
- May 28, 2025
- आब-ओ-हवा
- 4
आपके आधे घंटे का पूरा नुक़सान,'गांधी: अ पर्सपेक्टिव'
नयी पीढ़ी का एक बालक महात्मा गांधी से चिढ़ता है। चिढ़ता भी क्या है बल्कि धारणाग्रस्त हो चुका है। किशोरावस्था में ही। उसका कहना है कि हम दोस्तों के बीच काफ़ी डिस्कशन हो चुका है और मुझे गांधी बिल्कुल पसंद नहीं हैं। इस बालक के मामा, गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। वह बालक से कहते हैं कि तुम गांधी को पसंद नहीं करते क्योंकि तुम उन्हें जानते नहीं। जानोगे, समझोगे तो नापसंद नहीं करोगे।
यहां से दोनों के बीच एक संवाद शुरू होता है। बालक के सवाल और मामा के जवाब। उदाहरण के लिए पहला सवाल यह कि गांधीजी को वाक़ई देश से प्यार था तो वह विदेश गये ही क्यों थे? ऐसे सवालों-जवाबों के ताने-बाने में गांधी की जीवनी को एक कैप्सूल में दिखाया जाता है। क्लाइमेक्स यह कि बालक मामा के गांधीवादी एक्टिविज़्म से जुड़ जाता है। तक़रीबन आधे घंटे के इस डॉक्यु-ड्रामा में शायद ही ऐसा कोई तथ्य या विचार या भाव आपके हाथ लगे, जिसे आप पहले से नहीं जानते थे।
जो बालक यहां से अपनी चिढ़ शुरू कर रहा है कि ‘बहुत डिस्कशन कर चुके हम लोग’, उसे आधारभूत जानकारियां तक नहीं हैं। गांधी की पॉकेट साइज़ जीवनी भी नहीं पढ़ रखी इन बच्चों ने और अपनी एक धारणा बना चुके हैं। मामूली-से सवालों के मामूली-से जवाबों से उसकी धारणा टूट भी जाती है और हृदय परिवर्तन हो जाता है।
इस तरह की फ़िल्म पर कुछ भी लिखकर मैं क्यों अल्फ़ाज़ बर्बाद कर रहा हूं? इसे पढ़कर आप क्यों अपना समय ख़राब करें? ज़ाहिर है यह शॉर्ट फ़िल्म किसी न्यूकमर ने बनायी होती तो उस बेचारे का करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया होता। लेकिन यह फ़िल्म बनायी है सुभाष घई साहब ने। अभिनेता हैं मनोज बाजपेयी साहब। इसलिए कुछ बातें ज़रूरी हो जाती हैं।
पिछले कुछ समय में इतिहास और जीवनियों को परदे पर दिखाने वाला जो रद्दी सिनेमा चर्चा में रहा है, यह शॉर्ट फ़िल्म रद्दी के उसी ढेर में इज़ाफ़ा है। कुछ साल पहले सुभाष घई ने ‘गांधी: अ पर्सपेक्टिव’ नाम की यह फ़िल्म बनायी थी, अपने यूट्यूब चैनल से 8 मई 2025 को जारी की है और बताया है कि इसे दूरदर्शन के ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म के लिए बनाया गया। यह भी कि भारतीय अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सव में प्रदर्शित भी की जा चुकी है। नाम के विपरीत फ़िल्म में कोई पर्सपेक्टिव तो दूर ओपिनियन तक नहीं उभरता, सिर्फ़ एक फ़ाउंडेशन क्लास जैसी फ़ीलिंग आती है। सुभाष घई किसी अच्छे इतिहास टीचर की क्लास ही अटेंड कर लेते तो शायद उन्हें मिडिल क्लास लेक्चरनुमा इस फ़िल्म को बनाने का बेहतर आइडिया मिल सकता था।
यक़ीन मानिए यह स्क्रिप्ट लेकर कोई नया, संघर्षशील लेखक किसी निर्माता निर्देशक के पास जाता, तो हंसी उड़ाकर उसे स्टूडियो से निकाला जाता। लेकिन आप सुभाष घई हैं तो आपको सिर पर बैठाया जा सकता है। वास्तव में, इस तरह की फ़िल्में या तो फ़ंड के नाम पर जन-धन का दुरुपयोग हैं या फिर इस क्वालिटी की फ़िल्मों को संरक्षण एवं सम्मान दिया जाना मानसिक दिवालियेपन का सबूत है।
यक़ीन मानिए इतना बजट दे दिया जाये तो शायद इससे बेहतर फ़िल्म स्कूल के बच्चे बनाकर दे सकते हैं। सिस्टम की शह पर या सरकारें सीधे फ़िल्में बनवा तो रही हैं लेकिन यह सिनेमा न तो ठीक तरह से डॉक्युमेंटेशन करने में सफल हो पा रहा है, न विशुद्ध मनोरंजन और न किसी तरह के सिनेमैटिक एक्सप्रेशन/आर्ट या डिस्कोर्स के संदर्भ में ही काम का है। बचपन-सी मासूमियत अलग बात होती है और बचकाना होना अलग। सिने-कला में यह ट्रेंड एक बचकानापन है, बस।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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आपकी टिप्पणी बिल्कुल सही है।
बहुत सटीक समीक्षा है। लेख में सत्य को बिना घुमाए फिराए रख देना आपकी लेखनी की ताकत को बखूबी दर्शाता है।
आशीर्वाद और शुभ कामनाऍ
समीक्षा अपनी हेडलाइन से आकर्षित करती है. आपकी नज़र, समझ और लेखन सभी सहज और उत्कृष्ट हैं. यह ज़रूरी है कि क्या ना देखा जाये भी पता हो.
धन्यवाद और स्नेह