विजय शाह बनाम अली ख़ान महमूदाबाद

विजय शाह बनाम अली ख़ान महमूदाबाद

दो मामले इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं। ये आपस में जुड़े तो नहीं हैं लेकिन इन्हें जोड़कर ही देखने समझने की ज़रूरत बनी हुई है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सेना की दो महिला अधिकारी नज़र आती हैं, जिनमें से एक का नाम कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी होता है। इसके बाद मध्य प्रदेश के एक मंत्री का बेहद शर्मनाक बयान सामने आता है जिसमें वह कर्नल सोफ़िया को ‘आतंकियों की बहन’ तक कह देने में गुरेज़ नहीं करते। एक और सोशल मीडिया पोस्ट आता है, हरियाणा स्थित अशोका विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर अली ख़ान महमूदाबाद का। इसमें वह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के अर्थों की पड़ताल करते हैं और भारत के सांप्रदायिक माहौल का जायज़ा लेते हुए निष्कर्षत: यह कहते हैं कि सेना की इस प्रेसवार्ता ने फिर साबित किया कि भारत अपनी विविधता के बावजूद एक भारत है और यह विचार अभी पूरी तरह मरा नहीं है।

अब होता यह है कि मप्र सरकार के मंत्री विजय शाह के ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय स्वत: संज्ञान लेते हुए उनके बयान को ‘गटरछाप भाषा’ बताता है, देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता पर ख़तरा क़रार देता है और मप्र पुलिस को निर्देश देता है कि तत्काल मंत्री जी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की जाये और गिरफ़्तारी हो। लेकिन पुलिस कमज़ोर धाराओं में एफ़आईआर दर्ज करती है। उच्च न्यायालय फिर फटकारता है। इस बीच, मप्र में मुख्यमंत्री आवास तक बैठकों का दौर चलने की ख़बरें आती हैं लेकिन सरकार या भारतीय जनता पार्टी अपने मंत्री पर किसी तरह की कार्रवाई करने से परहेज़ ही करती है।

अब होता यह है कि इन मंत्री जी की गिरफ़्तारी पर सुप्रीम कोर्ट से रोक के आदेश​ मिल जाते हैं और मप्र पुलिस के कुछ अफ़सरों की एक जांच समिति बना दी जाती है जो जांच के बाद यह तय करेगी कि कार्रवाई हो या नहीं या किस तरह हो।

अब दूसरा मामला, डॉ. अली ख़ान महमूदाबाद का। इनकी पोस्ट अब तक फ़ेसबुक पर दिख रही है। मूलत: अंग्रेज़ी में लिखी गयी पोस्ट का आशय समझना कोई कठिन काम नहीं है। एक टूटा फूटा ही सही, हिंदी अनुवाद तो फ़ेसबुक ही करके दे देता है। 8 मई की इस पोस्ट पर 12 मई को हरियाणा राज्य महिला आयोग द्वारा नोटिस जारी किया जाता है। इसके बाद भारतीय जनता युवा मोर्चा के हरियाणा प्रदेश महासचिव और सोनीपत ज़िले के एक सरपंच योगेश जाथेड़ी पुलिस में शिकायत दर्ज करवाते हैं। अंजाम यह होता है कि अली को गिरफ़्तार कर लिया जाता है और पोस्ट लिखने पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह और धार्मिक भावनाएं भड़काने जैसे गंभीर आरोपों में मुक़दमा दर्ज होता है।

क्या वाक़ई ख़तरनाक है पोस्ट?

जिन मामलों में पुलिस ने मुक़दमा क़ायम किया है, उनमें 7 साल क़ैद से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा का प्रावधान है। तो सवाल खड़ा होता है कि क्या वाक़ई अली ख़ान ने ऐसा कुछ ख़तरनाक लिख दिया कि उन पर इतनी गंभीर कार्रवाई हो? अली ख़ान की पोस्ट के पक्ष में अनेक बुद्धिजीवी और स्वतंत्र पत्रकार खड़े हुए हैं।

पत्रकार प्रेम पणिक्कर के शब्द देखिए : ‘महमूदाबाद की पोस्ट उतनी ही राजद्रोही थीं, जितना कोई योग कैम्प या रिट्रीट। उन्होंने सेना की रणनीति को सराहा, कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी जैसी महिला अधिकारियों को देश को ब्रीफ़ करने के लिए प्रशंसा की, लेकिन- हाय! इसी के साथ ये सुझाव भी दे दिया कि भारत को अपनी छवि को मॉब लिंचिंग के पीड़ितों के लिए वास्तविक न्याय के साथ जोड़ना चाहिए।’

इसके अलावा, अन्य पत्रकारों के वीडियो और रिपोर्ट्स भी इस मामले में देखी, पढ़ी जा सकती हैं। सबसे अच्छा तो यही है कि 8 और 11 मई को लिखे गये अली के दोनों पोस्ट फ़ेसबुक पर पढ़ लिये जाएं। इनको पढ़कर कॉमन सेंस सहज ही कहता है कि इनमें आपत्तिजनक क्या है! यह भी ग़ौरतलब है कि म​हिला आयोग की जिन रेणु भाटिया ने अली पर गंभीर आरोप लगाये, शिकायतें दर्ज कीं, टीवी डिबेट में वह मिनटों तक इसी सवाल का कोई ढंग का उत्तर नहीं दे सकीं कि ‘अली की पोस्ट में आपत्तिजनक क्या है?’

पत्रकार बिरादरी के बीच चर्चा यह भी है कि एक तरफ़ आप कर्नल सोफ़िया को सेना को चेहरा बनाकर पेश करने से अपनी छवि को धर्मनिरपेक्ष बताने की कवायद करते हैं और दूसरी तरफ़ अली को बेवजह गिरफ़्तार करके ख़ुद ही इस छवि का सत्यानाश कर देते हैं। दूसरी चर्चा यह भी कि एक तरफ़ आप ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की कामयाबी का ढिंढोरा पीटने के लिए दुनिया भर में एक शिष्टमंडल भेज रहे हैं, जो भारत की छवि का गुणगान करेगा लेकिन क्या इस तरह की ख़बरें दुनिया भर में नहीं जा रही हैं!

— आब-ओ-हवा डेस्क

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