
- March 15, 2026
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शख़्सियत को जानें मनोज कुलकर्णी की कलम से....
क्यों बड़ी क्षति है के.एन. पनिक्कर का जाना?
यह नयी सदी के शुरूआती बरसों की बात होगी। दुनिया के स्तर पर घट रहे बेहिसाब परिवर्तनों को समझ सकने के लिए तब विविध किताबों, पत्र-पत्रिकाओं को पलटना होता था क्योंकि इंटरनेट इतना व्यापक और सबकी पहुंच भीतर न होता था। उन्हीं दिनों एक लंबा निबंध मेरे हाथ लगा था ‘एजेंडा फ़ॉर कल्चरल एक्शन एंड अदर एसेज़’ (सांस्कृतिक कार्रवाई के लिए एजेंडा और अन्य निबंध)। के.एन. पणिक्कर साहब की उस तक़रीर से देश के तत्कालीन यथार्थ की जटिलता को समझ सकने के कुछ सूत्र मिले थे। उन्होंने नव-उदार आर्थिक नीतियों और हिन्दुत्ववादी कट्टरपन के बीच की नापाक सांठ-गांठ को परत-दर-परत खोलकर रख दिया था। नागरिक समाज पर उसके क्या बुरे असर पड़ रहे हैं, इसका उसमें खुलासा था। भूलता नहीं हूं तो शिक्षा के व्यापक निजीकरण और साम्प्रदायीकरण के दूरगामी प्रभावों बाबत उनकी चिंता भी उसमें थी। उन्होंने फ़ासीवाद के भारतीय संस्करण यानी हिंदुत्ववाद की सांस्कृतिक परियोजना की चर्चा करते हुए उससे संघर्ष का क्या एजेंडा हो सकता है, उसका भी ख़ाका दिया था।
आज़ाद भारत के अकादमिक हलक़ों में ‘इतिहास’ वह विषय रहा है, जिसमें देश ने कुछ विश्वस्तरीय प्रतिभाएं दी हैं। इतिहास को वैज्ञानिक नज़रिये से समझने वाले ऐसे चुनिंदा नामों में डी.डी. कौसाम्बी से लगाकर इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर, रामशरण शर्मा, डी.एन झा आदि के साथ पणिक्कर साहब का नाम भी बहुत आदर के साथ लिया जाता रहा है।
जन-इतिहास को केंद्र में रखने के आग्रही इन्हीं श्री कंडियूर नारायण पणिक्कर का गुज़रे 9 मार्च को तिरुवनंतपुरम, केरल में निधन हो गया। आज, जब वर्तमान हुकूमत ‘तवारीख़’ में मनमाने बदलाव कर रही है, मिथकों को इतिहास बनाकर पेश कर रही है अथवा मज़हबी पूर्वाग्रहों के चलते कुछ महानायकों के अध्याय ही पाठ्यक्रमों से हटा दे रही है, यथार्थपरक दृष्टि और लोकोन्मुखी इतिहास-बोध से संपन्न एक इतिहासकार का न रहना हमारे बौद्धिक-जगत के लिए निश्चित ही बहुत बड़ी क्षति है।
पणिक्कर न केवल जाने-माने इतिहासकार, शिक्षाविद् और लेखक थे बल्कि बतौर सार्वजनिक बुद्धिजीवी देश-दुनिया के तात्कालिक मसलों पर वैचारिक हस्तक्षेप के लिए भी जाने जाते थे। अपना पूरा जीवन इतिहास-अध्ययन और लेखन को समर्पित कर देने वाले पणिक्कर ‘आधुनिक भारतीय इतिहास’ के सर्वाधिक प्रखर और गंभीर अध्येताओं में से एक थे। औपनिवेशिक दौर के बौद्धिक और सांस्कृतिक हालात की विवेचना के साथ-साथ उन्होंने संस्कृति, विचारधारा, वर्चस्व, सामाजिक-जागरूकता, जाति-व्यवस्था, सांप्रदायिक ख़तरों जैसे अनेक मसलों के साथ ही देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को मिल रही चुनौतियों पर विपुल और महत्व्पूर्ण लेखन किया है।
केरल में जन्मे और पले-बढ़े पणिक्कर ने स्नातक उपाधि तो उसी प्रदेश के पालक्काड शहर के सरकारी ‘विक्टोरिया कॉलेज’ से प्राप्त की किन्तु उनके बौद्धिक व्यक्तित्व का निर्माण जयपुर के ‘राजस्थान विश्वविद्यालय’ में हुआ। जहां से उन्होंने स्नातकोत्तर तथा पीएच.डी. की उपाधियां हासिल कीं। ज़ाहिर है, वहां उन्होंने केवल अकादमिक प्रशिक्षण ही नहीं पाया बल्कि मनुष्य और समाज को पढ़ने की भाषा भी सीखी। वहां के पुस्तकालय और अभिलेखागार में पुस्तकों और दस्तावेजों को छानते-खंगालते हुए अपनी इतिहास-दृष्टि अर्जित की। वहीं उन्होंने औपनिवेशिक भारत के समाजार्थिक आयामों को समझना और उन्हें आम जनसंघर्षों से जोड़ना शुरू किया। इस तरह उनके भीतर का इतिहासकार आकार लेता गया। राजस्थानी समाज के वैभव और जटिल अतीत, आज़ादी के आन्दोलन के दौर में अर्जित जनतांत्रिक बेचैनी और मध्ययुगीन रियासती मानसिकता का एक आधुनिक जनतांत्रिक व्यवस्था में चले आने के महत्वपूर्ण दौर में वे उस सूबे में थे, जहां उन्हें महसूस हुआ कि इतिहास चाहे राज-महलों का दर्ज होता आया हो, दरअसल वह बनता खेतों, कस्बों, किसानों और मज़दूरों की ज़िंदगियों और जनस्मृतियों में है।

इसी शैक्षणिक प्रशिक्षण और नज़रिये के आधार पर मालाबार विद्रोह पर किया उनका पहला शोध-प्रयास ‘अगेंस्ट लॉर्ड एंड स्टेट: रिलीजन एंड पीज़ैंट अपराइज़िंग्स इन मालाबार 1836-1921’ महत्वपूर्ण बन पड़ा। जिसमें केरल के मालाबार क्षेत्र के किसान विद्रोहों का विस्तृत अध्ययन है। जो बयां करता है किसानों ने ब्रिटिश हुकूमत और स्थानीय ज़मींदारों के ख़िलाफ़ कैसे संघर्ष किया।
जयपुर में ही उनकी मुलाक़ात उषा भार्गव से हुई, उनकी यही सहपाठी जो बाद में उनकी जीवनसाथी बनीं। जयपुर से दिल्ली जाने पर कुछ बरस उन्होंने ‘दिल्ली विश्वविद्यालय’ में इतिहास पढ़ाया। वर्ष 1972 से वे ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली’ से जुड़ गये। जहां इतिहास विभाग में प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष रहते हुए उन्होंने आधुनिक भारतीय इतिहास-अध्ययन में तरक़्क़ीपसंद मार्क्सवादी नज़रिये को मजबूत किया। कालान्तर में उन्होंने ‘श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, केरल’ के कुलपति की ज़िम्मेदारी भी सम्हाली तथा ‘केरल काउंसिल फ़ॉर हिस्टोरिकल रिसर्च’ के संस्थापक अध्यक्ष और ‘केरल स्टेट हायर एजुकेशन काउंसिल’ के प्रथम उपाध्यक्ष जैसे अहम् पदों पर भी रहे।
अपने महती योगदान के लिए पणिक्कर को अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से भी नवाज़ा गया, जिनमें पद्म-सम्मान भी शामिल हैं। इतिहास को मिथकों से अलगाने और उसे धर्मनिरपेक्ष तथा वैज्ञानिक नज़रिये से देखे जाने के पैरोकार पणिक्कर ‘बाहरी’ को दुश्मन मान लेने की अवधारणा के आलोचक थे। याद रखा जाना चाहिए कि आज का शासन-तंत्र जिस तरह का ‘सांप्रदायिक इतिहास’ लिखवा रहा है, उसमें ‘बाहरी’ को शत्रु बताने की राजनीतिक दृष्टि ही प्रमुख है। ऐसे समय में जब अप्रामाणिक किंवदंतियों को इतिहास बना देने की सरकारी परियोजनाओं को धड़ल्ले से अंजाम दिया जा रहा हो और समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की साज़िशों को बेशर्मी से पोसा जा रहा हो, के.एन.पणिक्कर का निधन एक नैतिक प्रतिरोध का दृश्य से ओझल हो जाना है।
भारत के मार्क्सवादी इतिहास लेखन की विश्व-दृष्टि संपन्न इस महत्त्वपूर्ण आवाज़ को संस्कृति, औपनिवेशिक-चेतना, किसान-आंदोलनों और साम्प्रदायिकता आदि पर उनके लेखन के चलते देश-दुनिया के अकादमिक जगत में सम्मान के साथ याद किया जाता रहेगा। वे अतीत के अध्येता भर नहीं थे बल्कि अपने समय के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक संकटों और संघर्षों में अपना पक्ष भी रखते थे। प्रगतिशील इतिहास दृष्टि को आकार देने और फ़िरक़ापरस्ती के विरुद्ध बौद्धिक संघर्षों में सतत सक्रिय रहे के.एन. पनिक्कर का न रहना इतिहास और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के लिए अपूरणीय क्षति है।
उन्हें याद करते हुए हम उन्हें श्रद्धांजलि भर नहीं दे रहे बल्कि इस संकट को भी रेखांकित कर रहे हैं कि हमारे विश्वविद्यालयों में आज सवाल पूछने की आज़ादी, आंचलिक इतिहास को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ने की दृष्टि और इतिहास को दरबारी दस्तावेज़ों से निकालकर समाज की चेतना बना देने का बौद्धिक वातावरण ही नहीं बचने दिया गया है, तो भविष्य में पणिक्कर जैसे गहन अध्येता और निर्भीक व्याख्याकार कैसे होंगे, जो समाज को यथार्थ-परक आलोचना दृष्टि दे सकें? हमारी भावी पीढ़ियों के लिए वे हालात कितने डरावने होंगे, इसकी चिंता ज़रूरी है।

मनोज कुलकर्णी
चित्रकार, कहानीकार, छायाकार, घुमक्कड़ व वामपंथी संस्कृतिकर्मी। 25 से अधिक चित्र प्रदर्शनियों में हिस्सेदारी। सामयिक विषयों पर अनेक शहरों में नुक्कड़ नुमाइशें। कहानियां, चित्रकला संबंधी लेख, चित्र, रेखांकन, यात्रावृत्तांत, संस्मरण, समीक्षाएं आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कहानी संग्रह 'औघड़ समय' सहित भारत के जनविज्ञान आंदोलन पर एक पुस्तक के अलावा कुछ अनुवाद पुस्तिकाएं प्रकाशित। बाल-साहित्य की एक पुस्तक-माला, कलापत्र 'तूलिका-संवाद' और जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका 'नयापथ' के चित्रकला विशेषांक, जनविज्ञान की त्रैमासिकी 'ज्ञान-विज्ञान वार्ता' और आनलाइन सांस्कृतिक पत्रिका 'हम देखेंगे' का संपादन।
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