
- July 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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आशीष दशोत्तर की कलम से....
ग़ज़ल: ख़ास और आम के बीच की बात
ख़ुदा-ए-सुख़न मीर कहते हैं-
शेर मेरे हैं गो ख़वास-पसंद
पर मुझे गुफ़्तुगू अवाम से है
अवाम से गुफ़्तगू हर दौर का ख़्वाब भी रहा है और अरमान भी। मगर क्या कारण है कि जिसके लिए लिखा जा रहा है, उस तक बात नहीं पहुंच पा रही है? यह समस्या किसी एक वक़्त की न होकर हर दौर में रही है। हर दौर में दकीक़ लफ़्ज़ों का इस्तेमाल भी होता रहा और जदीद शाइरी ने इसे कुछ हद तक तोड़ा भी। फिर भी प्रयोगशीलता के आधार पर उर्दू शाइरी ने आज भी अपनी रवायती शैली से दाएं-बाएं होना स्वीकार नहीं किया है। इसके फ़ायदे भी हैं और नुक़सान भी। मगर पिछले कुछ समय के दौरान यह महसूस किया जाता रहा कि नये तेवर की शाइरी करने वालों ने नया अंदाज़ तो स्वीकारा ही साथ ही, अपनी शाइरी में उन शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू किया जिसे जनता समझती है। ये शब्द हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी या अन्य भाषाओं के भी हैं। यहां चर्चा का विषय किसी भाषा को केंद्र में रखना नहीं है बल्कि जनता के लिए लेखन और जनता की शब्दावली के बीच के अंतर को रेखांकित करना है।
इन दिनों कई शेर बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। जैसे आलोक श्रीवास्तव का यह शेर तो कई-कई जगहों पर कई तरहों से इस्तेमाल किया गया-
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं
हर रोज़ मुशायरा पढ़ने वाले शाइरों के शेर तो आम लोगों की पसंद में शामिल हैं ही, मगर कुछ शेर ऐसे भी लोगों की ज़ुबान पर चढ़े हुए हैं, जिनकी भाषा और शैली वही है जो आम जनता की। जैसे अज़हर इक़बाल के शेर इन दिनों ख़ासे लोकप्रिय हो रहे हैं। बावजूद इसके कि उनमें हिन्दी शब्दों का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है, वे उर्दू मुशायरों में मक़बूलियत पा रहे हैं। यह और बात है कि उर्दूदां इस तरह के इस्तेमाल में मुतमइन शायद ही हों, मगर ऐसे अशआर अवाम-पसंद तो हैं ही और मानीखेज़ भी हैं।
दुश्मन ही बनी बैठी है अच्छाई हमारी
तुम जान नहीं पाओगे कठिनाई हमारी
दम घुटता है इन क़ब्रनुमा शहरी घरों में
गांवों में पड़ी रह गयी अंगनाई हमारी
यहां इस बात पर ग़ौर करना लाज़मी है कि अज़हर जैसे शाइर बहुत बुलंदी के साथ हिंदी लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हुए अपनी बात कह रहे हैं। इसी तरह बहुत लोकप्रिय हो चुका अशोक साहिल का यह शेर सरलता में गहनता का उदाहरण पेश करता है-
मंज़िलों पर पहुंचना कमाल नहीं
मंज़िलों पर ठहरना कमाल होता है
यानी दक़ीक़ लफ़्ज़ियात और उलझन भरी शैली इस दौर में प्रचलित नहीं हो पा रही है। हालांकि रवायती अंदाज़ में लिखने वाले आज भी अपनी शैली पर क़ायम हैं और वे इस तरह के प्रयोगों को खुले मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। बहरहाल, बदलाव लाती यह सुखद बयार है। इसका स्वागत करें। इस और ऐसे ही सिलसिलों की कुछ और बातें अगली कड़ी में…

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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