
- September 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 6
(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे.. मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। साप्ताहिक पेशकश हर सोमवार आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'.. इस बार प्रकृति और पर्यावरण का मंत्र बन गयी, अनुपम मिश्र कृत बहुचर्चित किताब को आभार -संपादक)
सोनू यशराज की कलम से....
'आज भी खरे हैं तालाब' बस किताब नहीं, जीने का मंत्र-साझा परंपरा
किताबें कभी नहीं पूछती
तुम्हारे दुनियावी रिश्तों का गणित
न जात पूछती हैं
न ही रखती हैं स्त्री पुरुष के खाँचे में
ये जिल्द और बिना जिल्द वाली किताबें
कभी नहीं बँधी सामाजिक दायरे में
फिर भी बाँधती हैं अपने मोहपाश में
किताबों के साथ अकेला कहां होता है आदमी!
जिस किताब का ज़िक्र करने जा रही हूँ उसके लेखक या प्रकाशक के पास उस किताब का कॉपीराइट नहीं है। आप बेझिझक इसके अंश या पूरी किताब का उपयोग कर सकते हैं। यह मात्र किताब नहीं बल्कि जल-सुरक्षा और प्रबंधन पर महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इस किताब को वर्ष 2011 में जमनालाल बजाज पुरस्कार मिल चुका है। सांस्कृतिक, पर्यावरणीय चेतना से सराबोर यह किताब सर्वत्र उपलब्ध है। इसके बावजूद किताब के न जाने कितने संस्करण छप चुके हैं और छप रहे हैं। ये किताब 19 भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। इसके रचनाकार कोई नामचीन लेखक नहीं, एक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् थे। किताब का नाम है “आज भी खरे हैं तालाब”, लेखक हैं अनुपम मिश्र। प्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र के सुपुत्र अनुपम मिश्र ने भारत के अनेक गाँवों की यात्रा और आठ वर्षों के शोध से यह जाना कि बरसों पहले हज़ारों की संख्या में बने तालाब निर्माण शासन नहीं जनमानस का उपक्रम था।
किताब की शुरूआत में एक छोटी-सी कहानी है- बहुत समय पहले की बात है, हुआ यूं कि एक किसान को अपने खेत की जुताई के समय एक पत्थर मिला, जिसे छुआते ही उसके फावड़ा, कुल्हाड़ी सोने के हो गये। हतप्रभ किसान पत्थर लेकर दौड़ता हुआ राजा के पास गया। पर आश्चर्य, राजा ने वह पत्थर लेने से इनकार करते हुए कहा, इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना। तालाब खुदवाना। फिर क्या था… तालाब निर्माण सांस्कृतिक सामाजिक सजगता का, अच्छे अच्छे काम का हिस्सा बन गया और यह परंपरा चल पड़ी।

जीवन की मूलभूत आवश्यकता है पानी, उसके संचयन से अच्छी बात भला क्या हो सकती थी। जगह-जगह सैकड़ों, हज़ारों तालाब बनने लगे। वरुण देवता का प्रसाद हर गाँव अपनी अंजुलि में भर लेता था। यानी बरखा की हर बूँद सहेजने का उपक्रम। गाँव, शहर, राज्य, रियासत सबने तालाब बनाकर अपनी ज़रूरत का पानी बरखा से इकट्ठा कर लिया था। भारत भर में बेजोड़ तालाबों की भव्य परंपरा थी। किताब आंकड़ों की भाषा बताती है-आषाढ़ से भादो तक 11-12 लाख तालाब भर जाते थे। तालाबों से जुड़े तमाम शब्द, तालाब की संरचना, बनाने की तकनीक और बनाने वाले अनाम नायक और फिर इस सहेजने की विरासत को, तालाबों को देखते-देखते अपने क्षुद्रपने, अज्ञान और बेरुख़ी से बिसरा देने की कहानी इस किताब का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।
सैकड़ों, हज़ारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की। ये इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा, हज़ार बनाती थी। पिछले दो-सौ बरसों में नये क़िस्म की थोड़ी-सी पढ़ाई पढ़ गये समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हज़ार को शून्य ही बना दिया।
यह किताब जनमानस की आस्था, ‘अनपढ़’ लोगों की आकाश से बरसी पानी की हर बूँद को सहेजने की कला-कौशल की कहानी है। चिपको आंदोलन, गाँधीवादी विचारधारा से जुड़े अनुपम मिश्र ने कई वर्षों तक देश भर के गाँव-देहात घूमकर हमारी धरोहर, परम्परागत तालाब, जल सहेजने के कौशल को परखा और इस किताब की रचना की।

किताब का असीम-अनंत प्रभाव
1993 में किताब के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जलस्रोतों को बचाने की बहस चली, जगह-जगह बिखरे तालाबों की लोगों ने खोज-ख़बर लेनी शुरू की। मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह की संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के कलेक्टर बी.आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, ‘अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।’ श्री नायडू की ये मामूली अलख सागर ज़िले के 1000 तालाबों को निरंजन कर गयी… ऐसी ही एक और अलख के कारण शिवपुरी ज़िले के लगभग 340 तालाबों की सुध ली गयी। मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटीं।
गुजरात में
पानी के लिए तरसते गुजरात के भुज के हीरा व्यापारियों ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपने पूरे क्षेत्र में जल-संरक्षण की मुहिम चलायी। पुस्तक से प्रेरणा पाकर पूरे सौराष्ट्र में ऐसी अनेक यात्राएँ निकाली गयीं। पानी बचाने के लिए सबसे दक्ष माने गये राजस्थान के समाज को भी इस पुस्तक ने नवजीवन दिया। राजस्थान के प्रत्येक कोने में पुस्तक के प्रभाव के कारण सैकड़ों जल-यात्राओं के साथ-साथ हज़ारों पुरातन जल-स्रोत सँभाले गये। ऐसी अनेक यात्राएँ आज भी जारी हैं… जयपुर ज़िले के ही सालों से अकालग्रस्त लापोड़िया गाँव ने इस पुस्तक को आत्मा में बसाया। लापोड़िया गाँव ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर न केवल अपनी जलगाहें बचायीं, बल्कि अपने प्रदेश की चारागाहें तथा गोचर भी बचाये। लापोड़िया के सामूहिक प्रयासों का नतीजा यह रहा कि आज 300 घरों का लापोड़िया, जयपुर डेयरी को चालीस लाख वार्षिक का दूध दे रहा है। जल-जंगल संरक्षण के ऐसे ही आंदोलनों से लापोड़िया को लक्ष्मण सिंह जैसा नेतृत्व क्षमता वाला नायक मिला। उनकी इन्हीं क्षमताओं के कारण आज लापोड़िया के आसपास के 300 गाँव अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। शहरों की ओर पलायन में निरंतर गिरावट आयी है।
उत्तराखंड में
पुस्तक का प्रभाव उत्तरांचल में भी हुआ। यहाँ पौड़ी-गढ़वाल के उफरेखाल क्षेत्र के दूधातोली लोक विकास संस्थान के श्री सच्चिदानंद भारती ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर पहाड़ी क्षेत्रों की विस्तृत चालों (पानी बचाने के लिए पहाड़ी तलाई) को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। इस दौरान पिछले 13 सालों में उन्होंने 13 हज़ार चालों को बचाया-बनाया। वहाँ हरियाली बढ़ी।
कर्नाटक में
ग़ैर-हिंदी भाषी राज्य कर्नाटक में इस पुस्तक का सीधा प्रभाव राज्य सरकार पर पड़ा। कर्नाटक सरकार ने तालाब बचाने का काम सीधे अपने ही हाथ में ले लिया और वहाँ एक ‘जल संवर्धन योजना संघ’ बनाया गया तथा विश्व बैंक की मदद से पूरे राज्य के तालाब बचाने की योजना तैयार की गयी। इनफोसिस कंपनी के श्री नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने इस पुस्तक का कन्नड़ में अनुवाद किया और 50 हज़ार प्रतियाँ छपवाकर कर्नाटक की प्रत्येक पंचायत में भिजवाने की योजना बनायी।
बंगाल में
जहाज़ से हथियार गिराये जाने के बाद पुरुलिया नामक कस्बे की एक घुमक्कड़ पत्रकार निरुपमा अधिकारी वहाँ के एक अकाल क्षेत्र का दौरा करती-करती अचानक हरियाली देख हैरान हो गयीं। गाँव वालों से पता चला कि कुछ तालाब ज़िंदा थे, इसलिए वहाँ धरती के भीतर की नमी अभी शेष थी। तालाबों की उपयोगिता जानती निरुपमा को एक मित्र ने यह पुस्तक भेंट की। निरुपमा का जीवन पुस्तक पढ़ते-पढ़ते बदलता गया। रोज़ी-रोटी का पक्का प्रबंध न होने के बावजूद निरुपमा ने इसका बांग्ला अनुवाद किया। अब इस अनुवाद का दूसरा संस्करण भी छप चुका है।
वितरण और अनुवादों की लड़ी
महाराष्ट्र में कभी जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव रह चुके औरंगाबाद के प्रसिद्ध इंजीनियर माधव चितले ने इस पुस्तक का मराठी अनुवाद किया। भूकंप में ध्वस्त हो चुके गुजरात में भी इस पुस्तक का अनुवाद किया गया। श्री दिनेशभाई संघवी ने पुस्तक का अनुवाद किया तथा गुजराती समाचार पत्र ‘जन्मभूमि प्रवासी’ ने इसे धारावाहिक रूप में छापा। पंजाबी अनुवाद ‘तरकश’ नामक पत्रिका में शुरू हुआ। फिर इसका एक संक्षिप्त पंजाबी संस्करण छपा जो मुफ़्त बाँटा गया। कुछ वर्षों बाद इसके अनुवाद के साथ पंजाब के सुख-दुख जोड़कर एक पुस्तक की शक्ल दी गयी।

इस नये अनुवाद का व्यापक प्रभाव रहा। पंजाब के साहित्यकारों, आलोचकों, लोकगायकों, सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ प्रमुख संतों, यहां तक कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों पर भी इसका ख़ासा प्रभाव पड़ा। पंजाबी अनुवाद का श्री गुरुनानक देव जी की नदी का उद्धार करने वाले संत बलवीर सीचेवाल जी ने बेहद रचनात्मक उपयोग किया। वे अब नदी किनारे होने वाले वार्षिक साहित्यिक सम्मेलनों में पुस्तक ख़रीद कर रचनाधर्मियों को भेंट करते हैं। पंजाब के लोकगायकों ने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अपने तरीक़े से जलस्रोतों को बचाने की मुहिम शुरू की है।
भारत ज्ञान-विज्ञान परिषद ने इसकी 25 हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ़्त में बांटी। मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग ने भी 25 हज़ार प्रतियाँ छापकर प्रदेश की प्रत्येक पंचायत तक पहुँचाया। भोपाल के शब्बीर क़ादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ़्त बाँटीं। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है। भोपाल के राज्य संसाधन केंद्र ने इसकी 500 प्रतियाँ 500 गाँवों में बाँटी। अहमदाबाद की ‘उत्थान माहिती’ नामक संस्था ने 500 प्रतियाँ छापकर सामाजिक संस्थाओं में मुफ़्त बाँटीं। नागपुर के स्वराज प्रकाशन ने 5000 प्रतियाँ छापकर मुफ़्त में बाँटी। बिहार के जमालपुर की संस्था ‘नई किताब’ ने भी इसकी 1100 प्रतियाँ बाँटी।
एक प्रेरणा बनती गयी किताब
देशभर के 16 रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट किया जा चुका है। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फ़िल्म भी बनी है। सीमा राणा की बनायी फ़िल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है।
गुजरात की एक संस्था ‘समभाव’ के श्री फ़रहाद कांट्रैक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री फ़रहाद राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, अलवर, जोधपुर, महाराष्ट्र तथा गुजरात के कई हिस्सों में पुराने जलस्रोतों को बचाने के एक विराट काम में जुटे हैं। गुजरात की ही श्रीमती डेज़ी कांट्रैक्टर ने इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद, फ्रांस की एक लेखिका एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया।
अनुपम यादें
पुस्तक के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में पानी की सँभाल में काफी तेज़ी आयी। अपने एक लेख में अनुपम विनोबा भावे की एक उक्ति दोहराते हैं जिसमें बिनोबा कहते हैं- ‘पानी जब बहता है तो वह अपने सामने कोई बड़ा लक्ष्य, बड़ा नारा नहीं रखता, कि मुझे तो बस महासागर से ही मिलना है। वह बहता चलता है। सामने छोटा–सा गड्ढा आ जाये तो पहले उसे भरता है। बच गया तो उसे भरकर आगे बढ़ चलता है। छोटे–छोटे ऐसे अनेक गड्ढों को भरते–भरते वह महासागर तक पहुंच जाये तो ठीक। नहीं तो कुछ छोटे गड्ढों को भरकर ही संतोष पा लेता है। ऐसी विनम्रता हम में आ जाये तो शायद हमें महासागर तक पहुंचने की शिक्षा भी मिल जाएगी।’ अनुपम मिश्र ज़िंदगी भर इन्हीं आदर्शो पर चलते रहे।

अनुपम मिश्र के लिए दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी ने 1993 के अपने एक लेख में जो लिखा था वह आज उनके जाने के बाद और भी प्रासंगिक हो उठा है– ‘पर्यावरण का अनुपम, अनुपम मिश्र है। उसके जैसे व्यक्ति की पुण्याई पर हमारे जैसे लोग जी रहे हैं. यह उसका और हमारा, दोनों का सौभाग्य है।’
अशोक वाजपेयी जी ने एक जगह कहा है- “अनुपम मिश्र एक अत्यन्त विनम्र, निरभिमानी व्यक्ति थे जिन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में साधारण और सामुदायिक विवेक और विधि का जैसा अवगाहन किया वैसा आधुनिक टेक्नॉलॉजी के दुश्चक्र में फँसे अन्य पर्यावरणविद् अक्सर नज़रन्दाज़ करते रहे हैं। अनुपम जी लगभग ज़िद कर अपनी इस धारणा पर डटे रहे कि साधारण लोग और समुदाय पढ़े-लिखों से ज़्यादा जानता-समझता है और आधुनिकता को अपनी सर्वज्ञता के दम्भ से मुक्त हो सकना चाहिए।”
अनुपम मिश्र के पूरे भारत भर में जल संचयन के लिए किये गये प्रयासों और सलाहों का ही असर है कि मरुभूमि में मेघ ख़ूब बरस रहे हैं और जनचेतना के स्वर भी। पुनः तालाबों का पुनरुद्धार हो रहा है।
शुक्रिया किताब!!
इस किताब ने कॉलेज के दिनों से ही मुझ पर असर डाला और मैं व्यक्तिगत प्रयासों से जनमानस के हित ओर अन्य सामाजिक कार्यों की ओर उन्मुख हुई। इस किताब ने मुझे पर्यावरण के प्रति और सजग किया कि साहित्य में आने के बाद मेरा ध्येय वाक्य बना- जो लिखा गया पहले, मैं क्यों लिखूँ… एक पेड़ का उधार पहले से है। मेरे कानों में आज भी इस किताब का यह स्वर गूंजता है: “अच्छे-अच्छे काम करते जाना।”
(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी.. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव – संपादक)

सोनू यशराज
साहित्यकार और सूचना शिक्षा संचार सलाहकार। 'पहली बूंद नीली थी' चर्चित काव्य संग्रह है। कविताओं का आधा दर्जन से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। ग्वालियर सेंट्रल लाइब्रेरी की डॉक्युमेंट्री में आपकी कविता शामिल हुई। 'साहित्य तक' में आपकी कविताओं का वाचन। अनेक पत्र पत्रिकाओं, ब्लॉग, चैनलों, आकाशवाणी आदि माध्यमों से कविता, कहानी, लेख, डायरी आदि का प्रसारण। और प्रतिष्ठित सम्मान भी आपके खाते में हैं।
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Valuable as well as Inspirational..
बेहतरीन लिखा । पुस्तक प्रेरणा बन कर खुद को सार्थक कर रही ।
शुभकामना सोनू …
बेहद रोचक और प्रेरणास्पद!आज भी खरे हैं तालाब” किताब पढ़ी थी पर उसके सम्बन्ध में इतना नहीं पता था। न ही उसके व्यापक प्रभाव की जानकारी थी। इस लेख ने नई दृष्टि दी है और उसपर जो भाषा सौष्ठव के साथ लेख का लयबद्ध प्रवाह है वह अदभुत है। साधुवाद
बहुत ही सुंदर प्रेरणादायी आलेख. नहीं पता था कि एक किताब हिंदुस्तान के समाजों को इतना उद्वेलित कर सकती है.
यह पुस्तक भी एक जादुई पत्थर सा करिश्मा है जिसने लाखों लोगों को प्रभावित किया और जन/जलसेवा के लिए प्रेरित किया है।
किताब के अनुवादों और व्यापक प्रसार,वितरण उसके प्रभाव से कहाँ कितना परिवर्तन हुआ इसका आँकड़ों सहित बारीकी से विवरण भी किताब जितना ही प्रभावी और रोचक है।
अनुपम मिश्र जी की किताब”आज भी खरे हैं तालाब” मैंने नहीं पढ़ी है, लेकिन सोनू यशराज जी ने जिस प्रकार इस किताब पर एक शोधपरक आलेख तैयार किया है, उसे पढ़कर मैं अभिभूत हूं। यह किताब 19 भाषाओं में अनूदित हुई हैं और इसका प्रभाव इतना गहरा और।अच्छा हुआ है कि लोग पर्यावरण के प्रति बहुत अधिक सजग हुए हैं।
अनुपम जी ने जल संचयन के लिए इतने अच्छे प्रयास किए हैं कि कई संस्थाओं और राज्यों में तथा पर्यावरण प्रेमियों में जल संचयन करने का केवल जज़्बा ही नहीं पैदा हुआ,।बल्कि वे इस दिशा में खूब काम कर रहे हैं जो काबिले तारीफ है।
अनुपम मिश्र जी की इस किताब की कई हजारों प्रतियां छापी गईं और लोगों को मुफ्त में बांटी गई, जिससे कि समाज में जल संचयन के लिए जागरूकता बढ़े।
इससे अच्छा प्रचार प्रसार का तरीका हो नहीं सकता।
अनुपम मिश्र जी की इस किताब की इतनी बढ़िया जानकारी
उपलब्ध कराने के लिए सोनू यशराज जी को ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।