आलोक मिश्रा, alok mishra
आलोक कुमार मिश्रा की कलम से....

आज़ादी का संदेश

           प्यारे विद्यार्थियो, जय हिंद

इस वर्ष हम आज़ादी की 79वीं सालगिरह मना रहे हैं। त्याग, बलिदान, संघर्ष और सहकार की असंख्य कहानियों से भरी हमारी आज़ादी की लड़ाई और उसकी विरासत आज भी हम सबके लिए प्रेरक व पथ प्रदर्शक बनी हुई है। देश के हर वर्ग, लिंग, क्षेत्र, धर्म और तबक़े के लोग हमारे गौरवशाली राष्ट्र के निर्माण और उसकी शक्ति के आधार हैं। खेतों में अपना पसीना देकर अन्न उगा रहे किसान, सीमा पर प्रहरी बनकर खड़े हमारे जवान, कारख़ानों में श्रम रत मज़दूर, हमारे जीवन को अपनी मेहनत से हर तरीक़े से सहज, सरल और सुविधाजनक बना रहीं महिलाएँ, रोज़गार व पूँजी के सृजन में लगे उद्यमी, प्रकृति को सहेजने और संवर्धित करने में लगे आदिवासी जन और ज्ञान प्राप्ति तथा जीवन के नये आयाम खोजने में लगे आप शोधार्थी और विद्यार्थी सभी इस देश की अमूल्य निधि हैं। बल्कि कहें तो हम सब मिलकर ही इस महान राष्ट्र को बनाते हैं।

प्यारे बच्चो, कई बार हम सोचते हैं कि हम ख़ुद कैसे एक देशभक्त बनें, कैसे अपने राष्ट्र और समाज के काम आएँ, जिस तरह हमारे पुरखों और पुरखिनियों ने अपने श्रम से इस देश को यहां तक पहुँचाया, हम कैसे इसे और ऊँचाई दें, रह गयी कमियों को कैसे दूर करें? ऐसा सोचना बहुत अच्छी बात है। इससे पता चलता है कि हमारे भीतर भी देशप्रेम का जज़्बा धधक रहा है। ज़रूरत है तो बस इस जज़्बे को सही दिशा देने की। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि यदि हम अपनी अपनी भूमिकाओं को सही से निभाएँ, जो भी सोचें या करें उससे देश का भला कैसे होगा, इसका ध्यान रखें, किसी भी तरह के भेदभाव, शोषण, अंधविश्वास और ग़लत कार्यों का हिस्सा न बनें, तार्किक और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दें, संविधान में निहित मूल्यों को जीवन में अपनाते हुए आगे बढ़ें तो हम स्वतः ही देशभक्त बन जाएंगे। एक देशभक्त का काम सिर्फ़ प्रदत्त या मिली हुई विरासत पर गर्व करना ही नहीं होता, बल्कि ऐसे काम करना भी होता है जिससे ये सामूहिक गर्व अक्षुण्ण बने रहें और सभी लोग हमारे किए हुए पर भी गर्व कर सकें।

अपने आसपास के लोगों से स्नेह, सम्मान का रिश्ता रखते हुए, विविधताओं को आदर देते हुए, प्रकृति व संसाधनों को संरक्षित-संवर्धित करते हुए, श्रमशील तबक़े के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हुए, अपने कार्यों को सुचारु रूप से संपन्न करते हुए, राष्ट्रीय प्रतीकों का आदर और सार्वजनिक संपत्ति का रक्षा करते हुए दरअसल हम एक देशभक्त ही होते हैं। देश की सेवा केवल सीमा पर खड़े फ़ौजी के काम से ही नहीं होती, कक्षाओं में पढ़ा रहे शिक्षकों, अस्पतालों में काम कर रहीं डॉक्टरों व नर्सों, निमार्ण कार्य में लगे इंजीनियरों और मज़दूरों, घरेलू कामों में लगी गृहणियों के कामों से भी कोई देश समृद्ध और सशक्त बनता है। बल्कि सभी का सामूहिक अवदान ही राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य तय करता है। और, एक विस्तृत व समृद्ध अतीत तो है ही हमें दिशा दिखाने और सीख देने को।

आपके कंधों पर ही हमारे इस महान देश को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी है। आज से ही आप इस दिशा में गंभीर होकर कर्तव्य निर्वहन में जुट सकते हैं। इसकी शुरूआत अपनी पढ़ाई का काम मन लगाकर करने से की जा सकती है। इसके साथ ही हरियाली बढ़ाने में अपनी भूमिका निभायी जा सकती है। जैविक विविधता को संरक्षित करने में जुटा जा सकता है। आज़ादी की वर्षगांठ हमें हमारे शहीदों, राष्ट्र निर्माताओं के सपनों से जोड़ने का काम भी करती है। आख़िर हममें से कौन नहीं चाहता कि हमारा देश महात्मा गांधी, भगत सिंह, डॉक्टर अंबेडकर, मौलाना आज़ाद, सरोजिनी नायडू जैसे हमारे आदर्शों और उनके सपनों के अनुरूप न बने? तो चलो, हम आज और अभी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ।

एक शिक्षक की ओर से स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाएँ।

alok mishra

आलोक कुमार मिश्रा

पेशे से शिक्षक। कविता, कहानी और समसामयिक मुद्दों पर लेखन। शिक्षा और उसकी दुनिया में विशेष रुचि। अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। जिनमें एक बाल कविता संग्रह, एक शैक्षिक मुद्दों से जुड़ी कविताओं का संग्रह, एक शैक्षिक लेखों का संग्रह और एक कहानी संग्रह शामिल है। लेखन के माध्यम से दुनिया में सकारात्मक बदलाव का सपना देखने वाला मनुष्य। शिक्षण जिसका पैशन है और लिखना जिसकी अनंतिम चाह।

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