के ज़रूरी हिस्सों को लिया और उन्हें अपनी भाषा में फिर से लोकल बनाया, फिर से इंटरप्रेट किया और फिर से तैयार किया।
इसके अलावा फ़िल्म के शॉट स्ट्रक्चर, इसमें दिखाये गये मोटिफ़, फ़िलॉसफ़ी, हायरार्की का चित्रण, फ़िल्म के किरदारों के काम को लेकर काफ़ी बातें हो चुकी हैं इसलिए उन्हें यहाँ दोहराना ज़रूरी नहीं है।
अंत में, मक़बूल उन फ़िल्मों में से है जिसकी संदर्भ और प्रसंगों में व्याख्या होती रहती है। मक़बूल के साथ “विशाल भारद्वाज स्कूल ऑफ़ सिनेमा” पनपा जो ओंकारा, सात ख़ून माफ़, और हैदर के साथ आगे बढ़ता रहा। इस स्कूल से निकला एक विद्यार्थी, अभिषेक चौबे, अब ख़ुद एक स्कूल बन चुका है। यह स्कूल वो फ़िल्में बनाता है, जो दूसरी बार देखने पर और बेहतर लगती हैं और तीसरी बार देखने पर शानदार हो जाती हैं।
और यह ट्रिविया भी…
मक़बूल फ़िल्म की शूटिंग शुरू होने से कुछ दिन पहले नसीरुद्दीन शाह ने फ़िल्म के सभी एक्टर्स के लिए एक वर्कशॉप की, ताकि सभी अपने किरदार में ढल जाएं और उनके बीच नैचुरल बातचीत हो सके। डायरेक्टर विशाल भारद्वाज ने उनसे ऐसा करने के लिए रिक्वेस्ट की थी, क्योंकि उन्हें पता था कि यह तरीक़ा मीरा नायर की फ़िल्म मॉनसून वेडिंग (2001) के लिए काफ़ी कारगर रहा था।

मानस
विवेक त्रिपाठी उर्फ़ मानस पूर्व बैंककर्मी हैं लेकिन फ़िल्मों के जुनून ने नौकरी छुड़वायी और फ़िल्में बनाने की दिशा में प्रेरित किया। आधा दर्जन शॉर्ट फ़िल्में बना चुके मानस की कुछ फ़िल्मों को फ़ेस्टिवलों में सराहना व पुरस्कार मिले हैं। फ़िल्म लेखन व निर्देशन के अलावा मानस का एक कहानी संग्रह 'बालकनी' प्रकाशित है। इन दिनों वह पूरी लंबाई की फ़िल्म के निर्माण के लिए संघर्षरत हैं।
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