
- July 18, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
आप जैसा कोई: आपको कहां पहुंचाती है फ़िल्म?
हाल ही “आप जैसा कोई” नाम की हिन्दी फ़िल्म नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुई है, जो चर्चा में भी है। फ़िल्म में मुख्य किरदारों में उम्दा कलाकारों ने काम किया है- आर. माधवन, फ़ातिमा सना शेख आदि।
दरअसल यह फ़िल्म जेंडर के लेंस से तकनीक-आधारित रिश्तों, प्रेम और कामुक इच्छाओं को देखती है। इसकी पृष्ठभूमि में हमारे समाज में लड़के-लड़कियों के मेल-जोल, दूसरे जेंडर से झिझक, आत्मविश्वास की कमी जैसे विषय रखे गये हैं.
ये मुद्दे समाज के लिए परिचित हैं। साथ ही दर्शक इन मुद्दों से पिछले कुछ समय के दौरान आयी फ़िल्मों के कारण भी भली-भाँति परिचित हो गये हैं।
रोमांस, टेक्नॉलजी और शादी का कन्फ़्यूज़न – यह नया संयोजन है, जिस पर पिछले कुछ समय में लगातार फ़िल्में बनी हैं। यह विषय जितना सन्दर्भित और ज़रूरी है, फ़िल्मों में उतना ही कम गहराई के साथ उतारा जा रहा है। ‘आप जैसा कोई’ देखते हुए कभी आपको ‘रॉकी और रानी’ याद आएगी, कभी ‘मसान’, कभी ‘तनु वेड्स मनु’ और कभी ‘मीनाक्षी सुंदरेश्वर’। याद आने के कारण भी कई हैं- कहीं अदायगी, कहीं फ़िल्म की ज़मीन, कहीं ट्रीटमेंट और कहीं सिनैमटोग्राफ़ी।
फ़िल्म की गति को धीमा करके उसको जबरन कलात्मक बनाने की कोशिश करना, एक प्रचलित टूल बन गया है। पर उस गति पर पहले से काफ़ी सधी हुई फ़िल्में जैसे ‘अक्टूबर’, ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘मसान’, ‘थ्री ऑफ़ अस’ बन चुकी हैं। इनमें पहले से कैमरा के रुकने, टिकने और पेंटिंग जैसा सीन दिखाने को बख़ूबी सराहा जा चुका है।
माना कि विषय और भावनाएं एक सीधी रेखा जितने सरल और सहज नहीं हैं पर किसने कहा कि कला, सिनेमा और उसका ट्रीटमेंट भी उतना ही पेचीदा दिखाना ज़रूरी है!
सालों से अच्छे सिनेमा का लक्षण है कि वह इकहरे ट्रीटमेंट न करते हुए भी ज़ेह्न को आधा-अधूरा, ख़ाली और कन्फ़्यूज़्ड नहीं छोड़ता है। दर्शक एक पेचीदा विषय देखने के बाद भी तृप्त, एक तरफ़ और ख़ुश लौटा है, भले ही एंड ख़ुशनुमा न रहा हो।
“आप जैसा कोई” एक ऐसी फ़िल्म है, जो भले ही अपने सुखद एंड तक पहुँची हो लेकिन दर्शक को कहीं नहीं पहुँचाती। आप शायद अंत में ख़ाली ही रह जाएं। यह एहसास आपको बीच बीच में भी शायद आता रहे। पिक्चर उतना पकड़ ही नहीं पाती कि आप पात्रों के साथ उनके सफर पर चलें।
अदाकार सभी मंझे हुए हैं। उनकी ऐक्टिंग में कमी भी न लगे ब्लकि कुछ भाव कभी-कभी नये भी मिलें लेकिन कहानी ही शायद इतनी गहरी नहीं उतारी गयी कि आपको थाह मिले।

आकांक्षा त्यागी
अपने करियर में पहले क़रीब 10 वर्ष पत्रकार रहीं आकांक्षा पिछले क़रीब 15 वर्षों से शिक्षा में नवाचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। शोधकर्ता और ट्रेनर के रूप में वह राष्ट्रीय स्तर तक के प्रोजेक्ट लीड कर चुकी हैं। वर्तमान में एलएलएफ़ के साथ बच्चों की शिक्षा से जुड़े विषयों पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। साहित्य, कला और सिनेमा में गहरी रुचि रखती हैं और गाहे ब गाहे सरोकार से जुड़े विषयों पर लेखन में भी।
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प्रभावी समीक्षा।
अच्छा लिखा
अच्छी समीक्षा. मुझे भी फिल्म देख कर थोड़ी निराशा हुई