
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
युद्ध की आग और शांति की राह
इतिहास गवाह है आम आदमी के सिर पर सत्ता की ज़िद, साम्राज्यवादी विस्तारवाद और रक्षा उद्योगों के मुनाफ़े ने हमेशा तलवार लटकाये रखी है। फिर भी, इतिहास यह भी सिखाता है कि भीषणतम रक्तपात के बीच से ही शांति की वह महीन धार निकलती है, जो अंततः संवाद के पौधे उगाती है।
आज जब विश्व यूक्रेन से लेकर गाज़ा और लाल सागर तक फैली अशांति से थका हुआ है, तब यह समझना अनिवार्य है कि अतीत के युद्धों से शांति का मार्ग कैसे निकला और वर्तमान में नये प्रभावशाली भारत जैसे देश इस दिशा में क्या नयी उम्मीद जगा रहे हैं। विश्व युद्ध पुराने हुए, यू.एन.ओ. अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रहा… हाल के युद्धों की विवेचना समझी जा सकती है।
पर समाधान कैसे निकले? …इतिहास के बड़े संघर्ष केवल सैन्य जीत से नहीं, बल्कि कूटनीतिक नवाचारों से ही समाप्त हुए हैं।
खाड़ी युद्ध (1991)
बहुपक्षीय कूटनीति का मॉडल इस युद्ध का अंत केवल ‘ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म’ की सैन्य श्रेष्ठता से नहीं हुआ, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्ताव 687 के माध्यम से हुआ। इसे ‘मदर ऑफ़ ऑल रेज़ोल्यूशन’ कहा जाता है, जिसने युद्धविराम के लिए सीमांकन, निरीक्षण और क्षतिपूर्ति का एक क़ानूनी ढांचा तैयार किया। यहाँ शांति का सूत्र ‘सामूहिक सुरक्षा’ (Collective Security) था।
वियतनाम युद्ध
जनमत और लंबी वार्ता वर्षों के संघर्ष के बाद 1973 के ‘पेरिस शांति समझौते’ ने रास्ता बनाया। यहाँ शांति का मुख्य कारण अमेरिकी घरेलू जनमत का दबाव और ‘फ़ेस-सेविंग एग्ज़िट’ (सम्मानजनक वापसी) की कूटनीति थी।
शीत युद्ध का अंत
व्यक्तिगत संवाद और विश्वास, रीगन और गोर्बाचेव के बीच ‘शिखर सम्मेलनों’ (Summit Diplomacy) ने साबित किया कि परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी दुनिया को ‘हॉटलाइन’ और व्यक्तिगत विश्वास से बचाया जा सकता है।
शांति का नया ‘भारतीय मॉडल’
आज की वैश्विक राजनीति 1991 के मुक़ाबले कहीं अधिक जटिल है। शक्ति के केंद्र अब केवल पश्चिम में नहीं हैं। रूस के साथ ही एशिया में चीन और भारत प्रमुख भूमिकाओं में उभरकर आते हैं। ऐसे देशों को दरकिनार करते हुए कोई विमर्श संभव नहीं दिखता। इस बदलते परिवेश में भारत की भूमिका एक ‘विश्वबंधु’ (Global Friend) के रूप में उभरी है।
वर्तमान में खाड़ी क्षेत्र और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को कम करने में भारत निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर निर्णायक भूमिका निभा सकता है:
विश्वसनीय मध्यस्थ (Credible Mediator): भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से है जिसके संबंध इज़राइल और फ़िलिस्तीन, तथा ईरान और सऊदी अरब, दोनों ही पक्षों के साथ संतुलित और गहरे हैं। यह “डी-हाइफ़नेशन” (De-hyphenation) की नीति भारत को एक तटस्थ मेज़बान बनाती है, जो युद्धरत पक्षों को एक टेबल पर बैठा सकता है।
आर्थिक एकीकरण (IMEC कॉरिडोर): भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) केवल व्यापारिक मार्ग नहीं है, बल्कि शांति का एक ढांचा है। जब राष्ट्रों के आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, तो युद्ध की लागत (Cost of War) बहुत अधिक हो जाती है। भारत इस आर्थिक जुड़ाव के ज़रिये ‘स्थिरता’ का निर्यात कर रहा है।
मानवीय दृष्टिकोण और ‘Soft Power’: यूक्रेन संकट के दौरान भारत के प्रधानमंत्री का मंत्र, “यह युद्ध का युग नहीं है”, अब वैश्विक शांति का नारा बन चुका है। भारत शांति को केवल रणनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता के रूप में पेश करता है।
रणनीतिक स्वायत्तता: भारत किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं है। यह स्वायत्तता उसे वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ बनाती है, जिससे वह खाड़ी देशों को यह समझाने में सक्षम है कि क्षेत्रीय शांति के बिना वैश्विक विकास संभव नहीं है।

शांति की राह के स्थायी सूत्र
खाड़ी से यूक्रेन तक, शांति के लिए चार स्तंभ अनिवार्य समझ आते हैं:
संप्रभुता का सम्मान: जैसा कि भारत हमेशा कहता है, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान और यूएन चार्टर का पालन ही बुनियादी शर्त है।
रोटी बनाम बारूद: यूक्रेन के ‘ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव’ ने दिखाया कि जब दुनिया की खाद्य सुरक्षा ख़तरे में पड़ती है, तो कट्टर दुश्मन भी समझौते के लिए मेज़ पर आते हैं।
क्षेत्रीय समाधान: बाहरी हस्तक्षेप के बजाय क्षेत्रीय शक्तियों (जैसे भारत, तुर्की, सऊदी अरब) को समाधान की कमान संभालनी होगी।
डिजिटल और कूटनीतिक संवाद: आज के दौर में युद्ध केवल मैदान पर नहीं, नैरेटिव में भी लड़े जाते हैं। भारत अपनी तकनीक और कूटनीति के मेल से भ्रामक सूचनाओं को रोककर शांति का माहौल बनाने में सक्षम है।
शांति, कमज़ोरी नहीं, सर्वोच्च साहस है
युद्ध शुरू करना सरल है, युद्ध रोकने के लिए ज़्यादा साहस ज़रूरी होता है। युद्ध के लिए केवल अहंकार और सैन्य आदेश की आवश्यकता होती है। लेकिन शांति स्थापित करना साहस का काम है, क्योंकि इसमें झुकना, सुनना और आम लोगों के साझा भविष्य के लिए समझौता करना पड़ता है।
आज भारत अपनी G20 अध्यक्षता की विरासत और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के विचार के साथ दुनिया को यह याद दिला रहा है कि शांति का मार्ग ‘शक्ति के संतुलन’ से नहीं, बल्कि ‘हृदय के संतुलन’ और साझा समृद्धि से निकलता है। यदि हम एक ऐसा वैश्विक नेतृत्व चुन सकें, जो मिसाइलों के बजाय ‘सप्लाई चेन’ और ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ पर निवेश करे, तो भविष्य की पीढ़ियाँ युद्धों को समाचारों में नहीं, केवल इतिहास के पन्नों में देखेंगी।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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