Importance of Aravalli in preventing desertification in Rajasthan
पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

राजस्थान में मरुस्थल रोकने में अरावली का महत्व

           अरावली पर्वत शृंखला भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो गुजरात से दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर में फैली हुई है। हाल ही में यह खनन, संरक्षण और पहाड़ियों की नयी परिभाषा को लेकर विवादों में रही है। केंद्र सरकार ने 23 दिसंबर 2025 को नये खनन पट्टों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया तथा संरक्षित क्षेत्र का विस्तार करने का आदेश दिया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को 100 मीटर ऊंचाई वाली भूमि को पहाड़ी मानते हुए सतत खनन योजना पर रोक लगायी।

धार्मिक रूप से यह पर्वत महाभारत, पुराणों में अर्बुदाचल या पारियात्र के रूप में उल्लिखित है। यहां माउंट आबू का गुरु शिखर दत्तात्रेय मंदिर, दिलवाड़ा-रणकपुर जैन मंदिर तथा शाकंभरी शक्तिपीठ स्थित हैं।

अरावली ग्रीन वॉल तथा पुनर्जीवन अभियान जीआईएस, ड्रोन सर्वे से वनीकरण व जल संरक्षण पर केंद्रित परियोजनाएं यहां चल रही हैं।

अरावली के बहुआयामी महत्व के साथ राजस्थान के मरुस्थल नियंत्रण में अरावली पर्वत का योगदान इसकी लोकेशन तथा मानसून की हवाओं की दिशा के अनुसार सर्वविदित है।

Importance of Aravalli in preventing desertification in Rajasthan

भौगोलिक संरचना और प्राकृतिक बाधा

अरावली राजस्थान के थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। गुरु शिखर (1722 मीटर) से लेकर गुजरात की महाद तक यह शृंखला हरियाणा, दिल्ली तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को रेगिस्तानीकरण से बचाती है।

यदि इसका क्षरण जारी रहा तो धूल भरी आंधियां, सूखा तथा मरुस्थलीकरण तेज़ होगा। पर्वत की हरियाली रेत के तूफानों को नैसर्गिक रूप से अवरुद्ध करती है तथा यहां की जैव विविधता को संरक्षित रखती है।

टेक्टोनिक गतिविधियों से बनी यह पर्वत शृंखला थार के पश्चिमी विस्तार को सीमित रखती है, जो राजस्थान की 60% भूमि को बचाये हुए है।

जल संरक्षण और मानसूनी प्रभाव की दृष्टि से अरावली भूजल पुनर्भरण (ग्राउंड वॉटर रिचार्ज) का प्रमुख कैचमेंट क्षेत्र है, जहां बनास, साबरमती, लूनी जैसी नदियां उद्गम लेती हैं। यह पर्वत शृंखला राजस्थान के पूर्वी भागों में मानसून को आंशिक रूप से रोककर वर्षा सुनिश्चित करती है।

यहां पर होते खनन से भूजल स्तर 1000 से 2000 फ़ीट कम हो चुका है, जो अलवर, जयपुर जैसे जिलों में कृषि व पीने के पानी पर संकट पैदा कर रहा है।

पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 90% क्षेत्र अब 100 मीटर से कम ऊंचाई का रह गया है, जो अपरोक्ष रूप में जल संकट को गहरा बना रहा है। अरावली के जलस्रोत दिल्ली-एनसीआर को भी आपूर्ति देते हैं। इसका क्षय पूरे उत्तर भारत को प्रभावित करेगा।

जैव विविधता, धार्मिक और आर्थिक भूमिका

यह क्षेत्र तेंदुआ, नीलगाय, दुर्लभ पक्षियों का निवास स्थल है तथा दिल्ली-एनसीआर के लिए प्रकृति का हरा फेफड़ा है। यहां स्थित धार्मिक स्थल जैसे माउंट आबू के दत्तात्रेय मंदिर, दिलवाड़ा जैन मंदिर, जैन तीर्थंकरों को समर्पित हैं, जबकि यह क्षेत्र महाभारत में पांडवों के वनवास स्थल के रूप में वर्णित है। पुराणों में पारियात्र पर्वत के रूप में पारिजात वृक्ष की कथाएं जुड़ी हैं।

खनिज संपदा से रोज़गार मिलता है, किंतु अवैध खनन ने पर्यावरण पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा किया है। राजस्थान की कई नदियां तथा ऐतिहासिक दुर्ग अरावली पर्वत पर ही निर्भर हैं।

तकनीकी परियोजनाएं और संरक्षण प्रयास

अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट 2023 में शुरू हुआ, जिसमें 5 किमी बफ़र ज़ोन में वृक्षारोपण, जलस्रोतों का कायाकल्प और कृषि वानिकी शामिल है। जीआईएस और जीपीएस तकनीक से बंजर भूमि की मैपिंग हो रही है। 2025 का पुनर्जीवन अभियान 700 किमी शृंखला में 29 ज़िलों को कवर करता है, जिसमें ड्रोन से बीज बुआई, सेंसर आधारित मॉनिटरिंग और कार्बन क्रेडिट प्रोग्राम हैं। खदानों के पुनर्वास के लिए पानी से भरे गड्ढों का रखरखाव तथा वन्यजीव आवास बहाली पर फोकस किया गया है।

वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियां

पिछले दिनों के विरोध प्रदर्शनों में पहाड़ी की नयी परिभाषा को 90% क्षेत्र खनन योग्य बनाने वाला बताया गया, जिससे राजस्थान में मरुस्थल विस्तार, मानसून की कमज़ोरी तथा भूकंपीय जोखिम बढ़ सकता है।

गुरुग्राम, फरीदाबाद में जलस्रोत सूख रहे हैं तथा धूल प्रदूषण बढ़ा है।

केंद्र सरकार ने खनन पर प्रतिबंध लगाया है, किंतु लगातार अवैध खनन गतिविधियां जारी हैं।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण की दृष्टि से समाधान में पूर्ण खनन प्रतिबंध को सख़्ती से लागू करना, अरावली ग्रीन वॉल जैसी परियोजनाओं का विस्तार, जीआईएस आधारित निगरानी तथा स्थानीय समुदायों को इको क्लबों से जोड़ना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट निर्देशित सतत प्रबंधन योजना, कार्बन क्रेडिट तथा अमृत सरोवर एकीकरण से संरक्षण अभियान किसी हद तक सुनिश्चित हो सकता है।

अरावली को राष्ट्रीय पार्क घोषित कर वन्यजीव कॉरिडोर विकसित करना तथा जन जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है, ताकि यह राजस्थान की जीवनरेखा बनी रहे।

(चित्र परिचय: सैंड आर्टिस्ट अजय रावत द्वारा बनायी गयी संदेशपरक रेत कलाकृति, साभार)

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *