
- March 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
ग़ालिब को महान बनाने वाली पहली किताब
मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली की “यादगार-ए-ग़ालिब” एक बायोग्राफ़िकल और क्रिटिकल किताब है, जो मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब के व्यक्तित्व, जीवन शैली और आर्टिस्टिक अचीवमेंट्स (कलात्मक उपलब्धि) पर आधारित है। यह किताब सबसे पहले 1897 में कानपुर के रहमतुल्लाह रा’द के “नामी प्रेस” से प्रकाशित हुई थी।
मुखपृष्ठ कहता है: यादगार-ए-ग़ालिब यानी जनाब मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ान तख़ल्लुस ब: ग़ालिब देहलवी के हालात, उनकी अक़्साम नज़्म-ओ-नस्र-ए-उर्दू फ़ारसी का (गद्य और पद्य के प्रकार) का चयन और हर एक क़िस्म पर जुदागाना (पृथक-पृथक) रिमार्क्स। मुरत्तबा (प्रस्तुतकर्ता): ख़ाकसार अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती। सन 1897 में मुहम्मद रहमतुल्लाह राद के नामी प्रेस कानपुर में छपी। रजिस्ट्रेशन नियमों के हिसाब से किया गया।
पुस्तक के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा है- मिर्ज़ा की ज़िंदगी: इसमें ग़ालिब की ज़िंदगी, नैतिकता, आदतें और उनके समय के हालात बताये गये हैं। ग़ालिब का जन्म, फ़ैमिली बैकग्राउंड, नैतिकता और आदतें, पढ़ाई की आदतें, कलकत्ता का सफ़र, “दस्तम्बू” और “क़ात-ए-बुरहान” से जुड़ी डिटेल्स, लखनऊ में रहना, सरकारी नौकरी से मना करना, जेल जाने की कहानी, क़िले से कनेक्शन, शहंशाह ज़फ़र की शायरी की इसलाह, बोलने का हुनर, बच्चे, गुमनाम ख़तों में गालियाँ, अरबी और फ़ारसी का ज्ञान, गद्य, अरूज़ (छंद शास्त्र), ज्योतिष, सूफ़ीवाद और इतिहास, ख़त, शायरी का प्रस्तुतिकरण, नर्मदिली, दरियादिली, कविता की समझ, किताबों की समझ, अच्छी बोली और नफ़ासत, सेल्फ़-कंट्रोल, खाना-पीना, आम की चाहत, अच्छी चीज़ें ढूंढ़ना, पीना, इस्लाम में विश्वास, मज़ेदार बातें, निंदा न लिखना, मौत की चाहत, आख़िरी दिन, मौत की तारीख़, चेलों की बड़ी संख्या और ग़दर के हालात और अनुभव। इसमें ग़ालिब की महानता के साथ-साथ उनकी कमज़ोरियों को भी दिखाया गया है। इन प्रसंग सूचियों से अंदाज़ा लगता है इसमें कितनी ज़रूरी और दिलचस्प जानकारी शामिल है।
दूसरे हिस्से में ग़ालिब की उर्दू और फ़ारसी कविता और गद्य, यानी चिट्ठियों और दूसरी गद्य रचनाओं का एनालिसिस किया गया है। इसमें गद्य के टुकड़े और उदाहरण के तौर पर चुनी हुई ग़ज़लें हैं। मुश्किल अशआर की व्याख्या और उन पर हाली के आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी हैं।

किताब का आरंभिक पैराग्राफ़ है:
‘मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब, जिन्हें मिर्ज़ा नौशा के नाम से जाना जाता है, जिन्हें नज्म-उद-दौला, दबीर-उल-मुल्क असदुल्लाह ख़ान बहादुर निज़ाम जंग, फ़ारसी में ग़ालिब और उर्दू में असद के नाम से लिखा जाता है; साल 1212 हिजरी में रजब की सातवीं तारीख़ की रात को आगरा शहर में पैदा हुए।”
इस किताब का मुख्य उद्देश्य ग़ालिब की कला और शख़्सियत को ज़िंदा और अमर रखना था। इस तरह, यह किताब सिर्फ़ एक बायोग्राफ़िकल स्केच नहीं है, बल्कि एक साइंटिफ़िक और लिटरेरी अचीवमेंट है, जिसमें हाली की ग़ालिब के प्रति भक्ति और उनकी शायरी पर एक क्रिटिकल एंगल भी मौजूद है। हालाँकि नये शोधों ने इस किताब की कुछ घटनाओं पर सवाल उठाये हैं, फिर भी “यादगार-ए-ग़ालिब” को आज भी ग़ालिब के अध्ययन की बुनियाद माना जाता है।
हाली ख़ुद महसूस करते हैं और कहते हैं कि यह ग़ालिब की फ़ॉर्मल बायोग्राफ़ी नहीं है, बल्कि इसका मक़सद उनकी शायराना और अदबी हैसियत को प्रस्तुत करना है। प्रस्तावना में वे लिखते हैं:
“मिर्ज़ा की ज़िंदगी में उनकी शेर और पत्र लिखने के अलावा कोई ख़ास घटना नहीं दिखती। इसलिए, इस किताब में उनकी ज़िंदगी के बारे में बतायी गयी घटनाओं को अतिरिक्त और प्रासंगिक माना जाना चाहिए। इस किताब को लिखने का मुख्य उद्देश्य लोगों को उनकी शायरी की उस अजीब और नायाब ख़ूबसूरती को दिखाना है, जो अल्लाह ने मिर्ज़ा के स्वभाव में दी थी और जो कभी पद्य और गद्य के रूप में, कभी नज़ाकत और समझदारी के रूप में, कभी प्यार और हवस के रूप में, और कभी सूफ़ीवाद और अहल-अल-बैत के लिए प्यार के रूप में सामने आयी। इसलिए, कोई भी ज़िक्र जो इन चार चीज़ों के दायरे में नहीं आता, उसे किताब के विषय से बाहर माना जाना चाहिए।“
यह किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह मिर्ज़ा ग़ालिब की बायोग्राफ़ी लिखने की पहली कोशिश है, जिसे एक ऐसे इंसान ने लिखा जो ग़ालिब को अच्छी तरह जानता था और दिल्ली के लिटरेरी, कल्चरल और हिस्टोरिकल हालात से भी वाक़िफ़ था। इसके अलावा, उसे मिर्ज़ा ग़ालिब का शागिर्द होने का भी सम्मान मिला था, साथ ही व्यक्तिगत रिश्ते भी थे।
इसका साहित्यिक महत्व इसलिए भी बहुत ज़्यादा है कि पहली बार उसने ग़ालिब की शायरी की ज़रूरी बातों को पेश किया और ऐसी बातों की ओर ध्यान दिलाया जिनके बिना ग़ालिब की सोच को ठीक से समझना मुश्किल है। इसलिए, आज भी साहित्यकार इसे ग़ालिब के बारे में एक बहुत ज़रूरी किताब मानते हैं।
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी और उनके ख़तों और बातों से पता चलता है कि उन्हें अपनी बुरी आदतों पर पछतावा था। उन्हें उस समय वह लोकप्रियता और प्रसिद्धि नहीं मिली, जिसकी उन्हें चाहत थी। इसीलिए उन्होंने ख़ुद को “अंदलीब-ए-गुलशन-ए-ना-आफ़रीदा” भी कहा है, जिसका मतलब है कि मैं एक ऐसे गुलशन की बुलबुल हूं जो अभी तक वजूद में नहीं आया है। ऐसा लगता है जैसे उन्हें यक़ीन था कि आने वाले ज़माने में उनकी शायरी को समझने वाले पैदा होंगे, तब उन्हें एहसास होगा कि वे कितने महान थे। और उनकी महानता की दलीलें हाली की इस किताब के ज़रिये लोगों तक पहुँचने लगीं। ऐसा लगता है जैसे आज उनकी जो शोहरत, अहमियत और लोकप्रियता है, उससे जान-पहचान “यादगार-ए-ग़ालिब” से ही शुरू होती है।
कुछ समय पहले तक ग़ालिब को एक अनोखे अंदाज़ वाले लेखक और दमदार शब्दों वाले शायर के तौर पर पेश किया जाता था। बाद में कई लोगों ने ग़ालिब को अपने-अपने तरीक़े से समझने और समझाने की कोशिश की। किसी ने “आसार-ए-ग़ालिब” लिखा, किसी ने “महासिन कलाम-ए-ग़ालिब“, किसी ने “ग़ालिब और अहंग-ए-ग़ालिब” तो किसी ने “ज़िक्र-ए-ग़ालिब”, “हयात-ए-ग़ालिब“, “ग़ालिब-नामा” वग़ैरह किताबें लिखीं। लेकिन, ग़ालिब को समझने की शुरूआत “यादगार-ए-ग़ालिब” से ही होती है।
अल्ताफ़ हुसैन हाली: एक नज़र
हाली का जन्म 1 जनवरी, 1837 को पानीपत में हुआ था। उनके पिता ख़्वाजा इज़ो बख़्श की मौत तब हुई जब हाली 9 साल थे, इसलिए उनकी ठीक से पढ़ाई नहीं हो सकी। लेकिन पढ़ने का बहुत शौक़ रहा। परिवार ने 17 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी, लेकिन पढ़ने के शौक़ ने उन्हें मजबूर कर दिया और वे छिपकर दिल्ली चले गये। यहाँ उन्होंने मौलवी नवाज़िश अली से ग्रामर, सिंटैक्स और लॉजिक की पढ़ाई की। उन्होंने ग़ालिब से फ़ारसी सीखी और ग़ज़लें भी पढ़ीं और ग़ालिब से इस्लाह भी ली।
हाली की रचनाएँ हैं: हयात-ए-सादी, मुक़द्दमा शेर-ओ-शाइरी, यादगार-ए-ग़ालिब, हयात-ए-जावेद… इसके अलावा धर्म, नैतिकता, जीवनी, भाषा, लॉजिक वग़ैरह पर उनकी अन्य किताबें भी बहुत मशहूर हैं। वे मॉडर्न शायरी के पायनियर और उर्दू शायरी में ओरिजिनैलिटी, जोश और सादगी के पैरोकार रहे। उन्हें उर्दू लिटरेचर में क्रिटिसिज़्म और मॉडर्न शायरी के फ़ाउंडर्स में से एक माना जाता है। उन्होंने कई पोएटिक और प्रोज़िक विधाओं में अपना हुनर दिखाया। पहले बायोग्राफ़र अर्थात जीवनी लेखक, आलोचक, नैचुरल पोएट्री के फ़ाउंडर और ग़ज़लों की जगह नज़्मों की शायरी शुरू करने वाले के तौर पर उर्दू अदब में योगदान दिया है। हाली को 1904 में “शम्स अल-उलेमा” का ख़िताब मिला। मौलाना का इंतक़ाल 31 दिसंबर 1914 को हुआ।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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