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श्रद्धांजलि ग़ज़ाला तबस्सुम की कलम से....

बहुत याद आएंगे अवधेश प्रीत...

           कजरी, अली मंज़िल, चांद के पार एक चाभी, अम्मी जैसी अनगिनत कहानियां और अशोक राजपथ जैसा उपन्यास और कविताएं भी लिखने वाले साहित्यकार अवधेश प्रीत जी चले गये। उनका जाना अचानक नहीं हुआ, पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे लेकिन हृदय उनके जाने को स्वीकार नहीं करना चाहता है। हर बीमार शख़्स एक दिन स्वस्थ होने की आशा में जीता है, सिर्फ़ वही क्या उसके आस-पास के लोग, उसके चाहने वाले बहुत-से लोग इसी उम्मीद को जीते हैं। उन्होंने भी सोचा होगा, हम सबने सोचा था कि वे एक दिन स्वस्थ होकर फिर से लेखन में सक्रिय हो जाएंगे, अधूरी रचनाओं को पूरा करेंगे। लेकिन नियति को यह मंज़ूर नहीं था।

अवधेश प्रीत जी अच्छे साहित्यकार के साथ बेहतरीन इंसान भी थे। उनकी सोच उनकी कहानियों के ज़रिये हम तक पहुंचती थी। कजरी जैसी कहानियों के समालोचक उन्हें प्रेमचंद की परम्परा का लेखक मानते हैं क्योंकि उन्होंने हमेशा अपनी कहानियों में समाज के दबे-कुचले शोषक वर्ग के लिए आवाज़ उठायी। जब मैंने उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा “प्रेमचंद अब किसी साहित्यकार का नाम नहीं रह गया है, प्रेमचंद एक परम्परा और विचार का नाम है और विचार सतत् यात्रा है और मैं इसका वाहक हूं।”

उनसे मेरा परिचय एक व्हाट्सएप के साहित्यिक समूह में हुआ था, जहां उनकी बहुत-सी कहानियां पढ़ने का मौक़ा मिला, उनकी कहानियों पर समीक्षाएं पढ़ने लिखने का मौक़ा मिला। समूह में सप्ताह का एक दिन संस्मरण के लिए निर्धारित था जिसके ज़रिये उनके विद्यार्थी जीवन, निजी जीवन की कई रोचक कहानियों, ग़मों, खुशियों से इस तरह जुड़ना हो गया कि कभी लगा ही नहीं उनसे कभी मुलाक़ात नहीं हुई है। इधर पिछले दो-तीन सालों में साहित्यिक चर्चाएं कम होने लगीं, समूहों में गतिविधियां कम होने लगीं लेकिन उनसे संपर्क बना रहा। हर साल ईद पर मुबारकबाद देना नहीं भूलते। वो पहले इंसान थे जिन्होंने मेरे अंदर के शायर को पहचाना था और मुझे बह्र-ओ-अरूज़ सीखने की सलाह दी। वो अब तक के मेरे शेरी सफ़र के गवाह रहे। उन्होंने कभी नये साहित्यकारों को हतोत्साहित नहीं किया, बहुत सलीक़े से उनकी रचनाओं में कमियों को बताते और सलाह दिया करते थे।

 

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एक साल पहले आब-ओ-हवा के लिए उनसे इंटरव्यू के लिए आधे घंटे का समय मांगा तो वो तुरंत तैयार हो गये। तय वक़्त पर उन्हें कॉल किया, बहुत सारी मुहब्बत, दुआओं और शिकायत के साथ उनसे बात शुरू हुई जो लगभग डेढ़ घंटे चली। आज उनकी हर बात याद आ रही है। इंटरव्यू से इतर भी उन्होंने दुनियादारी और साहित्य से जुड़ी बातें समझायीं। वो आब-ओ-हवा का हर अंक बहुत मुहब्बत से पढ़ते और दिल खोलकर सराहना किया करते थे।

आज ये सब कुछ लिखते हुए हृदय बहुत दुखी है, अभी आपको नहीं जाना था प्रीत सर, इतनी जल्दी दुनिया को अलविदा नहीं कहना था। आप बहुत याद आएंगे। हमेशा याद आएंगे। साहित्य की दुनिया आपको भुलाएगी नहीं।

ग़ज़ाला तबस्सुम

ग़ज़ाला तबस्सुम

साहित्यिक समूहों में छोटी-छोटी समीक्षाएं लिखने से शुरू हुआ साहित्यिक सफ़र अब शायरी के साथ अदबी लेखन और प्रेरक हस्तियों के साथ गुफ़्तगू से लुत्फ़अंदोज़ हो रहा है। एक ग़ज़ल संग्रह ने अदब की दुनिया में थोड़ी-सी पहचान दिलायी है। लेखन में जुनून नहीं, सुकून की तलाश है। आब-ओ-हवा के पहले अंक से ही जुड़े होना फ़ख़्र महसूस कराता है।

4 comments on “बहुत याद आएंगे अवधेश प्रीत…

  1. बहुत अच्छा लिखा आपने। प्रीत सर की याद दिल से मिटने वाली नहीं। वे एक उच्च कोटि के साहित्यकार होने के साथ एक सुलझे हुए बेहद अच्छे इंसान थे। इतनी जल्दी उनका चले जाना हृदय पर गहरा आघात दे गया।उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि

  2. अपनी रचनाओं के माध्यम से समय और समाज की तल्ख सच्चाइयों को सामने लाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार श्री अवधेश प्रीत जी को विनम्र श्रद्धांजलि ,सादर नमन

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