
- August 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
भवेश दिलशाद की कलम से....
हिंदी में पढ़िए डब्ल्यू.एच. ऑडेन रचित कविता 'बंटवारा'
15 अगस्त से पहले हर बार 14 अगस्त आता है और स्वतंत्रता जिस क़ीमत पर मिली, वह विभाजन हमेशा दिल को ज़ार-ज़ार करता है। भारत-विभाजन के विषय पर सरहद के दोनों तरफ़ प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा गया। इस विषय पर कथा साहित्य तो बेहद प्रसिद्ध भी रहा है। कम ही जानते हैं कि अंग्रेज़ी में भी इस विषय पर साहित्य सृजन होता रहा। किस तरह इंग्लैंड के एक वकील सीरिल रेडक्लिफ ने भारत और पाकिस्तान के सीमा विभाजन के काम को अंजाम दिया था, उस इतिहास को दर्ज करती एक कविता है ‘पार्टिशन’, जो विस्टन ह्यू ऑडेन (W. H. Auden) की कलम से दर्ज हुई थी। यह कविता, कविता कम दस्तावेज़ अधिक है। भारत-विभाजन की याद के मौक़े पर हिंदोस्तानी में इसका छंदोबद्ध अनुवाद, आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए विशेष रूप से…

बंटवारा
जिस दम पहुंचा लाम पर, लक्ष्य लिये प्रत्यक्ष
कम से कम वह दिख सका, तब तक तो निष्पक्ष
जिसे बांटने के लिए, पहुंचा रातो-रात
तिनका तक उस भूमि का, उसे नहीं था ज्ञात
दो फ़िरक़ों में था यहां, कितना कट्टर खेल
भोजन क्या भगवान तक, दोनों के बेमेल…
बातचीत और तर्क थे, समय गंवाते फेर
उससे फ़रमाया गया, ‘बहुत हो चुकी देर’
‘वक़्त नहीं है हाथ में’, लंदन की थी टेक
अलग करो बस बांट दो, हल था बस ये एक…
चिट्ठी वायसराय की, पहुंची उसके पास
मिलना-जुलना था नहीं, बड़े साब को रास
प्रबंध जो थे, पत्र में लिक्खे गये तमाम
‘एक अलग बंगला दिया, करें वहीं से काम
बंटवारे के काम में, चाहें अगर सलाह
हिन्दू-मुस्लिम चार जज, किये जाएं हमराह’…
…………..
कोठी में था बन्द वह, पुलिस गश्त दिन-रात
चप्पे-चप्पे पर नज़र, करे कोई ना घात
ख़ुद को उसने क़ैद कर, किया काम आग़ाज़
कोटि-कोटि जन भाग्य का, लिखता रहा बयाज़…
पर यह काम मज़ाक था, यानी बड़ा विचित्र
थे नक़्शों के नाम पर, अप्रचलित मानचित्र
साफ़ तौर पर थे ग़लत, आबादी के तथ्य
पर इतना कब था समय, जांचे जाते सत्य…
मौसम था उसके लिए बहुत गर्म दिन-रैन
उस पर पेचिश ने किया, लगातार बेचैन
हां-ना और अगर-मगर, बस कुल हफ़्ते सात
यूं सरहद तय हो गयी, इक लकीर के साथ
नक़्शा उसका काम था, नक़्शा उसकी टीप
भला-बुरा जो भी रहा, बंटा उप महाद्वीप…
…………..
अगले रोज़ जहाज़ में, बोरा बिस्तर लाद
वापस इंग्लिस्तान जा, हुई सांस आबाद
अच्छे वकील की तरह, रक्खा नहीं हिसाब
उसने जल्द भुला दिया, ख़ौफ़नाक हर ख़्वाब
लौटा होता यदि नहीं, फ़ौरन इंग्लिसतान
कहता था वो सहमकर, जाती उसकी जान.

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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धन्यवाद इस कविता को प्रस्तुत करने के लिए।
आपके इतने प्रभावशाली तथा छंदोबद्ध अनुवाद ने मजबूर किया अंग्रेज़ी की मूल रचना पढ़ने को, और अब मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपने इसे बेहतरीन तरीक़े से अंजाम दिया है!