war and peace tolstoy
निशांत कौशिक की कलम से....

'युद्ध और शान्ति' की नियति

           मार्क ट्वेन ने कहा था, “क्लासिक साहित्य वह है जिसकी लोग प्रशंसा करते फिरें लेकिन उसे कभी पढ़ें नहीं।” विश्व साहित्य की उत्कृष्ट दस कृतियों की सूची में टॉलस्टॉय के तीन उपन्यास शामिल यदि किए जाएँगे- उसमें पहला होगा ‘युद्ध और शान्ति’। अन्य दो ‘एना कैरेनिना’ या ‘रिज़रेकशन’ हो सकते हैं।

‘युद्ध और शान्ति’ एक विराट उपन्यास है- इसीलिए मार्क ट्वेन का कथन कुछ हद तक इस पर सही उतरता है। टॉलस्टॉय ने इसे लिखने के लिए गहन शोध किया, युद्ध-क्षेत्रों के दौरे किये, डायरियों और ऐतिहासिक अभिलेखों का अध्ययन किया। युद्ध के वर्णन में इसीलिए कई प्रसंग मसलन ऑस्टरलिट्ज़ और बोरोडिनो जैसे प्रमुख संघर्षों के विस्तृत चित्रण को इसी अप्रतिम लेखकीय श्रम से प्रामाणिकता मिलती है और यह सावधानी भी कि युद्ध को वीरतापूर्ण नहीं बल्कि त्रासद, अराजक और अक्सर निरर्थक रूप में चित्रित किया गया है। जैसे ‘चेखव की बंदूक़’ लेखन के सन्दर्भ में इस्तेमाल होने वाला एक पद है। ‘युद्ध और शान्ति’ में भी राजकुमार आंद्रेई जब युद्धस्थल में घायल अवस्था में आकाश की ओर देख रहा होता है- उसका, यह प्रकृति और भाग्य के सामने मानवीय महत्वाकांक्षाओं की तुच्छता का अहसास टॉलस्टॉय की देन है, जिसे ‘आंद्रेई का अनंत आकाश’ कहा जाता है।

‘युद्ध और शान्ति’ का समय नेपोलियन युद्धों का समय है। यह कहानी पियरे बेज़ुखोव, प्रिंस आंद्रेई बोल्कॉन्स्की और नताशा रोस्तोवा के जीवन से होकर गुज़रती है। यह युद्ध बाहर भी हैं और भीतर भी। शान्ति की तलाश बाहर भी है और भीतर भी। टॉल्स्टॉय “इतिहास के महानों” के सिद्धांत को भी चुनौती देते हैं। वे नेपोलियन जैसे व्यक्तित्वों को व्यापक सामाजिक शक्तियों के सामने व्यर्थ और शक्तिहीन के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

उपन्यास में सैकड़ों पहलू हैं, जो इसे बड़ा बनाते हैं- जैसे किरदारों की ज़िंदगी का मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद। पियरे की अस्तित्वगत यात्रा, आंद्रेई का मोहभंग और नताशा की भावात्मक परिपक्वता को टॉलस्टॉय ने गहरी सहानुभूति और अंतर्दृष्टि के साथ लिखा है। इतिहास की भव्यता और रोज़मर्रा जीवन की गरिमा परस्पर पूरे उपन्यास में साथ-साथ चलते हैं।

‘युद्ध और शान्ति’ को पढ़ना मुश्किल हो सकता है क्योंकि यह 1,200 पृष्ठों से ज़्यादा लंबा है और कई किरदारों की कहानी कहता है। टॉलस्टॉय, नताशा, आंद्रेई आदि किरदारों की निजी कहानियाँ, 1812 में रूस पर फ्रांसीसी आक्रमण और बोरोडिनो की लड़ाई जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के साथ मिला देते हैं। उपन्यास अक्सर अंतरंग भावनात्मक क्षणों और बड़े पैमाने की सैन्य रणनीतियों के बीच टहलता रहता है। टॉल्स्टॉय इतिहास और ‘फ़्री विल’ पर लम्बे दार्शनिक नुक़्तों के साथ कथा को अधिक प्रभावी, गहन और जटिल करते हैं।

एक उपन्यास कोई सन्देश-पुस्तक नहीं है, इस लिहाज़ से यह उपन्यास एक पाठकीय चुनौती है, कि नहीं पढ़ने और सरलीकृत साहित्य पढ़ने की मौजूदा संस्कृति ने सारे लिखने-पढ़ने को उसके ‘मैसेज’ में बदल देने की सुविधा और आतुरता से लैस कर दिया है, जहाँ ‘युद्ध और शान्ति’ की वही नियति हो रही है, जिसके बारे में मार्क ट्वेन ने (इस आलेख के शुरू में उल्लेख) कहा था।

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निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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