तंग नज़रों से ही देखें इस गुज़रते दौर को
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

तंग नज़रों से ही देखें इस गुज़रते दौर को

         यह समय लीडरों की बदमिज़ाजी, बेहयाई और बेशर्मी को सामने लाता दौर है। वैसे भी लीडर हमेशा चर्चा में ही रहे हैं। कभी बहुत बेहतरी के लिए कभी कमतरी के लिए। कभी दरियादिली के लिए तो कभी तंगदिली के लिए। कभी खुली दृष्टि के लिए तो कभी तंग नज़रों के लिए। कभी उत्थान के लिए तो कभी पतन के लिए। मनमानियां और तानाशाही भी लीडरों का शौक़ रहा है।

शाइरी ने एक लीडर की ख़ूबियों को भी रेखांकित किया है और ख़ामियों को भी। एक लीडर में आख़िर ऐसा क्या होना चाहिए जो उसे अवाम की नज़रों में बेहतर साबित करे! लीडर अपने तक महदूद कभी नहीं होता। वह स्वार्थ से बहुत परे होता है। अवाम के प्रति वफ़ादार भी होता है और ज़िम्मेदार भी। लीडरों के गिरते स्तर के दौर में शाइरी के ज़रिये लीडरों की पहचान करना बहुत ज़रूरी है। एक लीडर की परिभाषा अगर समझना चाहें तो अल्लामा इक़बाल के इन मिसरों पर ग़ौर करें-

निगाह बुलंद, सुख़न दिल-नवाज़, जाँ पुर-सोज़
यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए

लीडर बनना बहुत आसान है लेकिन लीडर होना बहुत मुश्किल। कोई लीडर बनकर भी अपने कामकाज से ख़ुद को बौना साबित कर देता है। यह ऐसा दौर है जब लीडर ख़ुद अहंकार में डूबे हुए हैं। अपने लिए इनाम और ऐज़ाज़ ख़ुद तय कर रहे हैं। यहां-वहां के ऐज़ाज़ बटोरकर ख़ुद को बेहतर साबित करने में लगे हैं। ऐसे में उन हौसले वाले लीडरों का ज़िक्र लाज़मी है जो कहने को बहुत छोटे होकर भी सूरज से आंखें तरेरकर बात कर रहे हैं। बुलंदी से खड़े हैं और गरियाने वालों को आंखें दिखा रहे हैं। ज़हीर कुरैशी की इस बात को सही साबित कर रहे हैं-

अपने-अपने हौसले की बात है
सूर्य से भिड़ते हुए जुगनू मिले

परंतु इतना हौसला दिखाने वाले बहुत कम हैं। आज पूरी दुनिया लीडरों की ऐसी दादागिरी से परेशान है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत है। शाइरी ने ऐसे लीडरों को हमेशा सलाम किया है जिन्होंने तानाशाही का मुकाबला पुरज़ोर तरीक़े से किया है। वक़्त के साथ बदलते अवसरवादी होते और आवाम के दुख दर्द से वाक़िफ़ होते हुए भी अनजान बनते ऐसे लीडरों पर शाइरी तंज़ भी करती है। अकबर इलाहाबादी ने कहा भी है-

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक़्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

सियासी हलक़ों में शाइरी का इस्तेमाल भी होने लगा है। आजकल लीडर अपनी बात को पुख़्ता दलीलों के साथ पेश करते समय कोई शेर भी पढ़ा करते हैं। यह और बात है कि वे इन अक्षरों के भीतर जाकर उसके सही अर्थ से वाक़िफ़ होने की कभी कोशिश नहीं करते। उनका स्तर सतही होता है और वहीं तक वह महदूद होता है। अदम गोंडवी तंज़िया लहजे में लीडरों की हक़ीक़त बयां कुछ ऐसे करते हैं-

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

आज के लीडर अपने अहं के आगे कुछ देख ही नहीं पाते। अवाम के दुःख दर्द से उन्हें कोई वास्ता नहीं। उनकी अनदेखी ही उन्हें विवादित और अलोकप्रिय बना रही है। इस अनदेखी पर ही तो मुनव्वर राना कहते हैं-

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुमने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना

समुंदर होती आंखों से आंख मिलाने की क़ूवत आज के लीडरों में नहीं हैं। इस ख़राबी के दौर में शाइरी ऐसे मौज़ूआत पर अधिक कुछ कहने से परहेज़ करने लगी है।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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