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उप्र में बुलडोज़र के नये शिकार बिस्मिल व अशफाक

           तुम गिराने में लगे थे तुमने सोचा ही नहीं
           मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

वसीम बरेलवी का यह शे’र दुर्भाग्य से जैसे एक बार फिर जी उठा! वीडियो फ़ुटेज जो सामने आये हैं, उनमें दिख रहा है कि किस तरह मलबे में बिस्मिल और अशफ़ाक़ के सिर टूटे पड़े हैं। ये फ़ुटेज यूपी से आ रहे हैं, जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की प्रतिमाएं ध्वस्त करने के बाद समाज के कुछ वर्गों में नाराज़गी और असंतोष नज़र आ रहा है।

23 मार्च 2026 को देश भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस पर बलिदान को स्मृति गीत दोहरा रहा था और इधर उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से एक ऐसा समाचार आया, जिसने समाज को परेशान कर दिया। सरकारी बुलडोज़र ने तीन शहीद क्रान्तिकारियों की मूर्तियों को न सिर्फ़ चकनाचूर कर दिया बल्कि अपमान की इंतेहा यह रही कि इन प्रतिमाओं के मलबे को कचरे की तरह फिंकवा दिया गया।

इंक़लाबी सपूतों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्ला ख़ां और रोशन सिंह का गहरा रिश्ता शाहजहांपुर से रहा है और यह शहर अपने इस ​इतिहास पर फ़ख्र करता रहा है। अब मीडिया में ख़बरें हैं कि उसी शाहजहांपुर के टाउनहॉल चौक पर 1972 में स्थापित इन तीनों की प्रतिमाओं को बुलडोज़र ने ध्वस्त कर दिया है।

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छीछालेदर होने के बाद प्रशासन लीपापोती करते हुए कह रहा है कि योजना यह थी कि इन प्रतिमाओं को बेहतर ढंग से स्थापित किया जाये लेकिन जिस तरह दुर्गति (एआई जनित तस्वीर में देखें) हुई है, उसने समाज को झिंझोड़ तो दिया ही है। मीडिया की ख़बरों में शहरवासियों को कहते सुना जा सकता है कि वे इस लापर्वाई से कितने खिन्न हैं।

           कभी वो दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे
           जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा

‘शहीदों की चिताओं पर’ नज़्म में यह शे’र आता है, जो साफ़ तौर पर शहीदों के उस सपने का इज़हार करता है कि जब स्वराज होगा, अपने देश में अपना मान-सम्मान और जीने का अधिकार व आनंद होगा। लेकिन आलम यह है कि उन पुरखों की यादें तक महफ़ूज़ रख पाने में हम नाकाम हैं।

इधर, एक्टिविस्टों ने भी हांका लगाया है। इनका कहना है जिस तरह अंग्रेज़ों ने रातो-रात भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शवों को जलवाकर सतलज में फिकवाया था, उसी तरह योगी सरकार के प्रशासन ने रातो-रात इन शहीदों की प्रतिमाओं को तोड़कर उनका मलबा फिकवा दिया।

यह ख़बर जहां भी पहुंच रही है, दुख और आक्रोश पैदा कर रही है। कोई इसे शर्मनाक हरकत कहकर पुरज़ोर विरोध कर रहा है तो किसी का कहना है प्रशासन को समाज से माफ़ी मांगते हुए पहले से बेहतर और बड़ी प्रतिमाएँ उसी स्थान पर लगवाने की कवायद करना चाहिए। इधर, एक वर्ग की यह भी पुकार है कि ऐसी हरकत के लिए ज़िम्मेदारी जल्द तय की जाये और दोषी अफ़सरों पर कड़ा एक्शन लिया जाये ताकि भविष्य में प्रशासन इस तरह की लापर्वाई से काम न ले।

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