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हास्य-व्यंग्य आदित्य की कलम से....

चुनावी बवंडर, सियासी धुरंधर और बेचारा सिलेंडर

             ईरान युद्ध ने पूरे विश्व में आग लगा दी है। पूरी दुनिया जल रही है मगर इसने हमारे चूल्हे की आग छीन ली है। भारतीय पत्नियों ने इस मुए सिलेंडर को ईरान के ड्रोन की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। दिन भर में सौ पचास बार इससे हमला किया जाता है। ग़ैरतमंद आदमी इस सिलेंडर के नाम पर सुबह-शाम ताने झेल रहा है। सिलेंडर का इंतज़ाम न कर पाने की असमर्थता के कारण पत्नियाँ उसे दुनिया का सबसे नाकारा आदमी साबित करने के कोई भी मौक़ा चूक नहीं रही हैं। पतियों की वही हालत हो गयी है जैसी ट्रंप के आगे देश के कर्णधारों की है। पत्नियाँ ट्रंप की तरह रोज़ लताड़ रही हैं, वैश्विक संकट में फंसे बेचारे पति न हूँ कर पा रहे हैं, न चूँ। पतियों को अपने ही घर में घुसते हुए संकरा दरवाज़ा देखकर हार्मूज़ स्ट्रेट में घुसने जैसी फ़ीलिंग आने लगी है। लेकिन इसी बहाने भारत का पति समाज अंतरराष्ट्रीय संबंधों और उसमें आ रहे उतार-चढ़ाव पर पैनी नज़र रखने लगा है।

भारत में गैस सिलेंडर की लत कांग्रेस सरकार की देन है। नेहरू इसे उद्योगों के लिए लाये, इंदिरा ने इसे सीमित रूप से शहरी घरों तक पहुँचाया, राजीव गाँधी ने इसका विस्तार किया लेकिन मनमोहन सिंह ने इसे शहरी और ग्रामीण मध्यम वर्ग तक पहुँचाकर लोगों को इसका आदी बना दिया। भारत में रसोई गैस ने जनता के स्वास्थ्य के सम्बन्ध में मिश्रित परिणाम दिये। एक तरफ़ बुज़ुर्गों ने गैस पर बनी रोटियों से कब्ज़ और पेट में गैस बनने की शिकायत की। दूसरी तरफ़ महिलाओं को चूल्हे में आँखें फोड़ने से छुटकारा मिला और लाइटर की “चिटिक” की आवाज़ देश भर में ऐसे गूंजने लगी कि सशक्तिकरण का प्रतीक बन गयी। लेकिन महिलाओं की शिकायत इस सिलेंडर को उठाने और रेगुलेटर लगाने से जुड़ी रही। सिलेंडर का यह सफ़र बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा। कभी वह कंधों पर चढ़कर आया कभी साइकिल पर, कभी मोटरसाइकिल पर और कभी लॉरी में, लेकिन इसका रुतबा हमेशा बरकरार रहा। कभी गोद में बैठकर सड़क पर प्रदर्शन में शामिल हो गया, तो कभी कालाबाज़ारियों की आँख का तारा बन गया।

कांग्रेस के शासन के दौरान 2012 में विपक्ष की नेत्री स्मृति ईरानी ने सड़क पर सिलेंडर के साथ प्रदर्शन कर सुर्ख़ियां बटोरी थीं, आज इस संकट की घड़ी में देश उनकी संवेदनशीलता के जागने की बाट जोह रहा है। कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी होने के बावजूद ऐसे प्रदर्शन करने में नाकाम रही है। एक तो कांग्रेस ने अपनी पार्टी में अजीब बौद्धिक लोगों को ठूंस रखा है, जो इतने गरिमापूर्ण प्रदर्शन के बारे में सोच नहीं पाते। भला कामयाब प्रदर्शन तमाशेबाज़, भड़काऊ भाषणबाज़ या ग्लैमरस सेलिब्रिटी के बिना हो सकते हैं क्या?

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खाड़ी में छिड़े इस युद्ध के बावजूद सरकार के प्रतिनिधि और सरकार समर्थक मीडिया दावा कर रहे हैं कि भारत में स्थिति सामान्य है और गैस का पर्याप्त भंडार है। मुझे सरकार की बात पर पूरा विश्वास है, लेकिन सोशल मीडिया न जाने कहां से सिलेंडर लिये, कतारों में खड़े लोगों की फ़ोटो और वीडियो भारत भर के अलग-अलग शहरों से लिये चला आ रहा है। ज़रूर यह शरारत विपक्षी पार्टीयों द्वारा सरकार को बदनाम करने के लिए की जा रही है। मुझे तो यह भी शक है कि विपक्षी पार्टीयों के सदस्य अपने भरे हुए सिलेंडर लेकर घंटों कतारों में खड़े रहकर माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

अब सम्पन्न विरोधी पैनिक क्रिएट करने के लिए इंडक्शन ख़रीद रहे हैं और ग़रीब जो हैं वो लकड़ियों की जमाख़ोरी के अलावा कर ही क्या पा रहे हैं। सोशल मीडिया पर कुछ विरोधी गैस का दाम ब्लैक में 2000 रु से 5000 रु तक बता रहे हैं, इसकी कड़ी जांच होनी चाहिए। जबकि सरकार ने सामान्य स्थिति को देखते हुए मात्र 60 रु प्रति सिलेंडर ही तो दाम बढ़ाया है। सरकार समर्थक मीडिया गला फाड़कर चिल्ला रहा है, छोटे उद्योगों को गैस आपूर्ति बंद करना, होटलों, रेस्टोरेटों आदि में सीमित सप्लाई और 10 किलो के सिलेंडर को मार्केट में उतारने की तैयारी जैसी अफ़वाहें आपदा में अवसर ढूंढ़ने वाले कर रहे हैं।

आम जनता को अभी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। बजट में एक लाख करोड़ का प्रावधान कर दिया गया है। ग़ौरतलब है कि देश में जल्द ही 5 राज्यों में चुनाव सम्पन्न होने वाले हैं। चुनाव जनता के लिए “आयरन डोम” का काम करता है। चुनाव सम्पन्न होने से पहले कोई भी संकट भारत को छू नहीं सकता। लेकिन बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी! थोड़ा इंतज़ार कीजिए, हौसला बनाए रखिए, अप्रैल जाएगा और “मास्टर स्ट्रोक” आएगा- “भाइयो और बहनो… गैस, तेल, उर्वरक पर वैश्विक संकट आ गया है… संकट की इस घड़ी में … देश आपसे …. मांगता है।”

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आदित्य

प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।

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