
- February 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....
एआई की होड़, क्या आर्म्स रेस जैसी?
इन दिनों दुनिया की तमाम बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और विकसित देश मुख्य तौर पर दो क्षेत्रों में ख़र्च एवं निवेश कर रहे हैं। पहला रक्षा क्षेत्र और दूसरा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई)।
हर देश को अपनी सुरक्षा की चिंता है और इसी चिंता में देशों के डिफ़ेंस बजट बढ़ रहे हैं। भारत ने अपने हालिया बजट में रक्षा मद में क़रीब 15 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी की है। चूंकि रक्षा व सुरक्षा का मसला इतना संवेदनशील होता है कि इस पर कभी सवाल नहीं उठाये जाते। जो हालात हैं या जो हालात बना दिये जाते हैं, उनमें भारत जैसे देशों की ‘मजबूरी’ भी बन जाती है कि वे अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए बजट में इज़ाफ़ा करते चले जाएं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) की नवीनतम रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2024 में पूरी दुनिया को 679 अरब डॉलर के हथियार बेचे गये। यह राशि नीचे के क़रीब 85 फ़ीसदी देशों की कुल जीडीपी से भी अधिक है।
विकसित देशों और बड़ी कंपनियों की नज़र में डिफ़ेंस के बाद दूसरा सबसे उभरता हुआ क्षेत्र आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का है। सीएनबीसी की इसी पखवाड़े की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के चार बड़े दिग्गज- अल्फ़ाबेट, माइक्रोसॉफ़्ट, मेटा और अमेज़न इस साल अपने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ढांचे को मज़बूत करने के लिए कुल मिलाकर क़रीब 700 अरब डॉलर ख़र्च करने की तैयारी में हैं। यह भारी-भरकम निवेश महंगी चिप्स की ख़रीदी, बिजली आपूर्ति के लिए बिजलीघर बनाने, विशालकाय डेटा सेंटरों के निर्माण और उन्हें जोड़ने वाली नेटवर्किंग तकनीकों के विकास पर किया जाएगा।
यह राशि कितनी ज़्यादा है, इसका अंदाज़ा केवल इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि साल 2026-27 के लिए भारत का कुल बजटीय आवंटन ही क़रीब 644 अरब अमेरिकी डॉलर रहा है (53.47 लाख करोड़ रुपए)। यानी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी आर्थिक ताक़त का दम भरने वाले भारत के कुल बजट से भी ज़्यादा ख़र्च इन चारों अमेरिकी कंपनियों के हाइपरस्केलर्स, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के अपने-अपने बुनियादी ढांचों के विकास पर कर रहे हैं (हाइपरस्केलर एआई की डिक्शनरी का शब्द है। यह उन टेक यूनिट्स के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है, जो बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग, स्टोरेज़ और नेटवर्किंग सेवाएं देती हैं।)
क्या हथियार कंपनियां है प्रेरणा?
टेक कंपनियां आख़िर एआई पर इतना भारी-भरकम ख़र्च कर क्यों रही हैं? इसका जवाब पाने के लिए हमें फिर से रक्षा क्षेत्र पर होने वाले ख़र्च और उससे जुड़ी कंपनियों के मुनाफ़े को क़रीब से देखना होगा। सिप्री के मुताबिक सैन्य हथियार बनाने वाली दुनिया की 7 शीर्ष कंपनियों (इनमें 5 अमेरिकी और एक-एक ब्रिटेन व रूस की है) ने साल 2024 में कुल 270 अरब डॉलर के हथियार बेचे। सिप्री केवल हथियारों के कारोबार पर फ़ोकस करती है, कंपनियों को होने वाले नफ़े-नुक़्सान पर नहीं। लेकिन हम सहज बुद्धि से अनुमान लगा सकते हैं कि युद्धों के इस खेल में ये तमाम बड़ी कंपनियां मुनाफ़े का कितना बड़ा खेल करती होंगी।
तो क्या टेक दिग्गजों के लिए ये हथियार कंपनियां ही प्रेरणा की स्रोत हैं? ध्यान रहे, इन हथियार कंपनियों की बैलेंस शीट्स में जो आज हरापन नज़र आ रहा है, वह अचानक नहीं आया है। शीत युद्ध के दौरान इन कंपनियों ने वैसा ही आक्रामक निवेश किया था, जो आज टेक क्षेत्र की कंपनियां एआई में कर रही हैं। उस दौर में लॉकहीड, बोइंग और रेथियॉन ने ऐसी तकनीकों की R&D पर दांव लगाया था, जो पहले कभी मौजूद नहीं थीं। मिसाल के तौर पर, लॉकहीड ने ‘स्टील्थ तकनीक’ पर उस वक़्त 1.7 ट्रिलियन डॉलर ख़र्च किये थे। इस पर रिसर्च के लिए उसने एक गोपनीय इकाई ‘स्कंक वर्क्स’ भी बनायी थी, जिसकी एक अलग दिलचस्प कहानी है (इसके लिए बेन आर. रिच की किताब ‘स्कंक वर्क्स’ पढ़ी जा सकती है)। आज लॉकहीड कॉर्पोरेशन इस तकनीक का बेताज बादशाह है। इस तकनीक पर आधारित इसके एफ़-117 नाइटहॉक, एसआर-71 ब्लैकबर्ड, एफ़-22 रैप्टर जैसे विमान सबसे विध्वसंक विमान माने जाते हैं, जिनकी भारी मांग है और जिन्हें बेचकर कंपनी भारी मुनाफ़ा भी कमाती है।
इसी तरह, आरटीएक्स (जो पहले रेथियॉन टेक्नोलॉजिस कहलाती थी), ने मिसाइल गाइडेन्स सिस्टम और रडार तकनीक में भारी निवेश किया। आज यह कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी मिसाइल प्रोड्यूसर है। इसकी टॉमहॉक मिसाइलों और पैट्रियट मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम की मांग यूक्रेन से लेकर मध्य-पूर्व तक बनी हुई है। ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि कई संघर्षों और युद्धों में दोनों ही पक्ष इन कंपनियों के साज़-ओ-सामान से लैस होते हैं। यानी कंपनियों के दोनों हाथों में लड्डू रहते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि अस्ल में युद्धों का पूरा फ़ायदा ये कंपनियां ही उठाती हैं। लेकिन यह फ़ायदा वही कंपनियां उठा रही हैं, जिन्होंने दशकों तक शोध एवं विकास पर भारी निवेश किया है।
हथियार कंपनियों के अनुभव एआई पर रिसर्च करने वाली टेक कंपनियों के सामने हैं। यह मानने वाले विशेषज्ञों की कमी नहीं है कि सब कुछ ठीक रहा और एआई का बुलबुला फूटने से बच गया तो अगले दशक में देशों के लिए हथियारों की संख्या तथा उनकी मारक क्षमता नहीं, एआई में दक्षता ही स्वयं को ‘सुरक्षित व विकसित’ बनाये रखने के एक नये भ्रम के रूप में सामने आएगी। तब दुनिया की दिशा ‘वेपन्स प्रॉलिफ़िरेशन’ (शस्त्र-प्रसार) से ‘एआई प्रॉलिफ़िरेशन’ (एआई-प्रसार) की तरफ़ मुड़ जाएगी। ज़ाहिर है, ‘एआई प्रॉलिफ़िरेशन’ का फ़ायदा भी उन्हीं टेक कंपनियों को मिलेगा, जो आज से इसकी तैयारी करेंगी। 700 अरब डॉलर का ख़र्च इसी तैयारी का एक हिस्सा है। और यह ख़र्च तो केवल 4 कंपनियों का सामने आया है।

शुरू भी हो चुकी एआई के लिए अंधी दौड़!
डेलॉयट के ‘स्टेट ऑफ़ एआई’ सर्वे के अनुसार, लगभग 70 फ़ीसदी कंपनियों का मानना है कि जेनरेटिव एआई की वजह से एक से तीन साल में उनके इन्फ़्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव आ सकता है। दरअसल, आज हर कंपनी को लग रहा है कि अगर उसने इस समय एआई को नहीं अपनाया तो वे पीछे रह सकती है। दुर्भाग्य से, ऐसा ही तमाम सरकारों को लग रहा है कि अगर उन्होंने सही वक़्त पर एआई पर अपने ख़र्च नहीं बढ़ाये तो विकास की दौड़ में वे पिछड़ सकती हैं। यह उसी सोच का दूसरा आयाम है कि अगर उन्होंने अपने सैन्य ख़र्चों में इज़ाफ़ा नहीं किया तो उनकी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लग सकती है। दरअस्ल, विकास के भ्रम का पूरा ढांचा ही एआई के इर्द-गिर्द खड़ा किया जा रहा है।
इसमें दो पक्ष हैं। एक वह है तो एआई पर निवेश इसलिए कर रहा है, ताकि भविष्य में अपनी एआई प्रोद्योगिकियों को बेचकर ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमा सके, जैसे अमेरिका और चीन की कंपनियां। दूसरा पक्ष वह है जो एआई पर ख़र्च इसलिए कर रहा है, ताकि इसका इस्तेमाल करके मुख्यधारा में बना रह सके, जैसे भारत और अन्य विकासशील देश। हम या हमारे जैसे देश एआई के शोध एवं विकास पर इतना ख़र्च कर ही नहीं सकते कि एआई प्रौद्योगिकी के विक्रेताओं की श्रेणी में आ सके। अंतत: इसका वही नतीजा निकल सकता है, जो हथियार कारोबार के क्षेत्र में निकला है। वे एआई की नयी-नयी प्रौद्योगिकियां विकसित करते जाएंगे और हम शान से उन्हें ख़रीदते चले जाएंगे। जैसे हमें राफ़ेल खरीदने में गर्व महसूस होता है, वैसे ही एआई की प्रौद्योगिकी ख़रीदने में होगा। जैसे आज राफ़ेल की ख़रीदी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता, वैसे ही तब एआई प्रौद्योगिकी की ख़रीदी पर कोई सवाल उठाने की स्थिति में नहीं होगा।
पर अंतिम परिणाम?
हथियार निर्माता कंपनियों की पैसा कमाने की भूख के क्या नतीजे दुनिया को देखने पड़े हैं, बताने की ज़रूरत नहीं है। क्या हमें एआई के भी ऐसे ही नतीजों के लिए तैयार रहना चाहिए? बेशक, एआई कई मायनों में मानवता के लिए फ़ायदेमंद भी हो सकती है, लेकिन वर्कफ़ोर्स के लिए काल बनने की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा। इसी हफ़्ते प्रकाशित इन्वेस्टमेंट बैंक ‘TD Cowen’ की एक रिपोर्ट के अनुसार आईटी क्षेत्र की बड़ी दिग्गज कंपनी ऑरेकल ने इस साल 20 से 30 हज़ार कर्मचारियों की छंटनी करने की योजना बनायी है। वजह? ताकि ओपन-एआई के साथ 300 अरब डॉलर की पाटर्नरशिप पर वह आगे बढ़ सके। ऑरेकल केवल एक उदाहरण है। निकट भविष्य में और भी कई उदाहरण सामने आ सकते हैं।
लेकिन क्या ख़तरा सिर्फ़ वर्कफ़ोर्स की छंटनी को लेकर है? जब आप युवाल नोवा हरारी की ‘नेक्सस’ और जेम्स बराट की ‘अवर फ़ाइनल इन्वेन्शन’ पढ़ते हैं तो यह ख़तरा अन्य ख़तरों की तुलना में बड़ा गौण महसूस होता है। इन ख़तरों की चर्चा फिर आगे कभी।

ए. जयजीत
27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।
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