पीबी श्रीनिवास, pb srinivas

'चंदा से होगा वो प्यारा', गाने में लता के साथ किसकी आवाज़ है?

             वर्ष 1964 में मीना कुमारी और धर्मेंद्र अभिनीत फ़िल्म आयी थी, नाम था- ‘मैं भी लड़की हूं’। यह फ़िल्म एक बंगला उपन्यास ‘बोधू’ पर बनी लोकप्रिय तमिल फ़िल्म का हिंदी वर्जन थी। फ़िल्म में धर्मेंद्र और मीना कुमारी पर फ़िल्माया एक मधुर गीत तो सबको याद होगा- ‘चंदा से होगा वो प्यारा’। नायिका रजनी और नायक राम अपने घर आने वाले नन्हे मेहमान का तसव्वुर करते हुए सुर छेड़ रहे हैं। गायिका लता मंगेशकर के साथ जिस गायक ने दोगाने में साथ दिया है, उसे अक्सर संगीत प्रेमी मोहम्मद रफ़ी या तलत महमूद समझने की भूल कर बैठते हैं। मगर यह गायक हैं कन्नड़ सहित अनेक दक्षिण भाषाओं में अपनी गायकी की धाक जमवा चुके पचास से सत्तर के दशक के लोकप्रिय गायक पी.बी. श्रीनिवास।

गाने का मुखड़ा श्रीनिवास ही शुरू करते हैं। ‘चंदा से होगा वो प्यारा, फूलों से होगा वो न्यारा’। और यहाँ रजनी इस ख़याल को आगे बढ़ाती हुई गाती है- ‘नाचेगा आंगन में छमछम, नन्हा-सा मुन्ना हमारा’।

राजेंद्र कृष्ण के बोल हैं और बोलों को सजाया है चित्रगुप्त ने। इस गाने में श्रीनिवास की आवाज़ बहुत सधी हुई और सुरभीगी लगी है। परदे पर धर्मेंद्र जब इस पर होंठ हिलाते हैं तो एकबारगी तो लगता है कि श्रीनिवास नहीं मोहम्मद रफ़ी ही हों। अलबत्ता अंतरे में उनके स्वर काफ़ी कुछ तलत से मेल खाते हैं। स्वर साम्राज्ञी के साथ का यह उनका पहला गाना था (जो आख़िरी भी रहा), शायद इसलिए दक्षिण के यशस्वी गायक होते हुए भी उनकी आवाज़ कंट्रोल्ड और कुछ दबी-सहमी हुई लगती है। जबकि लता ने हमेशा की तरह खुले गले से सुर लगाये हैं।

चित्रगुप्त का संगीत संयोजन कर्णप्रिय तो है पर मौलिक नहीं। कारण यह धुन मूल तमिल वर्जन ‘नानुम औरू पेन’ से जस की तस ली गयी है या कहना चाहिए कि निर्माता-निर्देशक की मांग पर ऐसा करना पड़ा है। वरना तो चित्रगुप्त जैसे प्रतिभावान संगीतकार के लिए मौलिक धुन बनाना सहज संभव था। मज़ेदार तथ्य यह कि तमिल युगल गीत ‘पू पोल पू पोल पिरकुम’ के गायक टी.एम. सुंदरराजन और पी. सुशीला थे। यानी पी.बी. श्रीनिवास ने इसे नहीं गाया था। तो फिर निर्माता को श्रीनिवास से गवाने का विचार कैसे आया?

हुआ यूं कि हिंदी रीमेक में लता और रफ़ी से यह गाना गवाया जाना तय हुआ था। पर उन दिनों रॉयल्टी को लेकर लता और रफ़ी में झगड़ा इतना बढ़ गया था कि दोनों ने एक-दूसरे का मुँह देखना बंद कर दिया था। साथ गाना तो दूर की बात है। श्रीनिवास पचास के दशक में कुछ हिंदी फ़िल्मों में गा चुके थे और बहुभाषी होने के साथ ही हिंदी और उर्दू पर उनकी गहरी पकड़ थी। इसलिए तमिल गायक सुंदरराजन के स्थान पर श्रीनिवास का चयन हुआ।

श्रीनिवास भले ही हिंदी फ़िल्मों में दस-पंद्रह गाने ही गा सके पर उन्होंने अनेक ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों और गीतों को अपनी आवाज़ दी। वे तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, हिंदी उर्दू, अंग्रेज़ी और संस्कृत के भी अच्छे ज्ञाता थे। और तो और बहर में ख़ालिस उर्दू के शब्दों वाली ग़ज़लें भी लिखा करते थे। सत्तर के दशक में उनके साथ दोहरी चोट हुई। एक तो वे जिन मैटिनी आईडल कन्नड़ हीरो डॉ. राजकुमार के लिए गाकर लोकप्रिय हुए थे, बाद में वही राजकुमार स्वयं गायक के रूप में भी कामयाब हुए और इस तरह श्रीनिवास को उनके गाने मिलने बंद हो गये। दूसरी ओर, येसुदास और एस.पी. बालासुब्रहमण्यन जैसे गायक सत्तर के दशक में उभरे, जो अधिक तैयार और युवा थे। तो धीरे-धीरे श्रीनिवास चलन से बाहर होते गये।

बहरहाल पी.बी. श्रीनिवास की हिंदी और उर्दू पर पकड़ का दीदार करना हो तो उनका यू ट्यूब पर हिंदी में दिया साक्षात्कार सुना जा सकता है। वर्ष 2013 में इस वरिष्ठ गायक का 82 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

विवेक सावरीकर मृदुल

सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।

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