
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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विवेक सावरीकर 'मृदुल' की कलम से....
आत्मा को झकझोरता 'नवरंग' का वो प्रेरक गीत
वर्ष 1959 में प्रदर्शित शांताराम बापू की सदाबहार फिल्म ‘नवरंग’ यूं तो एक कल्पनाशील कवि दिवाकर उर्फ़ नवरंग के अपनी पत्नी जमुना से कल्पना लोक में मिलन पर आधारित प्रेम कविताएं लिखने और दूसरी ओर वास्तविक जीवन के संघर्ष करने की सांगीतिक कहानी है। पर इस कहानी के पार्श्व में अंग्रेज़ों के आगमन के बाद देश में शुरू हुए पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण पर भी सांकेतिक किंतु तीक्ष्ण प्रहार है। इसके पहले दृश्य में आम जनता पर अंग्रेज़ी हुकूमत के आतंक को बेहद प्रभावी ढंग से चित्रित किया गया है। लेकिन इससे भी ज़्यादा शांताराम बापू ने यह बताने कि कोशिश की है कि कैसे लोग दूध की दुकान में जाना छोड़कर शराब की दुकान में जाने लगे, कैसे रामलाल पन्नालाल कपड़े की दुकान का बोर्ड बदलकर अंग्रेज़ी में रामलाल एंड ब्रदर्स हो गया और कैसे धोती और कमीज़ पर टाई बंधवाने में भारतीय बाबू गर्व महसूस करने लगे थे। इसी दृश्य में एक बूढ़ा कवि गोरों के हाकिम से अपना गीत सुनकर कुछ इनाम लेने का निवेदन कर रहा है। पर इनाम के बदले में उसे घोड़े की दुलत्ती मिलती है। बुरी तरह से लतियाने के बाद घुड़सवार बेशर्मी से हंसते हुए कहता है- राजा-नवाबों की कहानियां सुनाने वालों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा, क्योंकि अब रानी का राज आया है, अंग्रेज़ रानी का… और अचानक बूढ़ा कवि अपनी लाचारी की सीमा से बाहर निकल भरत व्यास के शब्दों में लरज़ते हुए गा उठता है-
न राजा रहेगा, न रानी रहेगी
ये दुनिया है फ़ानी और फ़ानी रहेगी
न जब एक भी ज़िंदगानी रहेगी
तो माटी सभी की कहानी कहेगी
इस गीत के लिए पं. भरत व्यास की जितनी प्रशंसा की जाये कम होगी। जब गीत में अंग्रेज़ों का सिपाही कहता है कि स्वतंत्रता संग्राम नहीं, वो म्युटिनी (ग़दर) थी, यही इतिहास कहता है। तब बूढ़े कवि की गर्जना को महेंद्र कपूर ने बड़े ही आक्रोश में भरकर व्यक्त किया है-
जला दो ये इतिहास झूठे तुम्हारे
यहां ज़र्रे ज़र्रे पे सच है लिखा रे
ज़ुलम वो तुम्हारे, सितम वो तुम्हारे
करो याद उफ़ कारनामे वो कारे
कि पत्थर से आंसू की धारा बहेगी
उल्लेखनीय है बतौर पार्श्व गायक महेंद्र कपूर का पहला गीत “आधा है चंद्रमा रात आधी” इसी फ़िल्म से था। लेकिन फ़िल्म के अपने पहले गीत में उन्होंने अपनी आवाज़ में एक बुज़ुर्ग गायक का जैसा प्रभाव पैदा किया है, उसका सानी नहीं। संगीतकार सी. रामचंद्र ने इस फ़िल्म में विलक्षण संगीत दिया है, जिसके उदाहरण में “तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां” का ज़िक्र ही काफ़ी होगा। पर “ये माटी सभी की कहानी कहेगी” में संगीतकार ने धुन का स्वरूप सुस्वर काव्य पाठ की तरह का रखा है। इसलिए हर अंतरे का आवेश आरोही क्रम में है और अंतिम पंक्तियों में ज़रूर थिएटर हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट सुनायी देती होगी-
इस माटी के नीचे दबी हैं कथाएं
ये ख़ुद ही कहेंगी रे तुम क्या कहोगे
महिपाल जिन्होंने दिवाकर याने कवि नवरंग का मुख्य किरदार निभाया है, उनको इस पहले दृश्यबंध में ज़रा जीर्ण लेकिन स्वाभिमानी बूढ़े के गेटअप में दिखाया गया है। मदर इंडिया की नर्गिस की याद आ जाती है। महिपाल के भाव बहुत ही गहरे हैं और उनकी आंखों में गोरों के प्रति नफ़रत साफ़ नज़र आती है। लिप सिंक बहुत अच्छा तो नहीं हुआ है, पर गीत और संगीत का सम्मोहन इतना तगड़ा है कि दर्शक का रसभंग नहीं होता।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
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